देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
६२६ श्रीमद्देवीभागवत [अ० १८]
६२६ श्रीमद्देवीभागवत [अ० १८]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं तथा निहतं दृष्ट्वा त्रिनेत्रः परमास्त्रवित्।<br>आगत्य सप्तभिर्बाणैर्जघान परमेश्वरीम्॥ ३१ | दुर्धरको मृत देखकर शस्त्रोंका महान् ज्ञाता त्रिनेत्र रणभूमिमें आकर सात बाणोंसे भगवती परमेश्वरीपर आघात करने लगा॥ ३१॥ |
| अनागतांस्तु चिच्छेद देवी तान्विशिखैः शरान्।<br>त्रिशूलेन त्रिनेत्रं तु जघान जगदम्बिका॥ ३२ | वे बाण देवीके पास पहुँच भी नहीं पाये थे कि बीचहीमें उन्होंने अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट दिया। तत्पश्चात् जगदम्बाने अपने त्रिशूलसे त्रिनेत्रको मार डाला॥ ३२॥ |
| अन्धकस्त्वाजगामाशु हतं दृष्ट्वा त्रिलोचनम्।<br>गदया लोहमय्याशु सिंहं विव्याध मस्तके॥ ३३<br><br>सिंहस्तु नखघातेन तं हत्वा बलवत्तरम्।<br>चखाद तरसा मांसमन्धकस्य रुषान्वितः॥ ३४ | तब त्रिनेत्रको मारा गया देखकर तुरंत अन्धक आ गया और उसने अपनी लौहमयी गदासे सिंहके मस्तकपर प्रहार कर दिया, किंतु सिंह क्रोधमें भरकर अपने तीक्ष्ण नखोंके प्रहारसे उस महान् बलशाली दानवका वध करके उसका मांस खाने लगा॥ ३३-३४॥ |
| तान् रणे निहतान्वीक्ष्य दानवो विस्मयं गतः।<br>चिक्षेप तरसा बाणानतितीक्ष्णाञ्छिलाशितान्॥ ३५ | उन्हें रणमें मारा गया देखकर महिषासुरको बहुत आश्चर्य हुआ। अतएव वह और भी वेगके साथ अति तीक्ष्ण और पत्थरकी सानपर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए बाणोंको छोड़ने लगा॥ ३५॥ |
| द्विधा चक्रे शरान्देवी तानप्राप्ताञ्छिलीमुखैः।<br>गदया ताडयामास दैत्यं वक्षसि चाम्बिका॥ ३६ | किंतु भगवतीने उन बाणोंको अपने पास पहुँचनेके पहले ही अपने बाणोंसे काटकर उनके दो टुकड़े कर दिये। इसी समय जगदम्बाने महिषासुरके वक्षपर अपनी गदासे आघात किया॥ ३६॥ |
| स गदाभिहतो मूर्च्छामवापामरबाधकः।<br>विषह्य पीडां पापात्मा पुनरागत्य सत्वरः॥ ३७<br><br>जघान गदया सिंहं मूर्ध्नि क्रोधसमन्वितः।<br>सिंहोऽपि नखघातेन तं ददार महासुरम्॥ ३८ | देवताओंको दुःख देनेवाला महिष गदासे घायल होकर मूर्च्छित हो गया। किंतु उस वेदनाको सहन करके वह पापी उठ खड़ा हुआ और पुनः तुरंत आकर उसने कोपाविष्ट होकर अपनी गदासे सिंहके मस्तकपर प्रहार कर दिया। तब सिंह भी नखोंके आघातसे उस महान् असुरको विदीर्ण करने लगा॥ ३७-३८॥ |
| विहाय पौरुषं रूपं सोऽपि सिंहो बभूव ह।<br>नखैर्विदारयामास देवीसिंहं मदोत्कटम्॥ ३९ | तब महिषासुरने मानवरूप त्यागकर सिंहका रूप धारण कर लिया और वह अपने नखोंसे भगवतीके मतवाले सिंहको चीरने लगा॥ ३९॥ |
| तञ्च केसरिणं वीक्ष्य देवी क्रुद्धा हयायोमुखैः।<br>शरैर्वाकिरत्तीक्ष्णैः क्रूरैराशीविषैरिव॥ ४० | उसे सिंहरूपमें देखकर भगवती क्रोधित हो उठीं और अपने लौहमुख, तीक्ष्ण, क्रूर एवं सर्पसदृश बाणोंसे उसे बींधने लगीं॥ ४०॥ |
| त्यक्त्वा स हरिरूपं तु गजो भूत्वा मदस्रवः।<br>शैलशृङ्गं करे कृत्वा चिक्षेप चण्डिकां प्रति॥ ४१ | तदनन्तर सिंहरूप त्यागकर महिषासुरने मद बहाते हुए हाथीका रूप धारण करके अपनी सूँडसे एक विशाल शैलशिखर उठाकर चण्डिकापर फेंका॥ ४१॥ |
| अ० १८ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| आगच्छन्तं गिरेः शृङ्गं देवी बाणैः शिलाशितैः।<br>चकार तिलशः खण्डाञ्जहास जगदम्बिका ॥ ४२ | उस पर्वतशिखरको आते देखकर भगवती जगदम्बाने पत्थरपर घिसकर तेज किये गये बाणोंसे उसे तिल-तिल करके काट डाला और वे बड़ी जोरसे अट्टहास करने लगीं ॥ ४२ ॥ |
| उत्पत्य च तदा सिंहस्तस्य मूर्ध्नि व्यवस्थितः।<br>नखैर्विदारयामास महिषं गजरूपिणम् ॥ ४३ | उस समय देवीका सिंह उछलकर उसके मस्तकपर चढ़ बैठा और अपने तीक्ष्ण नखोंसे उस गजरूपधारी महिषको विदीर्ण करने लगा ॥ ४३ ॥ |
| विहाय गजरूपं च बभूवाष्टापदी तथा।<br>हन्तुकामो हरिं कोपाद्दारुणो बलवत्तरः ॥ ४४ | अब महिषने क्रोधपूर्वक उस सिंहको मारनेके विचारसे हाथीका रूप त्यागकर अत्यन्त भीषण और बलवान् आठ पैरोंवाले शरभका रूप धारण कर लिया ॥ ४४ ॥ |
| तं वीक्ष्य शरभं देवी खड्गेन सा रुषान्विता।<br>उत्तमाङ्गे जघानाशु सोऽपि तां प्राहरत्तदा ॥ ४५ | उस शरभको देखकर जगदम्बाने अतिशय क्रोधमें भरकर उसके मस्तकपर खड्गसे आघात किया। तब उसने भी भगवतीपर प्रहार किया ॥ ४५ ॥ |
| तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयप्रदम्।<br>माहिषं रूपमास्थाय शृङ्गाभ्यां प्राहरत्तदा ॥ ४६ | अब उन दोनोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा। उसी समय उसने महिषरूप धारण करके अपनी सींगोंसे देवीके ऊपर आघात किया ॥ ४६ ॥ |
| पुच्छप्रभ्रमणेनाशु शृङ्गाघातैर्महासुरः।<br>ताडयामास तन्वङ्गीं घोररूपो भयानकः ॥ ४७ | विकराल रूपवाला तथा भयानक वह महान् असुर अपनी पूँछके घुमाने तथा सींगोंसे कोमल अंगोंवाली देवीपर प्रहार करने लगा ॥ ४७ ॥ |
| पुच्छेन पर्वताञ्छृङ्गे गृहीत्वा भ्रामयन्बलात्।<br>प्रेषयामास पापात्मा प्रहसन्यरया मुदा ॥ ४८ | वह पापी अपनी पूँछसे पर्वतोंको सींगपर रखकर बड़े वेगसे घुमाता हुआ हँसकर अति प्रसन्नतापूर्वक भगवतीके ऊपर फेंकने लगा ॥ ४८ ॥ |
| तामुवाच बलोन्मत्तस्तिष्ठ देवि रणाङ्गणे।<br>अद्याहं त्वां हनिष्यामि रूपयौवनभूषिताम् ॥ ४९ | बलसे उन्मत्त उस दानवने भगवतीसे कहा—हे देवि! ठहरो। रूप और यौवनसे सम्पन्न तुमको मैं आज मार डालूँगा ॥ ४९ ॥ |
| मूर्खासि मदमत्ताद्य यन्मया सह सङ्गरम्।<br>करोषि मोहितातीव मृषा बलवती खरा ॥ ५० | तुम मूर्ख हो जो कि मदमत्त हो मेरे साथ युद्ध कर रही हो। तुम अज्ञानवश अपनेको व्यर्थ ही बलवती समझकर मुखर हो रही हो ॥ ५० ॥ |
| हत्वा त्वां निहनिष्यामि देवान्कपटपण्डितान्।<br>ये नारीं पुरतः कृत्वा जेतुमिच्छन्ति मां शठाः ॥ ५१ | तुम्हें मारनेके बाद मैं उन सब कपटपण्डित देवताओंको मार डालूँगा, जो शठ देवतागण एक स्त्रीको आगे करके मुझे जीतना चाहते हैं ॥ ५१ ॥ |
| देव्युवाच<br>मा गर्वं कुरु मन्दात्मंस्तिष्ठ तिष्ठ रणाङ्गणे।<br>करिष्यामि निरातङ्कान्हत्वा त्वां सुरसत्तमान् ॥ ५२ | देवी बोलीं—अरे मूर्ख! व्यर्थ अभिमान मत करो, रणभूमिमें ठहर जाओ, ठहर जाओ। तुम्हें मारकर मैं देवताओंको निर्भय बना दूँगी ॥ ५२ ॥ |
| पीत्वाद्य माधवीं मिष्टां शातयामि रणेऽधम।<br>देवानां दुःखदं पापं मुनीनां भयकारकम् ॥ ५३ | अरे अधम! मैं अभी मधुर मद्य पीकर देवताओंके लिये दुःखदायी और मुनियोंको भयभीत करनेवाले तुझ पापीको रणमें काट डालूँगी ॥ ५३ ॥ |
| ६२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ | | :--- | :--- |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इत्युक्त्वा चषकं हैमं गृहीत्वा सुरया युतम्।<br>पपौ पुनः पुनः क्रोधाद्धन्तुकामा महासुरम्॥ ५४ | ऐसा कहकर क्रोधपूर्वक उस दैत्यको मार डालनेके विचारसे भगवती मद्यपूर्ण सोनेका पात्र लेकर बारम्बार उसे पीने लगीं॥ ५४॥ |
| पीत्वा द्राक्षासवं मिष्टं शूलमादाय सत्वरा।<br>दुद्राव दानवं देवी हर्षयन्देवतागणान्॥ ५५ | उस मीठे द्राक्षारसको पीकर भगवती बड़े वेगसे अपना त्रिशूल उठाकर देवताओंको हर्षित करती हुई उस दानवपर झपटीं॥ ५५॥ |
| देवास्तां तुष्टुवुः प्रेम्णा चक्रुः कुसुमवर्षणम्।<br>जय जीवेति ते प्रोचुर्दुन्दुभीनाञ्च निःस्वनैः॥ ५६ | उस समय देवता प्रेमपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे और पुष्पवर्षा करने लगे। वे दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ देवीकी जय हो—ऐसा बार-बार कहने लगे॥ ५६॥ |
| ऋषयः सिद्धगन्धर्वाः पिशाचोरगचारणाः।<br>किन्नराः प्रेक्ष्य संग्रामं मुदिता गगने स्थिताः॥ ५७ | सभी ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व, पिशाच, नाग, चारण और किन्नरगण आकाशमण्डलमें स्थित होकर उस युद्धको देखकर आनन्दित हो रहे थे॥ ५७॥ |
| सोऽपि नानाविधान्देहान्कृत्वा कृत्वा पुनः पुनः।<br>मायामयाञ्जघानाजौ देवीं कपटपण्डितः॥ ५८ | कपटकार्यमें प्रवीण वह महिषासुर रणभूमिमें बार-बार विविध प्रकारके मायामय शरीर धारण करके भगवतीपर प्रहार करने लगा॥ ५८॥ |
| चण्डिकापि च तं पापं त्रिशूलेन बलाद्हृदि।<br>ताडयामास तीक्ष्णेन क्रोधादारुणलोचना॥ ५९ | तब क्रोधसे लाल नेत्र करके चण्डिकाने अपने तीक्ष्ण त्रिशूलसे उस पापीके हृदयदेशपर बलपूर्वक आघात किया॥ ५९॥ |
