देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 638, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 638
अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६२९
| कबन्धस्तस्य दैत्यस्य भ्रमन्वै पतितः क्षितौ।<br>जयशब्दश्च देवानां बभूव सुखवर्धनः॥ ६६ | धड़ घूमता हुआ भूमिपर गिर पड़ा। उस समय देवताओंके [मुखसे] सुखकी वृद्धि करनेवाला विजयघोष होने लगा॥ ६४–६६॥ |
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| सिंहस्त्वतिबलस्तत्र पलायनपरानथ।<br>दानवान्भक्षयामास क्षुधार्त इव सङ्गरे॥ ६७ | अब भगवतीका महाबली सिंह मानो भूखसे व्याकुल होकर रणभूमिमें भागते हुए दानवोंको खाने लगा॥ ६७॥ |
| मृते च महिषे क्रूरे दानवा भयपीडिताः।<br>मृतशेषाश्च ये केचित्पातालं ते ययुर्नृप॥ ६८ | हे नृप! क्रूर महिषासुरके मर जानेपर जो कोई दानव मरनेसे शेष बच गये थे, वे भयसे सन्त्रस्त होकर पाताल चले गये॥ ६८॥ |
| आनन्दं परमं जग्मुर्देवास्तस्मिन्निपातिते।<br>मुनयो मानवाश्चैव ये चान्ये साधवः क्षितौ॥ ६९ | उसके मर जानेपर भूमण्डलपर जो भी देवता, मुनिगण, मनुष्य और साधुजन थे, वे परम आनन्दित हो गये॥ ६९॥ |
| चण्डिकापि रणं त्यक्त्वा शुभे देशेऽथ संस्थिता।<br>देवास्तत्राययुः शीघ्रं स्तोतुकामाः सुखप्रदाम्॥ ७० | भगवती चण्डिका भी रणभूमि छोड़कर एक पवित्र स्थानमें विराजमान हो गयीं। देवता भी उन सुख प्रदान करनेवाली भगवतीकी स्तुति करनेकी इच्छासे शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे॥ ७०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषासुरवधो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः
देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति
| व्यास उवाच<br>अथ प्रमुदिताः सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः।<br>महिषं निहतं दृष्ट्वा तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम्॥ १ | व्यासजी बोले—महिषासुरका संहार देखकर इन्द्र आदि प्रधान देवता परम प्रसन्न हुए और वे जगदम्बाकी स्तुति करने लगे॥ १॥ |
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| देवा ऊचुः<br>ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरिदं महेशः<br>शक्त्या तवैव हरते ननु चान्तकाले।<br>ईशा न तेऽपि च भवन्ति तया विहीना-<br>स्तस्मात्त्वमेव जगतः स्थितिनाशकर्त्री॥ २ | देवता बोले—हे देवि! आपकी ही शक्तिसे ब्रह्मा इस जगत्का सृजन करते हैं, भगवान् विष्णु पालन करते हैं और शिवजी प्रलयकालमें संहार करते हैं। आपकी शक्तिसे रहित हो जानेपर वे कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं हो सकते। अतः जगत्का सृजन, पालन और संहार करनेवाली आप ही हैं॥ २॥ |
| कीर्तिर्मतिः स्मृतिगती करुणा दया त्वं<br>श्रद्धा धृतिश्च वसुधा कमलाजपा च।<br>पुष्टिः कलाथ विजया गिरिजा जया त्वं<br>तुष्टिः प्रमा त्वमसि बुद्धिरुमा रमा च॥ ३ | इस संसारमें कीर्ति, मति, स्मृति, गति, करुणा, दया, श्रद्धा, धृति, वसुधा, कमला, अजपा, पुष्टि, कला, विजया, गिरिजा, जया, तुष्टि, प्रमा, बुद्धि, उमा, रमा, |