देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 634, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० १८ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६२५ | | :--- | :--- |
| वचनं कुरु मे तथ्यं नारीणां परमं हितम्।<br>अकृत्वा परमं शोकं लप्स्यसे नात्र संशयः॥ २० | अतः स्त्रियोंके लिये परम हितकारी तथा सच्ची मेरी यह बात मान लो। इसे न मानकर तुम बहुत कष्ट उठाओगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०॥ | | देव्युवाच<br>मन्दात्मन् गच्छ पातालं युद्धं वा कुरु साम्प्रतम्।<br>हत्वा त्वामसुरान्सर्वानामिष्यामि यथासुखम्॥ २१ | देवी बोलीं—हे मन्दबुद्धि! अब तुम पाताललोक भाग जाओ अथवा मेरे साथ युद्ध करो। मैं तुम्हें तथा सभी असुरोंको मारकर सुखपूर्वक यहाँसे चली जाऊँगी॥ २१॥ | | यदा यदा हि साधूनां दुःखं भवति दानव।<br>तदा तेषां च रक्षार्थं देहं सन्धारयाम्यहम्॥ २२ | हे दानव! जब-जब साधु पुरुषोंपर संकट आता है, तब-तब उनकी रक्षाके लिये मैं देह धारण करती हूँ॥ २२॥ | | अरूपायाश्च मे रूपमजन्मायाश्च जन्म च।<br>सुराणां रक्षणार्थाय विद्धि दैत्य विनिश्चितम्॥ २३ | हे दैत्य! वास्तवमें मैं निराकार और अजन्मा हूँ, तथापि देवताओंकी रक्षा करनेके लिये रूप और जन्म धारण करती हूँ; यह तुम निश्चित समझ लो॥ २३॥ | | सत्यं ब्रवीमि जानीहि प्रार्थिताहं सुरैः किल।<br>त्वद्वधार्थं हयारे त्वां हत्वा स्थास्यामि निश्चला॥ २४ | मैं सत्य कहती हूँ कि देवताओंने तुम्हारा वध करनेके लिये मुझसे प्रार्थना की थी। हे महिष! तुझे मारकर मैं सर्वथा निश्चिन्त हो जाऊँगी॥ २४॥ | | तस्माद्युध्यस्व वा गच्छ पातालमसुरालयम्।<br>सर्वथा त्वां हनिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ २५ | अतएव अब तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा असुरोंकी निवासभूमि पाताललोकको चले जाओ। अब मैं तुम्हें निश्चय ही मार डालूँगी, मैं यह बिलकुल सच कह रही हूँ॥ २५॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्तः स तया देव्या धनुरदाय दानवः।<br>युद्धकामः स्थितस्तत्र संग्रामाङ्गणभूमिषु॥ २६ | व्यासजी बोले—देवीके ऐसा कहनेपर महिषासुर धनुष लेकर युद्ध करनेकी इच्छासे संग्रामभूमिमें डट गया॥ २६॥ | | मुमोच तरसा बाणान्कर्णाकृष्टञ्छिलाशितान्।<br>देवी चिच्छेद तान्बाणैः क्रोधान्मुक्तैरयोमुखैः॥ २७ | वह पत्थरपर घिसकर नुकीले बनाये गये बाणोंको कानतक खींचकर बड़े वेगसे छोड़ने लगा। तब भगवतीने कुपित होकर अपने लौहमुख बाणोंसे उसके बाणोंको काट डाला॥ २७॥ | | तयोः परस्परं युद्धं सम्बभूव भयप्रदम्।<br>देवानां दानवानाञ्च परस्परजयैषिणाम्॥ २८ | अब देवी और दानव महिषमें भीषण संग्राम होने लगा। वह युद्ध अपनी-अपनी विजय चाहनेवाले देवताओं और दानवोंके लिये बड़ा भयदायक था॥ २८॥ | | मध्ये दुर्धर आगत्य मुमोच च शिलीमुखान्।<br>देवीं प्रति विषासक्तान्कोपयन्नतिदारुणान्॥ २९ | उसी समय दुर्धर नामक दैत्य बीचमें आकर भगवतीको कुपित करता हुआ उनपर अतिशय दारुण और विषैले बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ २९॥ | | ततो भगवती क्रुद्धा तं जघान शितैः शरैः।<br>दुर्धरस्तु पपातोर्व्यां गतासुर्गिरिशृङ्गवत्॥ ३० | तब भगवतीने क्रोधित होकर उसपर तीक्ष्ण बाणोंके द्वारा प्रहार किया, जिससे दुर्धर प्राणहीन होकर पर्वतशिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३०॥ |