| ताडितोऽसौ पपातोर्व्यां मूर्च्छामान मुहूर्तकम्।<br>पुनरुत्थाय चामुण्डां पद्भ्यां वेगादताडयत्॥ ६०<br><br>विनिहत्य पदाघातैर्जहास च मुहुर्मुहुः।<br>रुराव दारुणं शब्दं देवानां भयकारकम्॥ ६१ | उससे आहत होकर महिषासुर भूमिपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया, किंतु मुहूर्तभर बाद पुनः उठकर अपने पैरोंसे वेगपूर्वक देवी चामुण्डाको मारने लगा। इस प्रकार पदप्रहारोंसे देवीको चोट पहुँचाकर वह बारम्बार हँसने लगा और देवताओंको भयभीत कर देनेवाली भीषण ध्वनि करके चिल्लाने लगा॥ ६०-६१॥ |
| ततो देवी सहस्रारं सुनाभं चक्रमत्तमम्।<br>करे कृत्वा जगादोच्चैः संस्थितं महिषासुरम्॥ ६२<br><br>पश्य चक्रं मदान्धाद्य तव कण्ठनिकृन्तनम्।<br>क्षणमात्रं स्थिरो भूत्वा यमलोकं व्रजाधुना॥ ६३ | तदनन्तर भगवतीने हजार अरों और सुन्दर नाभिवाला एक उत्कृष्ट चक्र हाथमें लेकर अपने समक्ष खड़े महिषासुरसे उच्च स्वरमें कहा—अरे मदान्ध! तुम्हारे गलेको काट डालनेवाले इस चक्रकी ओर देखो। तनिक देर और ठहरकर अब तुम यमलोकके लिये प्रस्थान कर दो॥ ६२-६३॥ |
| इत्युक्त्वा दारुणं चक्रं मुमोच जगदम्बिका।<br>शिरश्छिन्नं रथाङ्गेन दानवस्य तदा रणे॥ ६४<br><br>सस्राव रुधिरं चोष्णं कण्ठनालाद् गिरेर्यथा।<br>गैरिकाद्यरुणं प्रौढं प्रवाहभिव नैर्झरम्॥ ६५ | ऐसा कहकर जगदम्बाने युद्धभूमिमें उस दारुण चक्रको चला दिया। तब चक्रसे उस दानवका सिर कट गया। उस समय उसके कण्ठकी नलीसे इस प्रकार उष्ण रक्त बहने लगा, जैसे गेरू आदिसे युक्त लाल पानीका झरना बड़े वेगके साथ पर्वतसे गिर रहा हो। [मस्तक कट जानेपर] उस दानवका |
अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६२९
अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६२९
| कबन्धस्तस्य दैत्यस्य भ्रमन्वै पतितः क्षितौ।<br>जयशब्दश्च देवानां बभूव सुखवर्धनः॥ ६६ | धड़ घूमता हुआ भूमिपर गिर पड़ा। उस समय देवताओंके [मुखसे] सुखकी वृद्धि करनेवाला विजयघोष होने लगा॥ ६४–६६॥ |
|---|---|
| सिंहस्त्वतिबलस्तत्र पलायनपरानथ।<br>दानवान्भक्षयामास क्षुधार्त इव सङ्गरे॥ ६७ | अब भगवतीका महाबली सिंह मानो भूखसे व्याकुल होकर रणभूमिमें भागते हुए दानवोंको खाने लगा॥ ६७॥ |
| मृते च महिषे क्रूरे दानवा भयपीडिताः।<br>मृतशेषाश्च ये केचित्पातालं ते ययुर्नृप॥ ६८ | हे नृप! क्रूर महिषासुरके मर जानेपर जो कोई दानव मरनेसे शेष बच गये थे, वे भयसे सन्त्रस्त होकर पाताल चले गये॥ ६८॥ |
| आनन्दं परमं जग्मुर्देवास्तस्मिन्निपातिते।<br>मुनयो मानवाश्चैव ये चान्ये साधवः क्षितौ॥ ६९ | उसके मर जानेपर भूमण्डलपर जो भी देवता, मुनिगण, मनुष्य और साधुजन थे, वे परम आनन्दित हो गये॥ ६९॥ |
| चण्डिकापि रणं त्यक्त्वा शुभे देशेऽथ संस्थिता।<br>देवास्तत्राययुः शीघ्रं स्तोतुकामाः सुखप्रदाम्॥ ७० | भगवती चण्डिका भी रणभूमि छोड़कर एक पवित्र स्थानमें विराजमान हो गयीं। देवता भी उन सुख प्रदान करनेवाली भगवतीकी स्तुति करनेकी इच्छासे शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे॥ ७०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषासुरवधो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
अथैकोनविंशोऽध्यायः
देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति
| व्यास उवाच<br>अथ प्रमुदिताः सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः।<br>महिषं निहतं दृष्ट्वा तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम्॥ १ | व्यासजी बोले—महिषासुरका संहार देखकर इन्द्र आदि प्रधान देवता परम प्रसन्न हुए और वे जगदम्बाकी स्तुति करने लगे॥ १॥ |
|---|---|
| देवा ऊचुः<br>ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरिदं महेशः<br>शक्त्या तवैव हरते ननु चान्तकाले।<br>ईशा न तेऽपि च भवन्ति तया विहीना-<br>स्तस्मात्त्वमेव जगतः स्थितिनाशकर्त्री॥ २ | देवता बोले—हे देवि! आपकी ही शक्तिसे ब्रह्मा इस जगत्का सृजन करते हैं, भगवान् विष्णु पालन करते हैं और शिवजी प्रलयकालमें संहार करते हैं। आपकी शक्तिसे रहित हो जानेपर वे कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं हो सकते। अतः जगत्का सृजन, पालन और संहार करनेवाली आप ही हैं॥ २॥ |
| कीर्तिर्मतिः स्मृतिगती करुणा दया त्वं<br>श्रद्धा धृतिश्च वसुधा कमलाजपा च।<br>पुष्टिः कलाथ विजया गिरिजा जया त्वं<br>तुष्टिः प्रमा त्वमसि बुद्धिरुमा रमा च॥ ३ | इस संसारमें कीर्ति, मति, स्मृति, गति, करुणा, दया, श्रद्धा, धृति, वसुधा, कमला, अजपा, पुष्टि, कला, विजया, गिरिजा, जया, तुष्टि, प्रमा, बुद्धि, उमा, रमा, |
| ६३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विद्या क्षमा जगति कान्तरिपीह मेधा<br>सर्वं त्वमेव विदिता भुवनत्रयेऽस्मिन्।<br>आभिर्विना तव तु शक्तिभिराशु कर्तुं<br>को वा क्षमः सकललोकनिवासभूमे॥ ४ | विद्या, क्षमा, कान्ति और मेधा—ये सब शक्तियाँ आप ही हैं। इस त्रिलोकीमें आप विख्यात हैं। सम्पूर्ण जगत्को आश्रय देनेवाली हे देवि! आपकी इन शक्तियोंके बिना कौन व्यक्ति कुछ भी स्वयं कर सकनेमें समर्थ है?॥ ३-४॥ |
| त्वं धारणा ननु न चेदसि कूर्मनागौ<br>धर्तुं क्षमौ कथमिलामपि तौ भवेताम्।<br>पृथ्वी न चेत्त्वमसि वा गगने कथं स्था-<br>स्यत्येतदम्ब निखिलं बहुभारयुक्तम्॥ ५ | हे अम्ब! धारणा शक्ति भी निश्चितरूपसे आप ही हैं, अन्यथा कच्छप और शेषनाग इस पृथ्वीको धारण कर सकनेमें कैसे समर्थ हो पाते? पृथ्वी-शक्ति भी आप ही हैं। यदि आप इस रूपमें न होतीं तो प्रचुर भारसे सम्पन्न यह सम्पूर्ण जगत् आकाशमें कैसे ठहर सकता था॥ ५॥ |
| ये वा स्तुवन्ति मनुजा अमरान्विमूढा<br>मायागुणैस्तव चतुर्मुखविष्णुरुद्रान्।<br>शुभ्रांशुवह्लियमवायुगणेशमुख्यान्<br>किं त्वामृते जननि ते प्रभवन्ति कार्ये॥ ६ | हे जननि! जो मनुष्य मायाके गुणोंसे प्रभावित होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, चन्द्रमा, अग्नि, यम, वायु, गणेश आदि प्रमुख देवताओंकी स्तुति करते हैं, वे अज्ञानी ही हैं; क्योंकि क्या वे देवता भी आपकी कृपाशक्तिके बिना उन मनुष्योंको कार्य-फल प्रदान करनेमें समर्थ हो सकते हैं?॥ ६॥ |
| ये जुह्वति प्रविततेऽल्पधियोऽम्ब यज्ञे<br>वह्लौ सुरान्समधिकृत्य हविः समृद्धम्।<br>स्वाहा न चेत्त्वमसि ते कथमापुरुद्धा<br>त्वामेव किं न हि यजन्ति ततो हि मूढाः॥ ७ | हे अम्ब! जो लोग सुविस्तृत यज्ञमें देवताओंको अधिकृत करके अग्निमें पुष्कल आहुति देते हैं, वे मन्दमति हैं; क्योंकि यदि स्वाहाके रूपमें आप न होतीं, तो वे देवता हविर्द्रव्यको कैसे पाते? तब फिर वे मूढ़ आपका ही यजन क्यों नहीं करते?॥ ७॥ |
| भोगप्रदासि भवतीह चराचराणां<br>स्वांशैर्ददासि खलु जीवनमेव नित्यम्।<br>स्वीयान्सुराञ्जननि पोषयसीह यद्व-<br>त्तद्वत्परानपि च पालयसीति हेतोः॥ ८ | आप जगत्के चराचर प्राणियोंको भोग प्रदान करती हैं और अपने अंशोंसे उन्हें नित्य जीवन देती हैं। हे जननि! जिस प्रकार आप अपने प्रिय देवताओंका पोषण करती हैं, उसी प्रकार अपने शत्रुओंका भी पालन करती हैं॥ ८॥ |
| मातः स्वयं विरचितान्विपिने विनोदा-<br>द्वन्ध्यान्पलाशलहितांश्च कटूंश्च वृक्षान्।<br>नोच्छेदयन्ति पुरुषा निपुणाः कथञ्चि-<br>त्तस्मात्त्वमप्यतितरां परिपासि दैत्यान्॥ ९ | हे माता! बुद्धिमान् पुरुष विनोदके लिये उद्यानमें लगाये गये वृक्षोंमेंसे कुछ वृक्षोंके फल और पत्तोंसे रहित हो जाने अथवा उन वृक्षोंका रस कडुवा निकल जानेपर भी उन्हें कभी भी नहीं काटते, उसी प्रकार आप भी [अपने ही बनाये हुए] दैत्योंकी भलीभाँति रक्षा करती हैं॥ ९॥ |
| यत्त्वं तु हंसि रणमूर्धिन शरैरराती-<br>न्देवाङ्गनासुरतकेलिमतीन्विदित्वा ।<br>देहान्तरेऽपि करुणारसमाददाना<br>तत्ते चरित्रमिदमीप्सितपूरणाय॥ १० | करुणारससे ओत-प्रोत हृदयवाली आप रणभूमिमें बाणोंद्वारा शत्रुओंका जो संहार करती हैं, वह भी उनका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये ही होता है; क्योंकि दूसरे जन्ममें देवांगनाओंके साथ क्रीड़ा-विहार करनेकी इच्छावाला उन्हें जानकर ही आपके द्वारा ऐसा किया जाता है; ऐसा आपका अद्भुत चरित्र है॥ १०॥ |
अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६३१
अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चित्रं त्वमी यदसुभी रहिता न सन्ति<br>त्वच्चिन्तितेन दनुजाः प्रथितप्रभावाः।<br>येषां कृते जननि देहनिबन्धनं ते<br>क्रीडारसस्तव न चान्यतरोऽत्र हेतुः ॥ ११ | हे माता! बड़ी विलक्षण बात तो यह है कि विख्यात प्रभावोंवाले उन दैत्योंका संहार जो आपके संकल्पमात्रसे ही सम्भव था, इसके लिये आपको अवतार लेना पड़ा। यह शरीर धारण करके आप वास्तवमें इसीके सहारे लीला करती हैं; इसमें कोई दूसरा कारण नहीं है ॥ ११ ॥ |
| प्राप्ते कलावहह दुष्तरे च काले<br>न त्वां भजन्ति मनुजा ननु वञ्चितास्ते।<br>धूर्तैः पुराणचतुरैर्हरिशङ्कराणां<br>सेवापराश्च विहितास्तव निर्मितानाम् ॥ १२ | जो मनुष्य इस विकराल कलिके उपस्थित होनेपर भी आपकी आराधना नहीं करते, अपितु आपके ही द्वारा निर्मित विष्णु, शिव आदि देवताओंकी उपासनामें तत्पर रहते हैं, वे लोग पुराण-चतुर धूर्तजनोंके द्वारा निश्चित रूपसे ठग लिये गये हैं ॥ १२ ॥ |
| ज्ञात्वा सुरांस्तव वशानसुरादितांश्च<br>ये वै भजन्ति भुवि भावयुता विभग्नान्।<br>धृत्वा करे सुविमलं खलु दीपकं ते<br>कूपे पतन्ति मनुजा विजलेऽतिघोरे ॥ १३ | यह जानकर भी कि देवता आपके अधीन हैं तथा दैत्योंके द्वारा छिन्न-भिन्न और प्रताड़ित किये जाते हैं—जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भूलोकमें अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे मानो हाथमें अत्यन्त प्रकाशमान दीपक लेकर भी किसी जलरहित भयानक कूपमें जा गिरते हैं ॥ १३ ॥ |
| विद्या त्वमेव सुखदाऽसुखदाप्यविद्या<br>मातस्त्वमेव जननार्तिहरा नराणाम्।<br>मोक्षार्थिभिस्तु कलिता किल मन्दधीभि-<br>र्नाराधिता जननि भोगपरैस्तथाज्ञैः ॥ १४ | हे माता! आप ही सुखदायिनी विद्या तथा दुःखदायिनी अविद्या हैं और आप ही मनुष्योंके जन्म-मृत्युका दुःख दूर करनेवाली हैं। हे जननि! मोक्षकी कामना करनेवाले लोग तो आपकी आराधना करते हैं, किंतु मन्दबुद्धि अज्ञानी तथा विषयभोगपरायण मनुष्य आपकी आराधना नहीं करते ॥ १४ ॥ |
| ब्रह्मा हरश्च हरिरप्यनिशं शरण्यं<br>पादाम्बुजं तव भजन्ति सुरास्तथान्ये।<br>तद्वै न येऽल्पमतयो मनसा भजन्ति<br>भ्रान्ताः पतन्ति सततं भवसागरे ते ॥ १५ | ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य देवतागण आपके शरणदायक चरणकमलकी निरन्तर उपासना करते हैं, किंतु जो अल्पबुद्धि मनुष्य भ्रमित होकर मनसे आपकी आराधना नहीं करते, वे संसार-सागरमें बार-बार गिरते हैं ॥ १५ ॥ |
| चण्डि त्वदङ्घ्रिजलजोत्थरजःप्रसादै-<br>र्ब्रह्मा करोति सकलं भुवनं भवादौ।<br>शौरिश्च पाति खलु संहरते हरस्तु<br>त्वां सेवते न मनुजस्त्विह दुर्भगोऽसौ ॥ १६ | हे चण्डिके! आपके चरण-कमलसे उत्पन्न हुई धूलिके प्रभावसे ही ब्रह्मा सृष्टिके प्रारम्भमें सम्पूर्ण भुवनकी रचना करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिवजी संहार करते हैं। इस लोकमें जो मनुष्य आपकी उपासना नहीं करता, वह अभागा है ॥ १६ ॥ |
| वाग्देवता त्वमसि देवि सुरासुराणां<br>वक्तुं न तेऽमरवराः प्रभवन्ति शक्ताः।<br>त्वं चेन्मुखे वससि नैव यदैव तेषां<br>यस्माद्वदन्ति मनुजा न हि तद्विहीनाः ॥ १७ | हे देवि! आप ही देवताओं तथा दैत्योंकी वाग्देवता हैं। यदि आप मुखमें विराजमान न रहतीं, तो बड़े-बड़े देवता भी बोलनेमें समर्थ नहीं हो सकते थे। मुख होनेपर भी मनुष्य उस वाक्शक्तिके बिना बोल नहीं सकता ॥ १७ ॥ |
| ६३२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| शप्तो हरिस्तु भृगुणा कुपितेन कामं<br>मीनो बभूव कमठः खलु सूकरस्तु।<br>पश्चान्नृसिंह इति यश्छलकृद्धरायां<br>तान्सेवतां जननि मृत्युभयं न किं स्यात्॥ १८ | हे जननि! महर्षि भृगुने कुपित होकर भगवान् विष्णुको शाप दे दिया, जिससे उन्हें पृथ्वीपर बारम्बार मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह और छली वामनका अवतार लेना पड़ा। तो फिर [एक ऋषिके शापसे अपनी रक्षा न कर पानेवाले ऐसे विष्णु आदि] उन देवताओंकी उपासना करनेवाले लोगोंको मृत्युका भय क्यों नहीं बना रहेगा?॥ १८॥ |
| शम्भोः पपात भुवि लिङ्गमिदं प्रसिद्धं<br>शापेन तेन च भृगोर्विपिने गतस्य।<br>तं ये नरा भुवि भजन्ति कपालिनं तु<br>तेषां सुखं कथमहापि परत्र मातः॥ १९ | हे माता! सम्पूर्ण संसारमें यह बात प्रसिद्ध है कि भृगुमुनिके काननमें गये हुए भगवान् शिवका लिंग मुनिके शापके कारण कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा था। अतः जो मनुष्य पृथ्वीपर उन कापालिक शिवको ही भजते हैं, उन्हें इस लोक तथा परलोकमें भी सुख कैसे प्राप्त हो सकता है?॥ १९॥ |
| योऽभूद् गजाननगणाधिपतिर्महेशा-<br>त्तं ये भजन्ति मनुजा वितथप्रपन्नाः।<br>जानन्ति ते न सकलार्थफलप्रदात्रीं<br>त्वां देवि विश्वजननीं सुखसेवनीयाम्॥ २० | शिवसे जो गणोंके अधिपति गणेश उत्पन्न हुए हैं—उन गणेशको जो लोग भजते हैं, उनकी यह शरणागति व्यर्थ है। हे देवि! वे लोग सभी प्रकारके अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली तथा सुखपूर्वक आराधनीय आप जगज्जननीको नहीं जानते हैं॥ २०॥ |
| चित्रं त्वयारिजनतापि दयार्द्रभावा-<br>द्धत्वा रणे शितशरैर्गमिता द्युलोकम्।<br>नोचेत्स्वकर्मनिचिते निरये नितान्तं<br>दुःखातिदुःखगतिमापदमापतेत्सा ॥ २१ | यह बड़ी विचित्र बात है कि आपने अपने शत्रु-दैत्योंपर भी दया करके उन्हें तीक्ष्ण बाणोंसे रणमें मारकर स्वर्गलोक भेज दिया। यदि आप ऐसा न करतीं तो वे अपने कर्मोंके परिणामस्वरूप प्राप्त होनेवाले घोर नरकमें बड़े-से-बड़े दुःख और विपत्तिमें पड़ जाते॥ २१॥ |
| ब्रह्मा हरश्च हरिरप्युत गर्वभावा-<br>ज्जानन्ति तेऽपि विबुधा न तव प्रभावम्।<br>केऽन्ये भवन्ति मनुजा विदितुं समर्थाः<br>सम्मोहितास्तव गुणैरमितप्रभावैः॥ २२ | जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता भी अहंकारके कारण आपकी महिमा नहीं जानते, तब आपके अमित प्रभाववाले गुणोंसे मोहित तुच्छ मनुष्य आपकी महिमाको कैसे जान सकेंगे?॥ २२॥ |
| क्लिश्यन्ति तेऽपि मुनयस्तव दुर्विभाव्यं<br>पादाम्बुजं न हि भजन्ति विमूढचित्ताः।<br>सूर्याग्निसेवनपराः परमार्थतत्त्वं<br>ज्ञातं न तैः श्रुतिशतैरपि वेदसारम्॥ २३ | जो मुनिगण आपके स्वरूपको बड़ी कठिनतासे ध्यानमें आनेवाला समझकर आपके चरणकमलकी उपासना नहीं करते; अपितु सूर्य, अग्नि आदिकी उपासनामें लगे रहते हैं, वे मूढ़बुद्धि अनेकविध कष्ट पाते हैं। समस्त श्रुतियोंके द्वारा प्रतिपादित वेदसारस्वरूप परमार्थतत्त्वको वे नहीं जान पाते॥ २३॥ |
* इस पुराणमें जगदम्बा पराशक्तिकी विशिष्टता प्रदर्शित करनेके लिये ही अन्य देवोंकी उपासनासे विरत रहनेकी बात कही गयी है। वैसे तो भगवती एवं ब्रह्मा-विष्णु-महेश आदि देवगण भी परमात्मप्रभुके ही स्वरूप हैं; उनमें कोई भेद नहीं है।
| अ० १९ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६३३ |
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| मन्ये गुणास्तव भुवि प्रथितप्रभावाः<br>कुर्वन्ति ये हि विमुखान्ननु भक्तिभावात्।<br>लोकान्स्वबुद्धिरचितैर्विविधागमैश्च<br>विष्ण्वीशभास्करगणेशपरान्विधाय ॥ २४ | मैं तो यही समझता हूँ कि अद्भुत प्रभावोंवाले जो आपके सत्त्व, रज और तम गुण हैं, वे ही मनुष्योंको उन्हींकी अपनी ही बुद्धिद्वारा विरचित अनेक प्रकारके शास्त्रोंमें उलझाकर उन्हें विष्णु, शिव, सूर्य, गणेश आदिका उपासक बनाकर आपके भक्तिभावसे सर्वथा विमुख कर देते हैं॥ २४॥ | | कुर्वन्ति ये तव पदाद्विमुखान्नराग्या-<br>न्स्वोक्तागमैर्हरिहरार्चनभक्तियोगैः ।<br>तेषां न कुप्यसि दयां कुरुषेऽम्बिके त्वं<br>तान्मोहमन्त्रनिपुणान्प्रथयस्यलं च॥ २५ | हे अम्बिके! जो लोग विष्णु तथा शिवकी पूजा और भक्तिसे परिपूर्ण शास्त्रोंके उपदेशद्वारा ब्राह्मणोंको आपके चरणोंसे विमुख कर देते हैं, उनके ऊपर भी आप क्रोध नहीं करती हैं, बल्कि दया ही करती हैं और इसके अतिरिक्त मोहन आदि मन्त्रोंके ज्ञाताओंको भी आप संसारमें बहुत प्रसिद्ध बना देती हैं॥ २५॥ | | तुर्ये युगे भवति चातिबलं गुणस्य<br>तुर्यस्य तेन मथितान्यसदागमानि।<br>त्वां गोपयन्ति निपुणाः कवयः कलौ वै<br>त्वत्कल्पितान्सुरगणानपि संस्तुवन्ति॥ २६ | सत्ययुगमें सत्त्वगुणकी प्रबलता रहती है, अतः उस युगमें असत्-शास्त्रोंपर आस्था नहीं हो पाती। किंतु कलिमें तो कवित्वके अभिमानी लोग आपकी उपेक्षा करते हैं और आपहीके द्वारा बनाये गये देवताओंकी स्तुति करते हैं॥ २६॥ | | ध्यायन्ति मुक्तिफलदां भुवि योगसिद्धां<br>विद्यां पराञ्च मुनयोऽतिविशुद्धसत्त्वाः।<br>ते नाप्नुवन्ति जननीजठरे तु दुःखं<br>धन्यास्त एव मनुजास्त्वयि ये विलीनाः॥ २७ | इस पृथवीतलपर अत्यन्त शुद्ध अन्तःकरणवाले जो सात्त्विक मुनिगण मुक्ति-फल प्रदान करनेवाली योगसिद्धा एवं पराविद्यास्वरूपिणी आप भगवतीका ध्यान करते हैं, वे पुनः माताके गर्भमें आकर कष्ट नहीं पाते। जो मनुष्य आपमें ध्यानमग्न हैं, वे धन्य हैं॥ २७॥ | | चिच्छक्तिरस्ति परमात्मनि येन सोऽपि<br>व्यक्तो जगत्सु विदितो भवकृत्यकर्ता।<br>कोऽन्यस्त्वया विरहितः प्रभवत्यमुष्मिन्<br>कर्तुं विहर्तुमपि सञ्चलितुं स्वशक्त्या॥ २८ | आप चित्-शक्ति हैं और वही चित्-शक्ति परमात्मामें विद्यमान है, जिसके कारण वे भी [नाम और रूपसे] अभिव्यक्त होकर इस जगत्के सृजन, पालन एवं संहाररूपी कार्योंके कर्ताके रूपमें लोकोंमें प्रसिद्ध होते हैं। उन परमात्माके अतिरिक्त दूसरा कौन है, जो आपसे रहित होकर अपनी शक्तिसे इस जगत्का सृजन, पालन और संहार करनेमें समर्थ हो सकता है?॥ २८॥ | | तत्त्वानि चिद्विरहितानि जगद्विधातुं<br>किं वा क्षमाणि जगदम्ब यतो जडानि।<br>किं चेन्द्रियाणि गुणकर्मयुतानि सन्ति<br>देवि त्वया विरहितानि फलं प्रदातुम्॥ २९ | हे जगदम्बे! क्या चित्-शून्य तत्त्व जगत्की रचना करनेमें समर्थ हो सकते हैं? चूंकि तत्त्व जड़ हैं, अतः वे जगत्की रचनामें समर्थ नहीं हैं। हे देवि! यद्यपि इन्द्रियाँ गुण तथा कर्मसे युक्त हैं, फिर भी आपसे रहित होकर क्या वे फल प्रदान कर सकती हैं?॥ २९॥ |
| ६३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
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| देवा मखेष्वपि हुतं मुनिभिः स्वभागं<br>गृहीयुरम्ब विधिवत्प्रतिपादितं किम्।<br>स्वाहा न चेत्त्वमसि तत्र निमित्तभूता<br>तस्मात्त्वमेव ननु पालयसीव विश्वम्॥ ३० | हे माता! यदि आप यज्ञोंमें 'स्वाहा' के रूपमें निमित्त न बनतीं तो क्या देवगण उन यज्ञोंमें मुनियोंके द्वारा विधिवत् प्रदत्त आहुति-रूप यज्ञभाग प्राप्त करते? अतः यह निश्चय हो गया कि आप ही विश्वका पालन करती हैं॥ ३०॥ | | सर्वं त्वयेदमखिलं विहितं भवादौ<br>त्वं पासि वै हरिहरप्रमुखान्दिगीशान्।<br>कालेऽत्सि विश्वमपि ते चरितं भवाद्यं<br>जानन्ति नैव मनुजाः क्व नु मन्दभाग्याः॥ ३१ | सृष्टिके प्रारम्भमें इस सम्पूर्ण जगत्की रचना आपने ही की है, आप ही विष्णु-शिव आदि प्रमुख देवताओं तथा दिक्पालोंकी रक्षा करती हैं और प्रलयकालमें आप ही सम्पूर्ण विश्वको अपनेमें विलीन कर लेती हैं। [हे देवि!] जब ब्रह्मा आदि देवता भी आपके आद्य चरित्रको नहीं जान पाते, तब मन्दभाग्य हम देवता उसे कैसे जान सकते हैं?॥ ३१॥ | | हत्वासुरं महिषरूपधरं महोग्रं<br>मातस्त्वया सुरगणः किल रक्षितोऽयम्।<br>कां ते स्तुतिं जननि मन्दधियो विदामो<br>वेदा गतिं तव यथार्थतया न जग्मुः॥ ३२ | हे माता! आपने महिषका रूप धारण करनेवाले अत्यन्त उग्र असुरका वध करके इस देवसमुदायकी रक्षा की है। हे जननि! जब वेद भी यथार्थरूपसे आपकी गतिको नहीं जान पाये, तब हम मन्दबुद्धि देवता उसे कैसे जान सकते हैं, हम कैसे आपकी स्तुति करें?॥ ३२॥ | | कार्यं कृतं जगति नो यदसौ दुरात्मा<br>वैरी हतो भुवनकण्टकदुर्विभाव्यः।<br>कीर्तिः कृता ननु जगत्सु कृपा विधेया-<br>प्यस्मांश्च पाहि जननि प्रथितप्रभावे॥ ३३ | विख्यात प्रभाववाली हे जननि! आपने जगत्में महान् कार्य किया है जो कि आपने संसारके अचिन्त्य कण्टकस्वरूप हमारे शत्रु दुरात्मा महिषासुरका वध कर दिया। ऐसा करके आपने सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी कीर्ति स्थापित कर दी है, अब आप सारे संसारपर अनुग्रह करें और हमारी रक्षा करें॥ ३३॥ | | व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैर्देवी तानुवाच मृदुस्वरा।<br>अन्यत्कार्यं च दुःसाध्यं ब्रुवन्तु सुरसत्तमाः॥ ३४<br><br>यदा यदा हि देवानां कार्यं स्यादतिदुर्घटम्।<br>स्मर्तव्याहं तदा शीघ्रं नाशयिष्यामि चापदम्॥ ३५ | व्यासजी बोले— इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर देवीने मधुर स्वरमें उनसे कहा—हे श्रेष्ठ देवतागण! इसके अतिरिक्त भी कोई दुःसाध्य कार्य हो तो उसे आपलोग बता दीजिये। जब-जब आप देवताओंके सामने कोई महान् दुःसाध्य कार्य उपस्थित हो, तब-तब आपलोग मेरा स्मरण कीजियेगा; मैं उस संकटको शीघ्र ही दूर कर दूँगी॥ ३४-३५॥ | | देवा ऊचुः<br>सर्वं कृतं त्वया देवि कार्यं नः खलु साम्प्रतम्।<br>यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः॥ ३६ | देवता बोले— हे देवि! इस समय आपने हमारा सारा कार्य पूर्ण कर दिया है जो कि आपके द्वारा हमारा शत्रु यह महिषासुर मार डाला गया॥ ३६॥ |
| अ० २० ] | पञ्चम स्कन्ध | ६३५ |
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| स्मरिष्यामो यथा तेऽम्ब सदैव पदपङ्कजम्।<br>तथा कुरु जगन्मातर्भक्तिं त्वय्यप्यचञ्चलाम्॥ ३७ | हे अम्ब! हे जगज्जननि! अब आप हमारे मनमें अपने प्रति ऐसी अविचल भक्ति स्थापित कीजिये कि हम सदा आपके चरण-कमलका स्मरण करते रहें॥ ३७॥ |
| अपराधसहस्राणि मातैव सहते सदा।<br>इति ज्ञात्वा जगद्योनिं न भजन्ते कुतो जनाः॥ ३८ | माता ही [अपनी सन्तानके] हजारों अपराध सह सकती है—ऐसा समझकर लोग जगत्की उत्पत्तिस्वरूपा भगवतीकी उपासना क्यों नहीं करते?॥ ३८॥ |
| द्वौ सुपर्णौ तु देहेऽस्मिंस्तयोः सख्यं निरन्तरम्।<br>नान्यः सखा तृतीयोऽस्ति योऽपराधं सहेत हि॥ ३९<br><br>तस्माज्जीवः सखायं त्वां हित्वा किं नु करिष्यति।<br>पापात्मा मन्दभाग्योऽसौ सुरमानुषयोनिषु॥ ४०<br><br>प्राप्य देहं सुदुष्प्रापं न स्मरेत्त्वां नराधमः।<br>मनसा कर्मणा वाचा ब्रूमः सत्यं पुनः पुनः॥ ४१ | इस देहरूपी वृक्षपर जीवात्मा और परमात्मारूपी दो पक्षी रहते हैं। उन दोनोंमें सर्वदा मित्रता बनी रहती है, किंतु उनका तीसरा सखा ऐसा कोई भी नहीं है, जो अपराधको सह सके। अतएव यह जीव आप-जैसे मित्रको त्यागकर क्या करेगा? देवताओं और मानवोंकी योनिमें वह प्राणी पापी, मन्दभागी और अधम है, जो अत्यन्त दुर्लभ देह पाकर भी आपका स्मरण नहीं करता॥ ३९-४० १/२॥ |
| सुखे वाप्यथवा दुःखे त्वं नः शरणमद्भुतम्।<br>पाहि नः सततं देवि सर्वैस्तव वरायुधैः॥ ४२<br><br>अन्यथा शरणं नास्ति त्वत्पादाम्बुजरेणुतः। | हम मन, वाणी और कर्मसे बार-बार यह सत्य कह रहे हैं कि सुख अथवा दुःख—प्रत्येक परिस्थितिमें एकमात्र आप ही हमारे लिये अद्भुत शरण हैं। हे देवि! आप अपने समस्त श्रेष्ठ आयुधोंद्वारा हमारी निरन्तर रक्षा करें। आपके चरणकमलोंकी धूलिको छोड़कर हमारे लिये कोई दूसरा शरण नहीं है॥ ४१-४२ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैर्देवी तत्रैवान्तरधीयत।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवास्तां वीक्ष्य निर्गताम्॥ ४३ | व्यासजी बोले— इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर भगवती जगदम्बा वहीं अन्तर्धान हो गयीं। तब उन्हें अन्तर्हित देखकर देवता बड़े विस्मयमें पड़ गये॥ ४३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीसान्त्वनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
अथ विंशोऽध्यायः
देवीका मणिद्वीप पधारना तथा राजा शत्रुघ्नका भूमण्डलाधिपति बनना
| जनमेजय उवाच<br>अथाद्भुतं वीक्ष्य मुने प्रभावं<br>देव्या जगच्छान्तिकरं परञ्च।<br>न तृप्तिरस्ति द्विजवर्य शृण्वतः<br>कथामृतं ते मुखपद्मजातम्॥ १ | जनमेजय बोले— हे मुने! अब मैंने भगवतीके अत्यन्त अद्भुत तथा जगत्को शान्ति प्रदान करनेवाले प्रभावको तो देख लिया, फिर भी हे द्विजवर! आपके मुखारविन्दसे निकली हुई सुधामयी कथाको बार-बार |
६३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २०
६३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २०
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अन्तर्हितायां च तदा भवान्यां<br>चक्रुश्च किं देवपुरोगमास्ते।<br>देव्याश्चरित्रं परमं पवित्रं<br>दुरापमेवाल्पपुण्यैर्नराणाम् ॥ २ | सुनते हुए भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। [अब आप बतायें] भगवतीके अन्तर्धान हो जानेपर उन प्रधान देवताओंने क्या किया? देवीका यह परम पावन चरित्र मनुष्योंके अल्प पुण्योंसे प्राप्त हो सकना सर्वथा दुर्लभ ही है॥ १-२॥ |
