देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 635, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 635
६२६ श्रीमद्देवीभागवत [अ० १८]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं तथा निहतं दृष्ट्वा त्रिनेत्रः परमास्त्रवित्।<br>आगत्य सप्तभिर्बाणैर्जघान परमेश्वरीम्॥ ३१ | दुर्धरको मृत देखकर शस्त्रोंका महान् ज्ञाता त्रिनेत्र रणभूमिमें आकर सात बाणोंसे भगवती परमेश्वरीपर आघात करने लगा॥ ३१॥ |
| अनागतांस्तु चिच्छेद देवी तान्विशिखैः शरान्।<br>त्रिशूलेन त्रिनेत्रं तु जघान जगदम्बिका॥ ३२ | वे बाण देवीके पास पहुँच भी नहीं पाये थे कि बीचहीमें उन्होंने अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट दिया। तत्पश्चात् जगदम्बाने अपने त्रिशूलसे त्रिनेत्रको मार डाला॥ ३२॥ |
| अन्धकस्त्वाजगामाशु हतं दृष्ट्वा त्रिलोचनम्।<br>गदया लोहमय्याशु सिंहं विव्याध मस्तके॥ ३३<br><br>सिंहस्तु नखघातेन तं हत्वा बलवत्तरम्।<br>चखाद तरसा मांसमन्धकस्य रुषान्वितः॥ ३४ | तब त्रिनेत्रको मारा गया देखकर तुरंत अन्धक आ गया और उसने अपनी लौहमयी गदासे सिंहके मस्तकपर प्रहार कर दिया, किंतु सिंह क्रोधमें भरकर अपने तीक्ष्ण नखोंके प्रहारसे उस महान् बलशाली दानवका वध करके उसका मांस खाने लगा॥ ३३-३४॥ |
| तान् रणे निहतान्वीक्ष्य दानवो विस्मयं गतः।<br>चिक्षेप तरसा बाणानतितीक्ष्णाञ्छिलाशितान्॥ ३५ | उन्हें रणमें मारा गया देखकर महिषासुरको बहुत आश्चर्य हुआ। अतएव वह और भी वेगके साथ अति तीक्ष्ण और पत्थरकी सानपर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए बाणोंको छोड़ने लगा॥ ३५॥ |
| द्विधा चक्रे शरान्देवी तानप्राप्ताञ्छिलीमुखैः।<br>गदया ताडयामास दैत्यं वक्षसि चाम्बिका॥ ३६ | किंतु भगवतीने उन बाणोंको अपने पास पहुँचनेके पहले ही अपने बाणोंसे काटकर उनके दो टुकड़े कर दिये। इसी समय जगदम्बाने महिषासुरके वक्षपर अपनी गदासे आघात किया॥ ३६॥ |
| स गदाभिहतो मूर्च्छामवापामरबाधकः।<br>विषह्य पीडां पापात्मा पुनरागत्य सत्वरः॥ ३७<br><br>जघान गदया सिंहं मूर्ध्नि क्रोधसमन्वितः।<br>सिंहोऽपि नखघातेन तं ददार महासुरम्॥ ३८ | देवताओंको दुःख देनेवाला महिष गदासे घायल होकर मूर्च्छित हो गया। किंतु उस वेदनाको सहन करके वह पापी उठ खड़ा हुआ और पुनः तुरंत आकर उसने कोपाविष्ट होकर अपनी गदासे सिंहके मस्तकपर प्रहार कर दिया। तब सिंह भी नखोंके आघातसे उस महान् असुरको विदीर्ण करने लगा॥ ३७-३८॥ |
| विहाय पौरुषं रूपं सोऽपि सिंहो बभूव ह।<br>नखैर्विदारयामास देवीसिंहं मदोत्कटम्॥ ३९ | तब महिषासुरने मानवरूप त्यागकर सिंहका रूप धारण कर लिया और वह अपने नखोंसे भगवतीके मतवाले सिंहको चीरने लगा॥ ३९॥ |
| तञ्च केसरिणं वीक्ष्य देवी क्रुद्धा हयायोमुखैः।<br>शरैर्वाकिरत्तीक्ष्णैः क्रूरैराशीविषैरिव॥ ४० | उसे सिंहरूपमें देखकर भगवती क्रोधित हो उठीं और अपने लौहमुख, तीक्ष्ण, क्रूर एवं सर्पसदृश बाणोंसे उसे बींधने लगीं॥ ४०॥ |
| त्यक्त्वा स हरिरूपं तु गजो भूत्वा मदस्रवः।<br>शैलशृङ्गं करे कृत्वा चिक्षेप चण्डिकां प्रति॥ ४१ | तदनन्तर सिंहरूप त्यागकर महिषासुरने मद बहाते हुए हाथीका रूप धारण करके अपनी सूँडसे एक विशाल शैलशिखर उठाकर चण्डिकापर फेंका॥ ४१॥ |