देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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६४२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २१
| तयोस्तुष्टोऽभवद् ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः।<br>तत्रागतश्च भगवानारुह्य वरटापतिम्॥ १३ | अन्तमें समस्त लोकोंके पितामह भगवान् ब्रह्माजी उनपर प्रसन्न हो गये और हंसपर आरूढ़ होकर वहाँ आ गये॥ १३॥ |
| तावुभौ च जगत्स्रष्टा दृष्ट्वा ध्यानपरौ स्थितौ।<br>उत्तिष्ठतं महाभागौ तुष्टोऽहं तपसा किल॥ १४<br>वाञ्छितं वां वरं कामं ददामि ब्रुवतामिह।<br>कामदोऽहं समायातो दृष्ट्वा वां तपसो बलम्॥ १५ | ध्यानमग्न होकर बैठे हुए उन दोनोंको देखकर जगत्के रचयिता ब्रह्माजीने कहा—हे महाभाग! तुम दोनों उठो, मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे परम प्रसन्न हूँ। तुमलोगोंका जो भी अभीष्ट वर हो उसे बताओ, मैं अवश्य दूँगा। तुम दोनोंका तपोबल देखकर तुमलोगोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेके विचारसे ही मैं यहाँ आया हूँ॥ १४-१५॥ |
| व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा वचस्तस्य प्रबुद्धौ तौ समाहितौ।<br>प्रदक्षिणक्रियां कृत्वा प्रणामं चक्रतुस्तदा॥ १६<br>दण्डवत्प्रणिपातञ्च कृत्वा तौ दुर्बलाकृती।<br>ऊचतुर्मधुरां वाचं दीनौ गद्गदया गिरा॥ १७<br>देवदेव दयासिन्धो भक्तानामभयप्रद।<br>अमरत्वञ्च नौ ब्रह्मन्देहि तुष्टोऽसि चेद्विभो॥ १८<br>मरणादपरं किञ्चिद्भयं नास्ति धरातले।<br>तस्माद्भयाच्च सन्त्रस्तौ युष्माकं शरणं गतौ॥ १९<br>त्राहि त्वं देवदेवेश जगत्कर्तः क्षमानिधे।<br>परिस्फोटय विश्वात्मन् सद्यो मरणजं भयम्॥ २० | व्यासजी बोले—ब्रह्माजीकी यह वाणी सुनकर समाहित चित्तवाले उन दोनोंका ध्यान टूट गया। तब प्रदक्षिणा करके उन्होंने दण्डकी भाँति भूमिपर गिरकर ब्रह्माजीको प्रणाम किया। तत्पश्चात् तपके कारण दुर्बल शरीरवाले दोनों दानवोंने ब्रह्माजीसे बड़ी दीनतापूर्वक गद्गद वाणीमें यह मधुर वचन कहा—हे देवदेव! हे दयासिन्धो! हे भक्तोंको अभय देनेवाले ब्रह्मन्! हे विभो! यदि आप हमपर प्रसन्न हैं, तो हमें अमरत्व प्रदान कीजिये। मृत्युसे बढ़कर दूसरा कोई भी भय इस पृथ्वीलोकमें नहीं है, उसी भयसे सन्त्रस्त होकर हम दोनों आपकी शरणको प्राप्त हुए हैं। हे देवदेवेश! आप हमारी रक्षा कीजिये। हे जगत्कर्ता! हे क्षमानिधान! हे विश्वात्मा! आप हमारे मरणजन्य भयको शीघ्र ही दूर कीजिये॥ १६—२०॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>किमिदं प्रार्थनीयं वो विपरीतं तु सर्वथा।<br>अदेयं सर्वथा सर्वैः सर्वेभ्यो भुवनत्रये॥ २१<br>जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।<br>मर्यादा विहिता लोके पूर्वं विश्वकृता किल॥ २२<br>मर्तव्यं सर्वथा सर्वैः प्राणिभिर्नात्र संशयः।<br>अन्यं प्रार्थयतं कामं ददामि यच्च वाञ्छितम्॥ २३ | ब्रह्माजी बोले—तुम लोगोंने यह कैसा सर्वथा नियमविरुद्ध वरदान माँगा है, तीनों लोकोंमें किसीके द्वारा किसीके भी लिये यह वरदान सर्वथा अदेय है। जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है और मरनेवालेका जन्म निश्चित है। विश्वकी रचना करनेवाले प्रभुने यह नियम पहलेसे ही निर्धारित कर रखा है। सभी प्राणियोंको निश्चितरूपसे मरना ही पड़ता है; इसमें सन्देह नहीं है। अतः इसके अतिरिक्त तुमलोगोंका जो भी दूसरा अभिलषित वर हो, उसे माँग लो, मैं अभी देता हूँ॥ २१—२३॥ |
| व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य वचस्तस्य सुविमृश्य च दानवौ।<br>ऊचतुः प्रणिपत्याथ ब्रह्माणं पुरतः स्थितम्॥ २४ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर उन दोनों दानवोंने परस्पर भलीभाँति विचार करनेके उपरान्त अपने सम्मुख खड़े उन ब्रह्माजीको |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—21 B