| कस्तृप्तिमाप्नोति कथामृतेन<br>भिन्नोऽल्पभाग्यात्पटुकर्णरन्ध्रः।<br>पीतेन येनामरतां प्रयाति<br>धिक्तान्नरान् ये न पिबन्ति सादरम्॥ ३ | अल्पभाग्यवाले मनुष्यको छोड़कर भगवतीके कथाश्रवणमें सदा तत्पर कर्णपुटवाला ऐसा कौन होगा जो देवीके कथामृतसे तृप्ति प्राप्त कर लेता है? जिस कथामृतका पान करनेसे मनुष्य अमरत्व प्राप्त कर लेता है, उसे जो आदरपूर्वक नहीं पीते, उन मनुष्योंको धिक्कार है॥ ३॥ |
| लीलाचरित्रं जगदम्बिकाया<br>रक्षान्वितं देवमहामुनीनाम्।<br>संसारवार्धेस्तरणं नराणां<br>कथं कृतज्ञा हि परित्यजेयुः॥ ४ | भगवती जगदम्बाका लीलाचरित्र देवताओं और बड़े-बड़े मुनियोंके लिये भी रक्षाका परम साधन है। [यह लीलाचरित्र] मनुष्योंको संसारसागरसे पार करनेके लिये एक नौका है। कृतज्ञजन उस चरित्रको भला कैसे त्याग सकते हैं?॥ ४॥ |
| मुक्ताश्च ये चैव मुमुक्षवश्च<br>संसारिणो रोगयुताश्च केचित्।<br>तेषां सदा श्रोत्रपुटैश्च पेयं<br>सर्वार्थदं वेदविदो वदन्ति॥ ५<br><br>तथा विशेषेण मुने नृपाणां<br>धर्मार्थकामेषु सदा रतानाम्।<br>मुक्ताश्च यस्मात्खलु तत्पिबन्ति<br>कथं न पेयं रहितैश्च तेभ्यः॥ ६ | जीवन्मुक्त तथा मोक्षकी कामना करनेवाले अथवा रोगग्रस्त जो कोई भी सांसारिक प्राणी हों, उन सबको चाहिये कि वे अपने कर्णपुटसे भगवतीके इस सर्वार्थदायक कथामृतका पान करते रहें—ऐसा वेदवेत्ता कहते हैं। हे मुने! धर्म, अर्थ और काममें तत्पर राजाओंको तो विशेष रूपसे कथामृतका पान करना चाहिये। जब मुक्त प्राणीतक उस कथामृतका पान करते हैं, तब मुक्तिसे वंचित जन इसका पान क्यों न करें!॥ ५-६॥ |
| यैः पूजिता पूर्वभवे भवानी<br>सत्कुन्दपुष्पैरथ चम्पकैश्च।<br>बैल्वैर्दलैस्ते भुवि भोगयुक्ता<br>नृपा भवन्तीत्यनुमेयमेवम्॥ ७ | यह अनुमान करना चाहिये कि जिन लोगोंने अपने पूर्वजन्ममें सुन्दर कुन्दपुष्पों, चम्पाके पुष्पों तथा बिल्वपत्रोंसे भगवतीका पूजन किया है, वे ही इस जन्ममें भूतलपर भोग तथा ऐश्वर्यसे सम्पन्न राजा होते हैं॥ ७॥ |
| ये भक्तिहीनाः समवाप्य देहं<br>तं मानुषं भारतभूमिभागे।<br>यैरार्चिता ते धनधान्यहीना<br>रोगान्विताः सन्ततिवर्जिताश्च॥ ८ | जो मनुष्य [पवित्र] भारत-भूभागमें यह मानवशरीर पाकर भी भगवतीकी भक्तिसे रहित हैं तथा जिन्होंने उनकी आराधना नहीं की, वे सदा धन-धान्यसे हीन, रोगग्रस्त और निःसन्तान रहते हैं; साध् |
| अ० २० ] | पञ्चम स्कन्ध | ६३७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भ्रमन्ति नित्यं किल दासभूता<br>आज्ञाकराः केवलभारवाहाः।<br>दिवानिशं स्वार्थपराः कदापि<br>नैवाप्नुवन्त्योदरपूर्तिमात्रम् ॥ ९ | ही वे लोग दूसरोंके दास बनकर निरन्तर घूमते रहते हैं और आज्ञाकारी होकर दूसरोंका भार ढोया करते हैं। वे दिन-रात स्वार्थसाधनमें लगे रहते हैं, फिर भी उन्हें अपना पेट भरनेतकके लिये अन्न कभी नहीं मिलता॥ ८-९॥ |
| अन्धाश्च मूका बधिराश्च खञ्जाः<br>कुष्ठान्विता ये भुवि दुःखभाजः।<br>तत्रानुमानं कविभिर्विधेयं<br>नाराधिता तैः सततं भवानी॥ १० | इस संसारमें जो लोग अन्धे, गूँगे, बहरे, लूले और कोढ़ीके रूपमें कष्ट भोग रहे हैं, उनके विषयमें विद्वानोंको यह अनुमान कर लेना चाहिये कि उन्होंने भगवतीकी निरन्तर आराधना नहीं की है॥ १०॥ |
| ये राजभोगान्वितऋद्धिपूर्णाः<br>संसेव्यमाना बहुभिर्मनुष्यैः।<br>दृश्यन्ति ये वा विभवैः समेता-<br>स्तैः पूजिताम्बेत्यनुमेयमेव॥ ११ | जो लोग राजोचित भोगसे युक्त, ऐश्वर्यसे सम्पन्न, अनेक मनुष्योंसे सेवित और वैभवशाली दिखायी पड़ते हैं, उनके विषयमें यह अनुमान लगाना चाहिये कि उन्होंने अवश्य ही जगदम्बाकी उपासना की है॥ ११॥ |
| तस्मात्सत्यवतीसूनो देव्याश्चरितमुत्तमम्।<br>कथयस्व कृपां कृत्वा दयावानसि साम्प्रतम्॥ १२ | अतएव हे सत्यवतीनन्दन! अब आप कृपा करके भगवतीके उत्तम चरित्रका वर्णन कीजिये; आप बड़े दयालु हैं॥ १२॥ |
| हत्वा तं महिषं पापं स्तुता सम्पूजिता सुरैः।<br>क्व गता सा महालक्ष्मीः सर्वतेजःसमुद्भवा॥ १३ | उस पापी महिषासुरका वध करनेके पश्चात् देवताओंसे भलीभाँति पूजित होकर सभी देवताओंके तेजसे प्रादुर्भूत वे भगवती महालक्ष्मी कहाँ चली गयीं?॥ १३॥ |
| कथितं ते महाभाग गतान्तर्धानमाशु सा।<br>स्वर्गे वा मृत्युलोके वा संस्थिता भुवनेश्वरी॥ १४<br><br>लयं गता वा तत्रैव वैकुण्ठे वा समाश्रिता।<br>अथवा हेमशैले सा तत्त्वतो मे वदाधुना॥ १५ | हे महाभाग! आपने अभी कहा है कि वे तुरंत अन्तर्धान हो गयीं। स्वर्गलोक अथवा मृत्युलोक किस जगह वे भगवती भुवनेश्वरी प्रतिष्ठित हुईं? वे वहींपर विलीन हो गयीं या वैकुण्ठधाममें विराजने लगीं अथवा वे सुमेरुपर्वतपर विराजमान हुईं, अब आप मुझे यह सब यथार्थरूपमें बतायें॥ १४-१५॥ |
| व्यास उवाच<br>पूर्वं मया ते कथितं मणिद्वीपं मनोहरम्।<br>क्रीडास्थानं सदा देव्या वल्लभं परमं स्मृतम्॥ १६<br><br>यत्र ब्रह्मा हरिः स्थाणुः स्त्रीभावं ते प्रपेदिरे।<br>पुरुषत्वं पुनः प्राप्य स्वानि कार्याणि चक्रिरे॥ १७<br><br>यः सुधासिन्धुमध्येऽस्ति द्वीपः परमशोभनः।<br>नानारूपैः सदा तत्र विहारं कुरुतेऽम्बिका॥ १८ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] इसके पहले मैं आपसे रमणीय मणिद्वीपका वर्णन कर चुका हूँ। वह भगवतीका क्रीडास्थल है तथा उनके लिये सदा परम प्रिय बतलाया गया है। जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्त्रीरूपमें परिणत हो गये थे और पुनः पुरुषत्व पाकर वे अपने-अपने कार्योंमें संलग्न हो गये। वह परम सुन्दर द्वीप सुधासागरके मध्यमें विराजमान है। भगवती जगदम्बा वहाँ अनेक रूपोंमें सदा विहार करती रहती हैं॥ १६-१८॥ |
| ६३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्तुता सम्पूजिता देवैः सा तत्रैव गता शिवा।<br>यत्र संक्रीडते नित्यं मायाशक्तिः सनातनी॥ १९ | [महिषासुरके वधके पश्चात्] देवताओंसे स्तुत तथा भलीभाँति पूजित होकर वे सनातनी मायाशक्ति भगवती शिवा उसी मणिद्वीपमें चली गयीं, जहाँ वे निरन्तर विहार करती रहती हैं॥ १९॥ |
| देवास्तां निर्गतां वीक्ष्य देवीं सर्वेश्वरीं तथा।<br>रविवंशोद्भवं चक्रुर्भूपालं महाबलम्॥ २०<br><br>अयोध्याधिपतिं वीरं शत्रुघ्नं नाम पार्थिवम्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नं महिषस्यासने शुभे॥ २१<br><br>दत्त्वा राज्यं तदा तस्मै देवा इन्द्रपुरोगमाः।<br>स्वकीयैर्वाहनैः सर्वे जग्मुः स्वान्यालयानि ते॥ २२ | उन सर्वेश्वरी भगवतीको अन्तर्हित देखकर देवताओंने सूर्यवंशमें उत्पन्न, महाबली एवं सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न अयोध्याधिपति शत्रुघ्न नामक पराक्रमी राजाको महिषासुरके सुन्दर आसनपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार इन्द्र आदि सभी प्रधान देवता शत्रुघ्नको राज्य प्रदान करके अपने-अपने वाहनोंसे अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ २०-२२॥ |
| गतेषु तेषु देवेषु पृथिव्यां पृथिवीपते।<br>धर्मराज्यं बभूवाथ प्रजाश्च सुखितास्तथा॥ २३<br><br>पर्जन्यः कालवर्षी च धरा धान्यगुणावृता।<br>पादपाः फलपुष्पाढ्या बभूवुः सुखदाः सदा॥ २४ | हे भूपते! उन देवताओंके चले जानेपर पृथ्वीपर धर्मराज्य स्थापित हो गया और प्रजाएँ सुखी हो गयीं। मेघ उचित समयपर जल बरसाते थे और पृथ्वीपर उत्तम धान्य उत्पन्न होते थे। वृक्ष फलों तथा फूलोंसे सदा लदे रहते थे और वे लोगोंके लिये बड़े सुखदायक हो गये॥ २३-२४॥ |
| गावश्च क्षीरसम्पन्ना घटोध्न्यः कामदा नृणाम्।<br>नद्यः सुमार्गाः स्वच्छाः शीतोदाः खगसंयुताः॥ २५ | घड़ेके समान थनवाली दुधारू गौएँ मनुष्योंको उनकी इच्छाके अनुसार दूध दिया करती थीं। स्वच्छ एवं शीतल जलवाली नदियाँ सुगमतापूर्वक बहती थीं और पक्षियोंसे सुशोभित रहती थीं॥ २५॥ |
| ब्राह्मणा वेदतत्त्वाश्च यज्ञकर्मरतास्तथा।<br>क्षत्रिया धर्मसंयुक्ता दानाध्ययनतत्पराः॥ २६<br><br>शस्त्रविद्यारता नित्यं प्रजारक्षणतत्पराः।<br>न्यायदण्डधराः सर्वे राजानः शमसंयुताः॥ २७ | ब्राह्मण वेदतत्त्वोंके ज्ञाता हो गये और यज्ञकर्ममें प्रवृत्त रहने लगे। क्षत्रिय धर्मभावनासे ओतप्रोत हो गये और सदा दान तथा अध्ययनमें तत्पर रहने लगे। सभी राजा शस्त्रविद्या प्राप्त करनेमें संलग्न हो गये, वे सदा प्रजाओंकी रक्षा करने लगे, उनका दण्ड-विधान न्यायके अनुसार चलने लगा और वे शान्तिगुणसे सम्पन्न हो गये॥ २६-२७॥ |
