भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 636, कुल 889 में से

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पृष्ठ 636
अ० १८ ]पञ्चम स्कन्ध६२७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आगच्छन्तं गिरेः शृङ्गं देवी बाणैः शिलाशितैः।<br>चकार तिलशः खण्डाञ्जहास जगदम्बिका ॥ ४२उस पर्वतशिखरको आते देखकर भगवती जगदम्बाने पत्थरपर घिसकर तेज किये गये बाणोंसे उसे तिल-तिल करके काट डाला और वे बड़ी जोरसे अट्टहास करने लगीं ॥ ४२ ॥
उत्पत्य च तदा सिंहस्तस्य मूर्ध्नि व्यवस्थितः।<br>नखैर्विदारयामास महिषं गजरूपिणम् ॥ ४३उस समय देवीका सिंह उछलकर उसके मस्तकपर चढ़ बैठा और अपने तीक्ष्ण नखोंसे उस गजरूपधारी महिषको विदीर्ण करने लगा ॥ ४३ ॥
विहाय गजरूपं च बभूवाष्टापदी तथा।<br>हन्तुकामो हरिं कोपाद्दारुणो बलवत्तरः ॥ ४४अब महिषने क्रोधपूर्वक उस सिंहको मारनेके विचारसे हाथीका रूप त्यागकर अत्यन्त भीषण और बलवान् आठ पैरोंवाले शरभका रूप धारण कर लिया ॥ ४४ ॥
तं वीक्ष्य शरभं देवी खड्गेन सा रुषान्विता।<br>उत्तमाङ्गे जघानाशु सोऽपि तां प्राहरत्तदा ॥ ४५उस शरभको देखकर जगदम्बाने अतिशय क्रोधमें भरकर उसके मस्तकपर खड्गसे आघात किया। तब उसने भी भगवतीपर प्रहार किया ॥ ४५ ॥
तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयप्रदम्।<br>माहिषं रूपमास्थाय शृङ्गाभ्यां प्राहरत्तदा ॥ ४६अब उन दोनोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा। उसी समय उसने महिषरूप धारण करके अपनी सींगोंसे देवीके ऊपर आघात किया ॥ ४६ ॥
पुच्छप्रभ्रमणेनाशु शृङ्गाघातैर्महासुरः।<br>ताडयामास तन्वङ्गीं घोररूपो भयानकः ॥ ४७विकराल रूपवाला तथा भयानक वह महान् असुर अपनी पूँछके घुमाने तथा सींगोंसे कोमल अंगोंवाली देवीपर प्रहार करने लगा ॥ ४७ ॥
पुच्छेन पर्वताञ्छृङ्गे गृहीत्वा भ्रामयन्बलात्।<br>प्रेषयामास पापात्मा प्रहसन्यरया मुदा ॥ ४८वह पापी अपनी पूँछसे पर्वतोंको सींगपर रखकर बड़े वेगसे घुमाता हुआ हँसकर अति प्रसन्नतापूर्वक भगवतीके ऊपर फेंकने लगा ॥ ४८ ॥
तामुवाच बलोन्मत्तस्तिष्ठ देवि रणाङ्गणे।<br>अद्याहं त्वां हनिष्यामि रूपयौवनभूषिताम् ॥ ४९बलसे उन्मत्त उस दानवने भगवतीसे कहा—हे देवि! ठहरो। रूप और यौवनसे सम्पन्न तुमको मैं आज मार डालूँगा ॥ ४९ ॥
मूर्खासि मदमत्ताद्य यन्मया सह सङ्गरम्।<br>करोषि मोहितातीव मृषा बलवती खरा ॥ ५०तुम मूर्ख हो जो कि मदमत्त हो मेरे साथ युद्ध कर रही हो। तुम अज्ञानवश अपनेको व्यर्थ ही बलवती समझकर मुखर हो रही हो ॥ ५० ॥
हत्वा त्वां निहनिष्यामि देवान्कपटपण्डितान्।<br>ये नारीं पुरतः कृत्वा जेतुमिच्छन्ति मां शठाः ॥ ५१तुम्हें मारनेके बाद मैं उन सब कपटपण्डित देवताओंको मार डालूँगा, जो शठ देवतागण एक स्त्रीको आगे करके मुझे जीतना चाहते हैं ॥ ५१ ॥
देव्युवाच<br>मा गर्वं कुरु मन्दात्मंस्तिष्ठ तिष्ठ रणाङ्गणे।<br>करिष्यामि निरातङ्कान्हत्वा त्वां सुरसत्तमान् ॥ ५२देवी बोलीं—अरे मूर्ख! व्यर्थ अभिमान मत करो, रणभूमिमें ठहर जाओ, ठहर जाओ। तुम्हें मारकर मैं देवताओंको निर्भय बना दूँगी ॥ ५२ ॥
पीत्वाद्य माधवीं मिष्टां शातयामि रणेऽधम।<br>देवानां दुःखदं पापं मुनीनां भयकारकम् ॥ ५३अरे अधम! मैं अभी मधुर मद्य पीकर देवताओंके लिये दुःखदायी और मुनियोंको भयभीत करनेवाले तुझ पापीको रणमें काट डालूँगी ॥ ५३ ॥