देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 631, कुल 889 में से
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| श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १७ ] |
|---|---|
| ६२२ |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| महिष उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सैरन्ध्री प्राह तां तदा ॥ ४९<br>प्रहस्य मधुरं वाक्यं कामशास्त्रविशारदा।<br>मन्दोदरि नृपः प्राप्तः सूर्यवंशसमुद्भवः ॥ ५०<br>रूपवान्बलवान्कान्तो वयसा त्वत्समः पुनः।<br>प्रीतिमान्नृपतिर्जातस्त्वयि सुन्दरि सर्वथा ॥ ५१ | महिष बोला—तब वीरसेनका वचन सुनकर कामशास्त्रमें प्रवीण सैरन्ध्रीने हँसकर उस मन्दोदरीसे मधुर वाणीमें कहा—हे मन्दोदरि! सूर्यवंशमें उत्पन्न ये राजा यहाँ आये हैं। ये रूपवान्, बलवान् तथा आयुमें तुम्हारे ही तुल्य हैं। हे सुन्दरि! ये राजा सम्यक् प्रकारसे तुझमें प्रेमासक्त हो गये हैं॥ ४९—५१॥ |
| पितापि ते विशालाक्षि परितप्यति सर्वथा।<br>विवाहकालं ते ज्ञात्वा त्वां च वैराग्यसंयुताम् ॥ ५२<br>इत्याहास्मान् नृपतिर्निःश्वस्य पुनः पुनः।<br>पुत्रीं प्रबोधयन्त्वेतां सैरन्ध्रयः सेवने रताः ॥ ५३<br>वक्तुं शक्ता वयं न त्वां हठधर्मरतां पुनः।<br>भर्तुः शुश्रूषणं स्त्रीणां परो धर्मोऽब्रवीन्मनुः ॥ ५४<br>भर्तारं सेवमाना वै नारी स्वर्गमवाप्नुयात्।<br>तस्मात्कुरु विशालाक्षि विवाहं विधिपूर्वकम् ॥ ५५ | हे विशाल नयनोंवाली! तुम्हारी विवाहयोग्य अवस्था हो गयी है और तुम वैराग्यभावसे युक्त रहती हो—यह जानकर तुम्हारे पिता भी सदा चिन्तित रहते हैं। उन महाराजने बार-बार लंबी साँस लेकर हमलोगोंसे यह कहा था—'हे दासियो! तुमलोग सदा उसकी सेवामें संलग्न रहती हो, अतः तुम्हीं लोग मेरी इस पुत्रीको समझाओ।' किंतु हमलोग तुझ हठधर्मपरायणासे कुछ भी कहनेमें समर्थ नहीं हैं। [फिर भी हम तुम्हें बता देना चाहती हैं कि] पतिकी सेवा ही स्त्रियोंके लिये परम धर्म है—ऐसा मनुने कहा है। पतिकी सेवा करनेवाली स्त्री स्वर्ग प्राप्त कर लेती है। अतएव हे विशाल नेत्रोंवाली! तुम विधिपूर्वक विवाह कर लो॥ ५२—५५॥ |
| मन्दोदर्युवाच<br>नाहं पतिं करिष्यामि चरिष्ये तप अद्भुतम्।<br>निवारय नृपं बाले किं मां पश्यति निस्त्रपः ॥ ५६ | मन्दोदरी बोली—मैं पति नहीं बनाऊँगी; मैं अद्भुत तप करूँगी। हे बाले! तुम इस राजाको मना कर दो; यह निर्लज्ज मेरी ओर क्यों देख रहा है?॥ ५६॥ |
| सैरन्ध्र्युवाच<br>दुर्जयो देवि कामोऽसौ कालोऽसौ दुरतिक्रमः।<br>तस्मान्मे वचनं पथ्यं कर्तुमर्हसि सुन्दरि ॥ ५७<br>अन्यथा व्यसनं नूनमापतेदिति निश्चयः। | सैरन्ध्री बोली—हे देवि! यह कामदेव अजेय है तथा कालका अतिक्रमण भी अत्यन्त कठिन है। अतएव हे सुन्दरि! तुम मेरे इस कल्याणकारी वचनको मान लेनेकी कृपा करो। अन्यथा [तुम्हारे ऊपर कभी-न-कभी] संकट अवश्य पड़ेगा; यह मेरा दृढ़ विश्वास है॥ ५७ १/२॥ |
| इति तस्या वचः श्रुत्वा कन्योवाचाथ तां सखीम् ॥ ५८<br>यद्यद्भवॆत्तद्भवतु दैवयोगादसंशयम्।<br>न विवाहं करिष्येऽहं सर्वथा परिचारिके ॥ ५९ | उसकी यह बात सुनकर राजकुमारीने उस सखीसे कहा—हे परिचारिके! दैवयोगसे जो भी होनेवाला है वह हो, किंतु मैं विवाह बिलकुल नहीं करूँगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५८-५९॥ |
| महिष उवाच<br>इति तस्यास्तु निर्बन्धं ज्ञात्वा प्राह नृपं पुनः।<br>गच्छ राजन् यथाकामं नेयमिच्छति सत्पतिम् ॥ ६० | महिष बोला—उस राजकुमारीका निश्चित विचार जानकर सैरन्ध्रीने राजासे पुनः कहा—हे राजन्! आप इच्छानुसार यहाँसे जा सकते हैं। यह राजकुमारी उत्तम पति बनाना नहीं चाहती॥ ६०॥ |