| अविरोधस्तु भूतानां सर्वेषां सम्बभूव ह।<br>आकरा धनदा नॄणां व्रजा गोयूथसंयुताः॥ २८ | सभी प्राणियोंमें परस्पर मेल-जोल रहने लगा, खानोंसे मनुष्योंको अपार धन प्राप्त होने लगा और गोशालाएँ गोसमुदायसे सम्पन्न हो गयीं॥ २८॥ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम।<br>देवीभक्तिपराः सर्वे सम्बभूवुर्धरातले॥ २९ | हे नृपश्रेष्ठ! उस समय धरातलपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये सब-के-सब देवीकी भक्तिमें संलग्न हो गये॥ २९॥ |
| सर्वत्र यज्ञयूपाश्च मण्डपाश्च मनोहराः।<br>मखैः पूर्णा धराश्चासन् ब्राह्मणैः क्षत्रियैः कृतैः॥ ३० | सर्वत्र मनोहर यज्ञमण्डप तथा यज्ञयूप दृष्टिगोचर होते थे। ब्राह्मणों तथा क्षत्रियोंद्वारा सम्पन्न किये गये यज्ञोंसे सारी पृथ्वी सुशोभित होने लगी॥ ३०॥ |
अ० २० ] पञ्चम स्कन्ध ६३९
अ० २० ] पञ्चम स्कन्ध ६३९
| पतिव्रतधरा नार्यः सुशीलाः सत्यसंयुताः।<br>पितृभक्तिपराः पुत्रा आसन्धर्मपरायणाः॥ ३१ | उस समय स्त्रियाँ पातिव्रतधर्मपरायण, सुशील तथा सत्यनिष्ठ थीं और पुत्र पिताके प्रति श्रद्धा रखनेवाले तथा धर्मशील होते थे॥ ३१॥ |
| न पाखण्डं न वाधर्मः कुत्रापि पृथिवीतले।<br>वेदवादाः शास्त्रवादा नान्ये वादास्तथाभवन्॥ ३२ | पृथिवीतलपर पाखण्ड तथा अधर्म कहीं भी नहीं रह गया। उस समय वेदवाद और शास्त्रवादके अतिरिक्त अन्य कोई वाद प्रचलित नहीं थे॥ ३२॥ |
| कलहो नैव केषाञ्चिन्न दैन्यं नाशुभा मतिः।<br>सर्वत्र सुखिनो लोकाः काले च मरणं तथा॥ ३३ | उस समय किसीमें भी परस्पर कलह नहीं होता था, दीनता नहीं थी और किसीकी अशुभ बुद्धि नहीं रह गयी थी। सभी जगह लोग सुखी थे और आयु पूर्ण होनेपर ही उनकी मृत्यु होती थी, किसीकी अकालमृत्यु नहीं होती थी॥ ३३॥ |
| सुहृदां न वियोगश्च नापदश्च कदाचन।<br>नानावृष्टिर्न दुर्भिक्षं न मारी दुःखदा नृणाम्॥ ३४ | मित्रोंमें वियोग नहीं होता था, किसीपर कभी विपत्तियाँ नहीं आती थीं, अनावृष्टि नहीं होती थी, न अकाल पड़ता था और न तो दुःखदायिनी महामारी ही मनुष्योंको ग्रसित करती थी॥ ३४॥ |
| न रोगो न च मात्सर्यं न विरोधः परस्परम्।<br>सर्वत्र सुखसम्पन्ना नरा नार्यः सुखान्विताः॥ ३५<br><br>क्रीडन्ति मानवाः सर्वे स्वर्गे देवगणा इव।<br>न चौरा न च पाखण्डा वञ्चका दम्भिकास्तथा॥ ३६<br><br>पिशुना लम्पटाः स्तब्धा न बभूवुस्तदा नृप।<br>न वेदद्वेषिणः पापा मानवाः पृथिवीपते॥ ३७<br><br>सर्वधर्मरता नित्यं द्विजसेवापरायणाः। | न किसीको रोग था और न तो लोगोंका आपसमें डाह तथा विरोध ही था। सर्वत्र नर तथा नारी सब प्रकारसे सुखी थे। सभी मनुष्य स्वर्गमें रहनेवाले देवताओंकी भाँति आनन्द भोगते थे। हे राजन्! उस समय चोर, पाखण्डी, धोखेबाज, दम्भी, चुगलखोर, लम्पट तथा जड़ प्रकृतिवाले मनुष्य नहीं रह गये थे। हे भूपते! वेदोंसे द्वेष करनेवाले तथा पापी मनुष्य उस समय नहीं थे, अपितु सभी लोग धर्मनिष्ठ थे और नित्य ब्राह्मणोंकी सेवामें लगे रहते थे॥ ३५—३७ ½॥ |
| त्रिधात्वात्सृष्टिधर्मस्य त्रिविधा ब्राह्मणास्ततः॥ ३८<br><br>सात्त्विका राजसाश्चैव तामसाश्च तथापरे।<br>सर्वे वेदविदो दक्षाः सात्त्विकाः सत्त्ववृत्तयः॥ ३९<br><br>प्रतिग्रहविहीनाश्च दयादमपरायणाः।<br>यज्ञांस्ते सात्त्विकैरन्नैः कुर्वाणा धर्मतत्पराः॥ ४०<br><br>पुरोडाशविधानैश्च पशुभिर्न कदाचन।<br>दानमध्ययनञ्चैव यजनं तु तृतीयकम्॥ ४१<br>त्रिकर्मरसिकास्ते वै सात्त्विका ब्राह्मणा नृप। | सृष्टिधर्मके तीन प्रकार होनेके कारण ब्राह्मण भी तीन प्रकारके थे—सात्त्विक, राजस तथा तामस। उनमें सत्त्व-वृत्तिवाले सभी सात्त्विक ब्राह्मण वेदोंके ज्ञाता तथा [यज्ञकार्योंमें] दक्ष, दान लेनेकी प्रवृत्तिसे रहित, दयालु तथा संयम रखनेवाले थे। वे धर्मपरायण रहकर सात्त्विक अन्नोंसे यज्ञ करते हुए सदा पुरोडाशके द्वारा विधिविधानसे हवन करते थे और पशुबलिके द्वारा कभी भी यज्ञ सम्पन्न नहीं करते थे। हे राजन्! वे सात्त्विक ब्राह्मण दान, अध्ययन और यज्ञ—इन्हीं तीनों कार्योंमें सदा अभिरुचि रखते थे*॥ ३८—४१ ½॥ |
* सात्त्विक ब्राह्मणोंद्वारा किये जानेवाले निरामिष यज्ञकी प्रशंसा करनेसे यह स्पष्ट है कि मांस-भक्षणादि तथा काम-क्रोधादि विकार रजोगुण तथा तमोगुणसे उत्पन्न हो जाते हैं, अतः सर्वथा त्याज्य हैं; इन्हें भ्रमवश विधि नहीं समझना चाहिये।
६४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजसा वेदविद्वांसः क्षत्रियाणां पुरोहिताः ॥ ४२<br>षट्कर्मनिरताः सर्वे विधिवन्मांसभक्षकाः ।<br>यजनं याजनं दानं तथैव च प्रतिग्रहः ॥ ४३ | राजस ब्राह्मण वेदके विद्वान् थे और वे क्षत्रियोंके पुरोहित होते थे। वे यथाविधि मांसभक्षी थे। वे सदा छः कर्मोंमें ही संलग्न रहते थे। यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, दान लेना, वेद पढ़ना और वेद पढ़ाना—ये ही उनके छः कर्म थे॥ ४२-४३ ½ ॥ |
| अध्ययनं तु वेदानां तथैवाध्यापनं तु षट् ।<br>तामसाः क्रोधसंयुक्ता रागद्वेषपराः पुनः ॥ ४४<br>राज्ञां कर्मकरा नित्यं किञ्चिदध्ययने रताः । | तामस प्रकृतिवाले ब्राह्मण क्रोधी और राग-द्वेषपरायण रहते थे। वे सदा राजाओंके यहाँ कर्मचारीके रूपमें कार्य करते थे। वे कुछ-कुछ अध्ययनमें भी संलग्न रहते थे॥ ४४ ½ ॥ |
| महिषे निहते सर्वे सुखिनो वेदतत्पराः ॥ ४५<br>बभूवुर्व्रतनिष्णाता दानधर्मपरास्तथा ।<br>क्षत्रियाः पालने युक्ता वैश्या वणिज्वृत्तयः ॥ ४६<br>कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदवृत्तयः परे ।<br>एवं प्रमुदितो लोको महिषे विनिपातिते ॥ ४७ | इस प्रकार महिषासुरका वध हो जानेपर सभी ब्राह्मण सुखी, वेदपरायण, व्रतनिष्ठ तथा दान-धर्ममें संलग्न हो गये; क्षत्रिय प्रजापालनमें लग गये; वैश्य व्यवसायमें तत्पर हो गये और कुछ अन्य वैश्य कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा तथा सूदपर धन देनेके कर्ममें प्रवृत्त हो गये। इस प्रकार महिषासुरके संहारके पश्चात् सारा जनसमुदाय आनन्दसे परिपूर्ण हो गया॥ ४५-४७॥ |
| अनुद्वेगः प्रजानां वै सम्बभूव धनागमः ।<br>बहुक्षीराः शुभा गावो नद्यश्चैव बहूदकाः ॥ ४८<br>वृक्षा बहुफलाश्चासन्मानवा रोगवर्जिताः ।<br>नाधयो नेतयः क्वापि प्रजानां दुःखदायकाः ॥ ४९ | प्रजाओंकी व्याकुलता दूर हो गयी, उन्हें पर्याप्त धन प्राप्त होने लगा, गौएँ परम सुन्दर तथा बहुत दूध देनेवाली हो गयीं, नदियाँ प्रचुर जलसे भर गयीं, वृक्ष बहुत अधिक फलोंसे लद गये और सभी मनुष्य रोगरहित हो गये। कहीं भी किसी प्राणीको मानसिक व्याधियाँ तथा प्राकृतिक आपदाएँ व्यथित नहीं करती थीं॥ ४८-४९॥ |
| न निधनमुपयान्ति प्राणिनस्तेऽप्यकाले<br>सकलविभवयुक्ता रोगहीनाः सदैव ।<br>निगमविहितधर्मे तत्पराश्चण्डिकाया-<br>श्चरणसरसिजानां सेवने दत्तचित्ताः ॥ ५० | उस समय सभी प्राणी अकालमृत्युको प्राप्त नहीं होते थे, वे सब प्रकारके वैभवसे सम्पन्न तथा नीरोग रहते थे। वेदप्रतिपादित धर्ममें तत्पर रहते हुए सभी लोगोंने भगवती चण्डिकाके चरणकमलोंकी सेवामें ही अपना चित्त लगा दिया था॥ ५०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषवधानन्तरं पृथिवीसुखवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
अथैकविंशोऽध्यायः
शुम्भ और निशुम्भको ब्रह्माजीके द्वारा वरदान, देवताओंके साथ उनका युद्ध और देवताओंकी पराजय
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्याश्चरितमुत्तमम् ।<br>सुखदं सर्वजन्तूनां सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १ | हे राजन्! सुनिये, मैं देवीका उत्तम चरित्र कहता हूँ; यह सम्पूर्ण प्राणियोंको सुख देनेवाला तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ १॥ |
| अ० २१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६४१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यथा शुम्भो निशुम्भश्च भ्रातरौ बलवत्तरौ।<br>बभूवतुर्महावीरौ अवध्यौ पुरुषैः किल॥ २ | [पूर्वकालमें] शुम्भ और निशुम्भ नामक दो [असुर] भाई थे। वे बड़े बलवान्, महापराक्रमी तथा पुरुषोंसे अवध्य थे॥ २॥ |
| बहुसेनावृतौ शूरौ देवानां दुःखदौ सदा।<br>दुराचारौ मदोत्सिक्तौ बहुदानवसंयुतौ॥ ३ | उनके पास बहुत-से सैनिक थे। वे दोनों वीर देवताओंको सदा दुःख देते रहते थे। वे बड़े दुराचारी तथा मदमत्त थे। उनके पास बहुत अधिक दानव थे॥ ३॥ |
| हतावम्बिकया तौ तु संग्रामेऽतीव दारुणे।<br>देवानाञ्च हितार्थाय सर्वैः परिचरैः सह॥ ४ | अम्बिकाने देवताओंके हितके लिये उन दोनों दानवोंको उनके परिचरोंसमेत अत्यन्त भीषण संग्राममें मार डाला॥ ४॥ |
