भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 632, कुल 889 में से

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पृष्ठ 632
अ० १८ ]पञ्चम स्कन्ध६२३
संस्कृतहिन्दी
नृपस्तु तद्वचः श्रुत्वा निर्गतः सह सेनया।<br>कोसलान्विमना भूत्वा कामिनीं प्रति निःस्पृहः॥ ६१उसकी बात सुनकर राजा वीरसेन उदास हो गये और उस राजकुमारीके प्रति आसक्तिरहित होकर अपनी सेनाके साथ कोसलदेशके लिये प्रस्थित हो गये॥ ६१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमहिषसंवादे राजपुत्रीमन्दोदरीवृत्तवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥


अथाष्टादशोऽध्यायः

दुर्धर, त्रिनेत्र, अन्धक और महिषासुरका वध

महिष उवाचमहिष बोला—
तस्यास्तु भगिनी कन्या नाम्ना चेन्दुमती शुभा।<br>विवाहयोग्या सञ्जाता सुरूपावरजा यदा॥ १<br><br>तस्या विवाहः संवृत्तः सञ्जातश्च स्वयंवरः।<br>राजानो बहुदेशीयाः सङ्गतास्तत्र मण्डपे॥ २उस मन्दोदरीकी इन्दुमती नामकी एक छोटी बहन थी, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा अत्यन्त रूपवती थी। जब वह विवाहके योग्य हुई, तब उसके विवाहकी तैयारी होने लगी। उसका स्वयंवर रचाया गया, स्वयंवरके मण्डपमें अनेक देशोंके राजा एकत्रित हुए॥ १-२॥
तया वृत्तो नृपः कश्चिद् बलवान् रूपसंयुतः।<br>कुलशीलसमायुक्तः सर्वलक्षणसंयुतः॥ ३इन्दुमतीने उनमेंसे एक बलशाली, रूपवान्, कुलीन, शीलवान् तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न राजाका वरण कर लिया॥ ३॥
तदा कामातुरा जाता विटं वीक्ष्य नृपं तु सा।<br>चकमे दैवयोगात्तु शठं चातुर्यभूषितम्॥ ४उसी समय वह मन्दोदरी दैवयोगसे एक धूर्त, शठ तथा चातुर्यसम्पन्न राजाको देखकर कामातुर हो उठी और उसपर मोहित हो गयी॥ ४॥
पितरं प्राह तन्वङ्गी विवाहं कुरु मे पितः।<br>इच्छा मेऽद्य समुद्भूता दृष्ट्वा मद्राधिपं त्विह॥ ५उस कोमलांगीने अपने पितासे कहा—हे पिताजी! अब आप मेरा भी विवाह कर दीजिये। मद्रदेशके राजाको यहाँ देखकर अब मेरी भी विवाह करनेकी इच्छा हो गयी है॥ ५॥
चन्द्रसेनोऽपि तच्छ्रुत्वा पुत्र्या यद्भाषितं रहः।<br>प्रसन्नेन च मनसा तत्कार्ये तत्परोऽभवत्॥ ६पुत्रीने एकान्तमें अपने पितासे जो कुछ कहा था, उसे सुनकर राजा चन्द्रसेन प्रसन्नमनसे उसके भी विवाहकार्यकी व्यवस्थामें संलग्न हो गये॥ ६॥
तमाहूय नृपं गेहे विवाहविधिना ददौ।<br>कन्यां मन्दोदरीं तस्मै पारिबर्हं तथा बहु॥ ७तत्पश्चात् मद्रदेशके उन राजाको अपने घर बुलाकर उन्होंने वैवाहिक विधिके अनुसार उन्हें अपनी कन्या मन्दोदरी सौंप दी और बहुत-सा वैवाहिक उपहार प्रदान किया॥ ७॥
चारुदेष्णोऽपि तां प्राप्य सुन्दरीं मुदितोऽभवत्।<br>जगाम स्वगृहं तुष्टो राजापि सहितः स्त्रिया॥ ८मद्रनरेश चारुदेष्ण भी उस सुन्दरीको पाकर बहुत प्रसन्न हुआ और सन्तुष्ट होकर स्त्रीके साथ अपने घर चला गया॥ ८॥
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