देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 652, कुल 889 में से
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अ० २१ ] पञ्चम स्कन्ध ६४३
| संस्कृत | हिन्दी |
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| पुरुषैरमराद्यैश्च मानवैर्मृगपक्षिभिः।<br>अवध्यत्वं कृपासिन्धो देहि नौ वाञ्छितं वरम्॥ २५<br><br>नारी बलवती कास्ति या नौ नाशं करिष्यति।<br>न बिभीवः स्त्रियः कामं त्रैलोक्ये सचराचरे॥ २६<br><br>अवध्यौ भ्रातरौ स्यातां नरेभ्यः पङ्कजोद्भव।<br>भयं न स्त्रीजनेभ्यश्च स्वभावादबला हि सा॥ २७ | प्रणाम करके कहा—हे कृपासिन्धो! देवता, मनुष्य, मृग अथवा पक्षी—इनमेंसे किसी भी पुरुषजातिके द्वारा हमारा मरण न हो—यही हमारा अभीष्ट वर है, इसे आप हमें प्रदान करें। ऐसी कौन बलवती स्त्री है, जो हम दोनोंका नाश कर सके? इस चराचर त्रिलोकीमें किसी भी स्त्रीसे हम नहीं डरते। हे ब्रह्मन्! हम दोनों भाई पुरुषोंसे अवध्य होवें। हमें स्त्रियोंसे कोई डर नहीं है; क्योंकि वे तो स्वभावसे ही अबला होती हैं॥ २४–२७॥ |
| व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा तयोर्वाक्यं प्रददौ वाञ्छितं वरम्।<br>ब्रह्मा प्रसन्नमनसा जगामाथ स्वमालयम्॥ २८ | व्यासजी बोले—उन दोनोंका यह वचन सुनकर ब्रह्माजीने उन्हें अभिलषित वर दे दिया और प्रसन्नमनसे अपने स्थानपर चले गये॥ २८॥ |
| गतेऽथ भवने तस्मिन्दानवौ स्वगृहं गतौ।<br>भृगुं पुरोहितं कृत्वा चक्रतुः पूजनं तदा॥ २९ | ब्रह्माजीके अपने लोक चले जानेपर वे दोनों दानव भी अपने घर चले गये। उन्होंने वहाँपर शुक्राचार्यको अपना पुरोहित बनाकर उनका पूजन किया॥ २९॥ |
| शुभे दिने सुनक्षत्रे जातरूपमयं शुभम्।<br>कृत्वा सिंहासनं दिव्यं राज्यार्थं प्रददौ मुनिः॥ ३०<br><br>शुम्भाय ज्येष्ठभूताय ददौ राज्यासनं शुभम्।<br>सेवनार्थं तदैवाशु सम्प्राप्ता दानवोत्तमाः॥ ३१ | तत्पश्चात् किसी उत्तम दिन और नक्षत्रमें सोनेका दिव्य तथा सुन्दर सिंहासन बनवाकर मुनिने राज्य-स्थापनाके लिये उन्हें प्रदान किया। उन्होंने ज्येष्ठ होनेके कारण शुम्भको वह सुन्दर राजसिंहासन समर्पित किया। उसी समय अनेक श्रेष्ठ दानव उसकी सेवा करनेके लिये शीघ्र वहाँ उपस्थित हो गये॥ ३०-३१॥ |
| चण्डमुण्डौ महावीरौ भ्रातरौ बलदर्पितौ।<br>सम्प्राप्तौ सैन्यसंयुक्तौ रथवाजिगजान्वितौ॥ ३२ | बलाभिमानी तथा महापराक्रमी चण्ड और मुण्ड—ये दोनों भाई भी अपनी सेना तथा बहुत-से रथ, घोड़े और हाथी साथमें लेकर उनके पास आ गये॥ ३२॥ |
| धूम्रलोचननामा च तद्रूपश्चण्डविक्रमः।<br>शुम्भञ्च भूपतिं श्रुत्वा तदागाद् बलसंयुतः॥ ३३ | शुम्भको राजा बना हुआ सुनकर उसीके रूपवाला धूम्रलोचन नामक प्रचण्ड पराक्रमी दैत्य भी उस समय सेनासहित वहाँ पहुँच गया॥ ३३॥ |
| रक्तबीजस्तथा शूरो वरदानबलाधिकः।<br>अक्षौहिणीभ्यां संयुक्तस्तत्रैवागत्य सङ्गतः॥ ३४<br><br>तस्यैकं कारणं राजन् संग्रामे युध्यतः सदा।<br>देहाद्रुधिरसम्पातस्तस्य शस्त्राहतस्य च॥ ३५<br><br>जायते च यदा भूमावुत्पद्यन्ते ह्यनेकशः।<br>तादृशाः पुरुषाः क्रूरा बहवः शस्त्रपाणयः॥ ३६ | उसी प्रकार वरदानके प्रभावसे अत्यधिक बलशाली तथा शूरवीर रक्तबीज भी दो अक्षौहिणी सेनाके साथ वहाँ आकर सम्मिलित हो गया। हे राजन्! उसके अतिशय बलवान् होनेका एक कारण यह था कि संग्राममें युद्ध करते हुए उस रक्तबीजके शस्त्राहत होनेपर उसके शरीरसे जब भूमिपर रुधिर गिरता था, उसी समय उसके ही समान क्रूर और हाथोंमें शस्त्र धारण किये बहुत-से वीर पुरुष उत्पन्न हो जाते थे। रक्तबिन्दुओंसे उत्पन्न वे पुरुष उसी रक्तबीजके आकार, रूप और पराक्रमवाले होते थे |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—21 C