| चण्डमुण्डौ महाबाहू रक्तबीजोऽतिदारुणः।<br>धूम्रलोचननामा च निहतास्ते रणाङ्गणे॥ ५ | महाबाहु चण्ड-मुण्ड, महाभयंकर रक्तबीज और धूम्रलोचन नामक असुर—वे सब भी भगवतीके द्वारा रणभूमिमें मारे गये थे॥ ५॥ |
| तान्निहत्य सुराणां सा जहार भयमुत्तमम्।<br>स्तुता सम्पूजिता देवैर्गिरौ हेमाचले शुभे॥ ६ | उन सबका वध करके भगवती अम्बिकाने देवताओंका बहुत बड़ा भय दूर कर दिया। तदनन्तर देवताओंने पवित्र सुमेरुपर्वतपर उन देवीका स्तवन तथा विधिवत् पूजन किया॥ ६॥ |
| राजोवाच<br>कावेतावसुरावादौ कथं तौ बलिनां वरौ।<br>केन संस्थापितौ चेह स्त्रीवध्यत्वं कुतो गतौ॥ ७<br><br>तपसा वरदानेन कस्य जातौ महाबलौ।<br>कथञ्च निहतौ सर्वं कथयस्व सविस्तरम्॥ ८ | राजा बोले— पूर्वकालमें ये दोनों दानव कौन थे, वे बड़े-बड़े बलशालियोंसे भी श्रेष्ठ कैसे हुए, उन्हें राजसिंहासनपर किसने प्रतिष्ठित किया, स्त्रीके द्वारा वे कैसे मारे गये, किस देवताकी तपस्याके परिणामस्वरूप प्राप्त वरदानसे वे महाबली हुए? और किस प्रकार वे मारे गये? यह सब विस्तारपूर्वक बताइये॥ ७-८॥ |
| व्यास उवाच<br>शृणु राजन् कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>देव्याश्चरितसंयुक्तां सर्वार्थफलदां शुभाम्॥ ९ | व्यासजी बोले— हे राजन्! अब आप समस्त पापोंका नाश करनेवाली, सभी प्रकारके अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली, मंगलमयी तथा भगवतीके चरित्रसे ओत-प्रोत दिव्य कथा सुनिये॥ ९॥ |
| पुरा शुम्भनिशुम्भौ द्वावसुरौ भूममण्डले।<br>पातालतश्च सम्प्राप्तौ भ्रातरौ शुभदर्शनौ॥ १० | पूर्वकालमें शुम्भ-निशुम्भ नामक दो दैत्य पातालसे भूमण्डलपर आ गये। वे दोनों भाई देखनेमें बड़े सुन्दर थे॥ १०॥ |
| तौ प्राप्तयौवनौ चैव चेरतुस्तप उत्तमम्।<br>अन्नोदकं परित्यज्य पुष्करे लोकपावने॥ ११ | पूर्ण वयस्क होनेपर उन दोनोंने जगत्पावन पुष्कर तीर्थमें अन्न तथा जलका परित्याग करके कठोर तप आरम्भ कर दिया॥ ११॥ |
| वर्षाणामयुतं यावद्योगविद्यापरायणौ।<br>एकत्रैवासनं कृत्वा तेपाते परमं तपः॥ १२ | योगसाधनामें तत्पर रहनेवाले शुम्भ और निशुम्भ एक ही स्थानपर आसन लगाकर दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करते रहे॥ १२॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—21 A
६४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २१
६४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २१
| तयोस्तुष्टोऽभवद् ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः।<br>तत्रागतश्च भगवानारुह्य वरटापतिम्॥ १३ | अन्तमें समस्त लोकोंके पितामह भगवान् ब्रह्माजी उनपर प्रसन्न हो गये और हंसपर आरूढ़ होकर वहाँ आ गये॥ १३॥ |
| तावुभौ च जगत्स्रष्टा दृष्ट्वा ध्यानपरौ स्थितौ।<br>उत्तिष्ठतं महाभागौ तुष्टोऽहं तपसा किल॥ १४<br>वाञ्छितं वां वरं कामं ददामि ब्रुवतामिह।<br>कामदोऽहं समायातो दृष्ट्वा वां तपसो बलम्॥ १५ | ध्यानमग्न होकर बैठे हुए उन दोनोंको देखकर जगत्के रचयिता ब्रह्माजीने कहा—हे महाभाग! तुम दोनों उठो, मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे परम प्रसन्न हूँ। तुमलोगोंका जो भी अभीष्ट वर हो उसे बताओ, मैं अवश्य दूँगा। तुम दोनोंका तपोबल देखकर तुमलोगोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेके विचारसे ही मैं यहाँ आया हूँ॥ १४-१५॥ |
| व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा वचस्तस्य प्रबुद्धौ तौ समाहितौ।<br>प्रदक्षिणक्रियां कृत्वा प्रणामं चक्रतुस्तदा॥ १६<br>दण्डवत्प्रणिपातञ्च कृत्वा तौ दुर्बलाकृती।<br>ऊचतुर्मधुरां वाचं दीनौ गद्गदया गिरा॥ १७<br>देवदेव दयासिन्धो भक्तानामभयप्रद।<br>अमरत्वञ्च नौ ब्रह्मन्देहि तुष्टोऽसि चेद्विभो॥ १८<br>मरणादपरं किञ्चिद्भयं नास्ति धरातले।<br>तस्माद्भयाच्च सन्त्रस्तौ युष्माकं शरणं गतौ॥ १९<br>त्राहि त्वं देवदेवेश जगत्कर्तः क्षमानिधे।<br>परिस्फोटय विश्वात्मन् सद्यो मरणजं भयम्॥ २० | व्यासजी बोले—ब्रह्माजीकी यह वाणी सुनकर समाहित चित्तवाले उन दोनोंका ध्यान टूट गया। तब प्रदक्षिणा करके उन्होंने दण्डकी भाँति भूमिपर गिरकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया। तत्पश्चात् तपके कारण दुर्बल शरीरवाले दोनों दानवोंने ब्रह्माजीसे बड़ी दीनतापूर्वक गद्गद वाणीमें यह मधुर वचन कहा—हे देवदेव! हे दयासिन्धो! हे भक्तोंको अभय देनेवाले ब्रह्मन्! हे विभो! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं, तो हमें अमरत्व प्रदान कीजिये। मृत्युसे बढ़कर दूसरा कोई भी भय इस पृथ्वीलोकमें नहीं है, उसी भयसे सन्त्रस्त होकर हम दोनों आपकी शरणको प्राप्त हुए हैं। हे देवदेवेश! आप हमारी रक्षा कीजिये। हे जगत्कर्ता! हे क्षमानिधान! हे विश्वात्मा! आप हमारे मरणजन्य भयको शीघ्र ही दूर कीजिये॥ १६—२०॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>किमिदं प्रार्थनीयं वो विपरीतं तु सर्वथा।<br>अदेयं सर्वथा सर्वैः सर्वेभ्यो भुवनत्रये॥ २१<br>जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।<br>मर्यादा विहिता लोके पूर्वं विश्वकृता किल॥ २२<br>मर्तव्यं सर्वथा सर्वैः प्राणिभिर्नात्र संशयः।<br>अन्यं प्रार्थयतं कामं ददामि यच्च वाञ्छितम्॥ २३ | ब्रह्माजी बोले—तुम लोगोंने यह कैसा सर्वथा नियमविरुद्ध वरदान माँगा है, तीनों लोकोंमें किसीके द्वारा किसीके भी लिये यह वरदान सर्वथा अदेय है। जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है और मरनेवालेका जन्म निश्चित है। विश्वकी रचना करनेवाले प्रभुने यह नियम पहलेसे ही निर्धारित कर रखा है। सभी प्राणियोंको निश्चितरूपसे मरना ही पड़ता है; इसमें सन्देह नहीं है। अतः इसके अतिरिक्त तुमलोगोंका जो भी दूसरा अभिलषित वर हो, उसे माँग लो, मैं अभी देता हूँ॥ २१—२३॥ |
| व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य वचस्तस्य सुविमृश्य च दानवौ।<br>ऊचतुः प्रणिपत्याथ ब्रह्माणं पुरतः स्थितम्॥ २४ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर उन दोनों दानवोंने परस्पर भलीभाँति विचार करनेके उपरान्त अपने सम्मुख खड़े उन ब्रह्माजीको |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—21 B
अ० २१ ] पञ्चम स्कन्ध ६४३
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| पुरुषैरमराद्यैश्च मानवैर्मृगपक्षिभिः।<br>अवध्यत्वं कृपासिन्धो देहि नौ वाञ्छितं वरम्॥ २५<br><br>नारी बलवती कास्ति या नौ नाशं करिष्यति।<br>न बिभीवः स्त्रियः कामं त्रैलोक्ये सचराचरे॥ २६<br><br>अवध्यौ भ्रातरौ स्यातां नरेभ्यः पङ्कजोद्भव।<br>भयं न स्त्रीजनेभ्यश्च स्वभावादबला हि सा॥ २७ | प्रणाम करके कहा—हे कृपासिन्धो! देवता, मनुष्य, मृग अथवा पक्षी—इनमेंसे किसी भी पुरुषजातिके द्वारा हमारा मरण न हो—यही हमारा अभीष्ट वर है, इसे आप हमें प्रदान करें। ऐसी कौन बलवती स्त्री है, जो हम दोनोंका नाश कर सके? इस चराचर त्रिलोकीमें किसी भी स्त्रीसे हम नहीं डरते। हे ब्रह्मन्! हम दोनों भाई पुरुषोंसे अवध्य होवें। हमें स्त्रियोंसे कोई डर नहीं है; क्योंकि वे तो स्वभावसे ही अबला होती हैं॥ २४–२७॥ |
| व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा तयोर्वाक्यं प्रददौ वाञ्छितं वरम्।<br>ब्रह्मा प्रसन्नमनसा जगामाथ स्वमालयम्॥ २८ | व्यासजी बोले—उन दोनोंका यह वचन सुनकर ब्रह्माजीने उन्हें अभिलषित वर दे दिया और प्रसन्नमनसे अपने स्थानपर चले गये॥ २८॥ |
| गतेऽथ भवने तस्मिन्दानवौ स्वगृहं गतौ।<br>भृगुं पुरोहितं कृत्वा चक्रतुः पूजनं तदा॥ २९ | ब्रह्माजीके अपने लोक चले जानेपर वे दोनों दानव भी अपने घर चले गये। उन्होंने वहाँपर शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बनाकर उनका पूजन किया॥ २९॥ |
| शुभे दिने सुनक्षत्रे जातरूपमयं शुभम्।<br>कृत्वा सिंहासनं दिव्यं राज्यार्थं प्रददौ मुनिः॥ ३०<br><br>शुम्भाय ज्येष्ठभूताय ददौ राज्यासनं शुभम्।<br>सेवनार्थं तदैवाशु सम्प्राप्ता दानवोत्तमाः॥ ३१ | तत्पश्चात् किसी उत्तम दिन और नक्षत्रमें सोनेका दिव्य तथा सुन्दर सिंहासन बनवाकर मुनिने राज्य-स्थापनाके लिये उन्हें प्रदान किया। उन्होंने ज्येष्ठ होनेके कारण शुम्भको वह सुन्दर राजसिंहासन समर्पित किया। उसी समय अनेक श्रेष्ठ दानव उसकी सेवा करनेके लिये शीघ्र वहाँ उपस्थित हो गये॥ ३०-३१॥ |
