देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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६२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रेमे नृपतिशार्दूलः कामिन्या बहुवासरान्।<br>कदाचिद्दासपत्न्या स रममाणो रहः किल॥ ९<br><br>सैरन्ध्र्या कथितं तस्यै तया दृष्टः पतिस्तथा।<br>उपालम्भं ददौ तस्मै स्मितपूर्वं रुषान्विता॥ १० | राजाओंमें श्रेष्ठ वह चारुदेष्ण बहुत दिनोंतक उस कामिनीके साथ रमण करता रहा। एक दिन वह किसी दासीके साथ एकान्तमें रमण कर रहा था। सैरन्ध्रीने यह बात मन्दोदरीको बता दी और उसने स्वयं जाकर पतिको [उस स्थितिमें] देख लिया। तब उसने मुसकराकर क्रोधके साथ राजाको बहुत उपालम्भ दिया॥ ९-१०॥ |
| कदाचिदपि सामान्यां रहो रूपवतीं नृपः।<br>क्रीडयँल्लालयन्दृष्टः खेदं प्राप तदैव सा॥ ११ | इसके बाद पुनः किसी दिन मन्दोदरीने राजाको एक रूपवती दासीके साथ एकान्तमें क्रीड़ाविहार करते हुए देख लिया। [यह देखकर] उस समय उसे महान् कष्ट हुआ॥ ११॥ |
| न ज्ञातोऽयं शठः पूर्वं यदा दृष्टः स्वयंवरे।<br>किं कृतं तु मया मोहाद्वञ्चिताहं नृपेण ह॥ १२ | वह सोचने लगी कि जब मैंने इसे स्वयंवरमें देखा था, तब मैं इस शठके विषयमें ऐसा नहीं समझ पायी थी। मैंने मोहवश यह क्या कर डाला? इस राजाने तो मुझे ठग लिया॥ १२॥ |
| किं करोम्यद्य सन्तापं निर्लज्जे निर्घृणे शठे।<br>का प्रीतीरीदृशे पत्यौ धिगद्य मम जीवितम्॥ १३ | अब मैं क्या करूँ; केवल सन्ताप ही मिला। ऐसे निर्लज्ज, निर्दयी और धूर्त पतिके प्रति प्रेम कैसे हो सकता है! अब मेरे जीवनको धिक्कार है॥ १३॥ |
| अद्यप्रभृति संसारे सुखं त्यक्तं मया खलु।<br>पतिसम्भोगजं सर्वं सन्तोषोऽद्य मया कृतः॥ १४ | आजसे मैं संसारमें पतिके साथ सहवाससे प्राप्त होनेवाले सारे सुखका त्याग कर रही हूँ; अब मैंने सन्तोष कर लिया॥ १४॥ |
| अकर्तव्यं कृतं कार्यं तज्जातं दुःखदं मम।<br>देहत्यागः क्रियते चेद्गत्यातीव दुरत्यया॥ १५<br><br>पितृगेहं व्रजाम्याशु तत्रापि न सुखं भवेत्।<br>हास्ययोग्या सखीनां तु भवेयं नात्र संशयः॥ १६<br><br>तस्मादत्रैव संवासो वैराग्ययुतया मया।<br>कर्तव्यः कालयोगेन त्यक्त्वा कामसुखं पुनः॥ १७ | मैंने वह काम कर डाला, जिसे मुझे नहीं करना चाहिये था, इसीलिये वह मेरे लिये कष्टदायक सिद्ध हुआ। अब यदि मैं देहत्याग करती हूँ तो वह दुस्तर आत्महत्याके समान होगा। यदि पिताके घर चली जाऊँ तो वहाँ भी सुख नहीं मिलेगा और वहाँपर मैं अपनी सखियोंकी हँसीका पात्र बनी रहूँगी; इसमें कोई संशय नहीं है। अतः वैराग्ययुक्त होकर भोगविलासके सुखका परित्याग करके कालयोगसे मुझे यहींपर निवास करना चाहिये॥ १५–१७॥ |
| महिष उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य सा नारी दुःखशोकपरायणा।<br>स्थिता पतिगृहं त्यक्त्वा सुखं संसारजं ततः॥ १८ | महिष बोला— ऐसा विचार करके वह नारी सांसारिक सुखका परित्याग करके दुःख तथा शोकसे सन्तप्त रहती हुई अपने पतिके घरपर ही रह गयी॥ १८॥ |
| तस्मात्त्वमपि कल्याणि मामनादृत्य भूपतिम्।<br>अन्यं कापुरुषं मन्दं कामार्ता संश्रयिष्यसि॥ १९ | अतः हे कल्याणि! उसी प्रकार तुम भी मुझ राज पतिका अनादर करके पुनः कामातुर होनेपर किसी अन्य मूर्ख तथा कायर पुरुषका आश्रय ग्रहण करोगी॥ १९। |