| चण्डमुण्डौ महावीरौ भ्रातरौ बलदर्पितौ।<br>सम्प्राप्तौ सैन्यसंयुक्तौ रथवाजिगजान्वितौ॥ ३२ | बलाभिमानी तथा महापराक्रमी चण्ड और मुण्ड—ये दोनों भाई भी अपनी सेना तथा बहुत-से रथ, घोड़े और हाथी साथमें लेकर उनके पास आ गये॥ ३२॥ |
| धूम्रलोचननामा च तद्रूपश्चण्डविक्रमः।<br>शुम्भञ्च भूपतिं श्रुत्वा तदागाद् बलसंयुतः॥ ३३ | शुम्भको राजा बना हुआ सुनकर उसीके रूपवाला धूम्रलोचन नामक प्रचण्ड पराक्रमी दैत्य भी उस समय सेनासहित वहाँ पहुँच गया॥ ३३॥ |
| रक्तबीजस्तथा शूरो वरदानबलाधिकः।<br>अक्षौहिणीभ्यां संयुक्तस्तत्रैवागत्य सङ्गतः॥ ३४<br><br>तस्यैकं कारणं राजन् संग्रामे युध्यतः सदा।<br>देहाद्रुधिरसम्पातस्तस्य शस्त्राहतस्य च॥ ३५<br><br>जायते च यदा भूमावुत्पद्यन्ते ह्यनेकशः।<br>तादृशाः पुरुषाः क्रूरा बहवः शस्त्रपाणयः॥ ३६ | उसी प्रकार वरदानके प्रभावसे अत्यधिक बलशाली तथा शूरवीर रक्तबीज भी दो अक्षौहिणी सेनाके साथ वहाँ आकर सम्मिलित हो गया। हे राजन्! उसके अतिशय बलवान् होनेका एक कारण यह था कि संग्राममें युद्ध करते हुए उस रक्तबीजके शस्त्राहत होनेपर उसके शरीरसे जब भूमिपर रुधिर गिरता था, उसी समय उसके ही समान क्रूर और हाथोंमें शस्त्र धारण किये बहुत-से वीर पुरुष उत्पन्न हो जाते थे। रक्तबिन्दुओंसे उत्पन्न वे पुरुष उसी रक्तबीजके आकार, रूप और पराक्रमवाले होते थे |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—21 C
६४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २१
६४४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २१
| सम्भवन्ति तदाकारास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः।<br>युद्धं पुनस्ते कुर्वन्ति पुरुषा रक्तसम्भवाः॥ ३७<br>अतः सोऽपि महावीर्यः संग्रामेऽतीव दुर्जयः।<br>अवध्यः सर्वभूतानां रक्तबीजो महासुरः॥ ३८ | और वे सभी पुनः युद्ध करने लगते थे। इसलिये संग्राममें महापराक्रमी तथा अजेय समझा जानेवाला वह महान् असुर रक्तबीज सभी प्राणियोंसे अवध्य हो गया था॥ ३४-३८॥ |
|---|---|
| अन्ये च बहवः शूराश्चतुरङ्गसमन्विताः।<br>शुम्भञ्च नृपतिं मत्वा बभूवुस्तस्य सेवकाः॥ ३९ | इसके अतिरिक्त चतुरंगिणी सेनासे युक्त अन्य बहुत-से पराक्रमी दानव भी शुम्भको अपना राजा मानकर उसके सेवक बन गये॥ ३९॥ |
| असंख्याता तदा जाता सेना शुम्भनिशुम्भयोः।<br>पृथिव्याः सकलं राज्यं गृहीतं बलवत्तया॥ ४० | उस समय शुम्भ और निशुम्भके पास असंख्य सेना हो गयी थी और उन्होंने अपने बलके प्रभावसे भूमण्डलका सम्पूर्ण राज्य अपने अधिकारमें कर लिया॥ ४०॥ |
| सेनायोगं तदा कृत्वा निशुम्भः परवीरहा।<br>जगाम तरसा स्वर्गे शचीपतिजयाय च॥ ४१<br>चकारासौ महायुद्धं लोकपालैः समन्ततः।<br>वृत्रहा वज्रपातेन ताडयामास वक्षसि॥ ४२<br>स वज्राभिहतो भूमौ पपात दानवानुजः।<br>भग्नं बलं तदा तस्य निशुम्भस्य महात्मनः॥ ४३ | तत्पश्चात् शत्रुपक्षके वीरोंका संहार करनेवाले निशुम्भने अपनी सेना सुसज्जित करके इन्द्रको जीतनेहेतु बड़े वेगसे स्वर्गके लिये प्रस्थान किया। [वहाँ पहुँचकर] उसने लोकपालोंके साथ घोर युद्ध किया। तब इन्द्रने उसके वक्षपर वज्रसे प्रहार किया। उस वज्राघातसे आहत होकर दानव शुम्भका छोटा भाई निशुम्भ भूमिपर गिर पड़ा। तब परम साहसी उस निशुम्भकी सेना भाग गयी॥ ४१-४३॥ |
| भ्रातरं मूर्च्छितं श्रुत्वा शुम्भः परबलार्दनः।<br>तत्रागत्य सुरान्सर्वांस्ताडयामास सायकैः॥ ४४ | अपने भाईको मूर्च्छित हुआ सुनकर शत्रुसेनाको नष्ट कर डालनेवाला शुम्भ वहाँ आकर सभी देवताओंको बाणोंसे मारने लगा॥ ४४॥ |
| कृतं युद्धं महत्तेन शुम्भेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>निर्जितास्तु सुराः सर्वे सेन्द्राः पालाश्च सर्वशः॥ ४५ | इस प्रकार किसी भी कार्यको कठिन न समझनेवाले उस शुम्भने भीषण युद्ध किया और इन्द्रसहित सभी देवताओं तथा लोकपालोंको पराजित कर दिया॥ ४५॥ |
| ऐन्द्रं पदं तदा तेन गृहीतं बलवत्तया।<br>कल्पपादपसंयुक्तं कामधेनुसमन्वितम्॥ ४६<br>त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृतास्तेन महात्मना।<br>नन्दनं च वनं प्राप्य मुदितोऽभून्महासुरः॥ ४७<br>सुधायाश्चैव पानेन सुखमाप महासुरः। | तब उस शुम्भने अपने पराक्रमके प्रभावसे कल्पवृक्ष और कामधेनुसहित इन्द्रपदको अधिकारमें कर लिया। उस दुस्साहसी शुम्भने तीनों लोकोंपर आधिपत्य जमा लिया और देवताओंको मिलनेवाले यज्ञभागोंका हरण कर लिया। नन्दनवन पा करके वह महान् असुर आनन्दित हुआ और अमृतके पानसे उसे बहुत सुख मिला॥ ४६-४७ ½॥ |
| कुबेरं स च निर्जित्य तस्य राज्यं चकार ह॥ ४८<br>अधिकारं तथा भानोः शशिनश्च चकार ह।<br>यमञ्चैव विनिर्जित्य जग्राह तत्पदं तथा॥ ४९<br>वरुणस्य तथा राज्यं चकार वह्निकर्म च।<br>वायोः कार्यं निशुम्भश्च चकार स्वबलान्वितः॥ ५० | उसने कुबेरको जीतकर उनके राज्यपर अधिकार कर लिया और सूर्य तथा चन्द्रमाका भी अधिकार छीन लिया। उसने यमराजको परास्त करके उनका पद स्वयं ले लिया। इसी प्रकार अपने बलके प्रभावसे वरुणका राज्य अपने अधीन करके वह शुम्भ राज्य-शासन स्वयं करने लगा और अग्नि तथा वायुके कार्य स्वयं करने लगा॥ ४८-५०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—21 D
| अ० २१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६४५ | | :--- | :--- |
| ततो देवा विनिर्धूता हृतराज्या हृतश्रियः।<br>सन्त्यज्य नन्दनं सर्वे निर्ययुर्गिरिगह्वरे ॥ ५१ | तब [असुरोंके द्वारा] तिरस्कृत और राज्य छिन जानेके कारण नष्ट शोभावाले सभी देवता नन्दनवन छोड़कर पर्वतोंकी गुफाओंमें चले गये ॥ ५१ ॥ | | हृताधिकारास्ते सर्वे बभ्रमुर्विजने वने।<br>निरालम्बा निराधारा निस्तेजस्का निरायुधाः ॥ ५२<br><br>विचेरुरमराः सर्वे पर्वतानां गुहासु च।<br>उद्यानेषु च शून्युषु नदीनां गह्वरेषु च ॥ ५३ | अधिकारसे वंचित होकर वे सब निर्जन वनमें भटकने लगे। अब उनका कोई सहारा नहीं रहा, उनके रहनेकी जगह नहीं रही, वे तेजहीन और आयुधविहीन हो चुके थे। इस प्रकार सभी देवता पर्वतोंकी कन्दराओं, निर्जन उद्यानों और नदियोंकी घाटियोंमें विचरण करने लगे ॥ ५२-५३ ॥ | | न प्रापुस्ते सुखं क्वापि स्थानभ्रष्टा विचेतसः।<br>लोकपाला महाराज दैवाधीनं सुखं किल ॥ ५४ | हे महाराज! स्थानभ्रष्ट हो जानेके कारण उन बेचारे लोकपालोंको कहीं भी सुख नहीं मिल रहा था, और फिर यह सुनिश्चित भी है कि सुख सदा प्रारब्धके अधीन रहता है ॥ ५४ ॥ | | बलवन्तो महाभागा बहुज्ञा धनसंयुताः।<br>काले दुःखं तथा दैन्यमाप्नुवन्ति नराधिप ॥ ५५ | हे नराधिप! बलशाली, बड़े भाग्यवान्, महान् ज्ञानी तथा धनसम्पन्न व्यक्ति भी विपरीत समय उपस्थित होनेपर दुःख तथा कष्ट पाते हैं ॥ ५५ ॥ | | चित्रमेतन्महाराज कालस्यैव विचेष्टितम्।<br>यः करोति नरं तावद्राजानं भिक्षुकं ततः ॥ ५६<br><br>दातारं याचकं चैव बलवन्तं तथाबलम्।<br>पण्डितं विकलं कामं शूरं चातीव कातरम् ॥ ५७ | हे महाराज! उस कालकी गति बड़ी ही विचित्र होती है, जो एक साधारण मनुष्यको राजा बना देता है और उसके बाद राजाको भिखारी बना देता है। वही काल दाताको याचक, बलवान्को निर्बल, पण्डितको अज्ञानी और वीरको अत्यन्त कायर बना देता है ॥ ५६-५७ ॥ | | मखानाञ्च शतं कृत्वा प्राप्येन्द्रासनमुत्तमम्।<br>पुनर्दुःखं परं प्राप्तं कालस्य गतिरीदृशी ॥ ५८ | सौ अश्वमेधयज्ञ करनेके बाद सर्वोत्कृष्ट इन्द्रासन प्राप्त करके भी बादमें समयके फेरसे इन्द्रको असीम कष्ट उठाना पड़ा था—कालकी ऐसी विचित्र गति होती है ॥ ५८ ॥ | | कालः करोति धर्मिष्ठं पुरुषं ज्ञानसंयुतम्।<br>तमेवातीव पापिष्ठं ज्ञानलेशविवर्जितम् ॥ ५९ | समय ही मनुष्यको धर्मात्मा तथा ज्ञानवान् बनाता है और फिर उसी व्यक्तिको पापी तथा अत्यल्प ज्ञानसे भी हीन बना देता है ॥ ५९ ॥ | | न विस्मयोऽत्र कर्तव्यः सर्वथा कालचेष्टिते।<br>ब्रह्मविष्णुहरादीनामपीदृक्कष्टचेष्टितम् ॥ ६०<br><br>विष्णुर्जननमाप्नोति सूकरादिषु योनिषु।<br>हरः कपाली सञ्जातः कालेनैव बलीयसा ॥ ६१ | अतः कालकी इस अद्भुत गतिके विषयमें कुछ भी आश्चर्य नहीं करना चाहिये। यही काल ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदिको भी इसी प्रकार संकटमें डाल देता है। बलवान् कालके ही प्रभावसे भगवान् विष्णुको सूकर आदि योनियोंमें जन्म लेना पड़ा और शिवजीको कपाली होना पड़ा ॥ ६०-६१ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
शुम्भनिशुम्भद्वारा स्वर्गविजयवर्णनं नामैकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