भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 647
६३८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्तुता सम्पूजिता देवैः सा तत्रैव गता शिवा।<br>यत्र संक्रीडते नित्यं मायाशक्तिः सनातनी॥ १९[महिषासुरके वधके पश्चात्] देवताओंसे स्तुत तथा भलीभाँति पूजित होकर वे सनातनी मायाशक्ति भगवती शिवा उसी मणिद्वीपमें चली गयीं, जहाँ वे निरन्तर विहार करती रहती हैं॥ १९॥
देवास्तां निर्गतां वीक्ष्य देवीं सर्वेश्वरीं तथा।<br>रविवंशोद्भवं चक्रुर्भूपालं महाबलम्॥ २०<br><br>अयोध्याधिपतिं वीरं शत्रुघ्नं नाम पार्थिवम्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नं महिषस्यासने शुभे॥ २१<br><br>दत्त्वा राज्यं तदा तस्मै देवा इन्द्रपुरोगमाः।<br>स्वकीयैर्वाहनैः सर्वे जग्मुः स्वान्यालयानि ते॥ २२उन सर्वेश्वरी भगवतीको अन्तर्हित देखकर देवताओंने सूर्यवंशमें उत्पन्न, महाबली एवं सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न अयोध्याधिपति शत्रुघ्न नामक पराक्रमी राजाको महिषासुरके सुन्दर आसनपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार इन्द्र आदि सभी प्रधान देवता शत्रुघ्नको राज्य प्रदान करके अपने-अपने वाहनोंसे अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ २०-२२॥
गतेषु तेषु देवेषु पृथिव्यां पृथिवीपते।<br>धर्मराज्यं बभूवाथ प्रजाश्च सुखितास्तथा॥ २३<br><br>पर्जन्यः कालवर्षी च धरा धान्यगुणावृता।<br>पादपाः फलपुष्पाढ्या बभूवुः सुखदाः सदा॥ २४हे भूपते! उन देवताओंके चले जानेपर पृथ्वीपर धर्मराज्य स्थापित हो गया और प्रजाएँ सुखी हो गयीं। मेघ उचित समयपर जल बरसाते थे और पृथ्वीपर उत्तम धान्य उत्पन्न होते थे। वृक्ष फलों तथा फूलोंसे सदा लदे रहते थे और वे लोगोंके लिये बड़े सुखदायक हो गये॥ २३-२४॥
गावश्च क्षीरसम्पन्ना घटोध्न्यः कामदा नृणाम्।<br>नद्यः सुमार्गाः स्वच्छाः शीतोदाः खगसंयुताः॥ २५घड़ेके समान थनवाली दुधारू गौएँ मनुष्योंको उनकी इच्छाके अनुसार दूध दिया करती थीं। स्वच्छ एवं शीतल जलवाली नदियाँ सुगमतापूर्वक बहती थीं और पक्षियोंसे सुशोभित रहती थीं॥ २५॥
ब्राह्मणा वेदतत्त्वाश्च यज्ञकर्मरतास्तथा।<br>क्षत्रिया धर्मसंयुक्ता दानाध्ययनतत्पराः॥ २६<br><br>शस्त्रविद्यारता नित्यं प्रजारक्षणतत्पराः।<br>न्यायदण्डधराः सर्वे राजानः शमसंयुताः॥ २७ब्राह्मण वेदतत्त्वोंके ज्ञाता हो गये और यज्ञकर्ममें प्रवृत्त रहने लगे। क्षत्रिय धर्मभावनासे ओतप्रोत हो गये और सदा दान तथा अध्ययनमें तत्पर रहने लगे। सभी राजा शस्त्रविद्या प्राप्त करनेमें संलग्न हो गये, वे सदा प्रजाओंकी रक्षा करने लगे, उनका दण्ड-विधान न्यायके अनुसार चलने लगा और वे शान्तिगुणसे सम्पन्न हो गये॥ २६-२७॥
अविरोधस्तु भूतानां सर्वेषां सम्बभूव ह।<br>आकरा धनदा नॄणां व्रजा गोयूथसंयुताः॥ २८सभी प्राणियोंमें परस्पर मेल-जोल रहने लगा, खानोंसे मनुष्योंको अपार धन प्राप्त होने लगा और गोशालाएँ गोसमुदायसे सम्पन्न हो गयीं॥ २८॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम।<br>देवीभक्तिपराः सर्वे सम्बभूवुर्धरातले॥ २९हे नृपश्रेष्ठ! उस समय धरातलपर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये सब-के-सब देवीकी भक्तिमें संलग्न हो गये॥ २९॥
सर्वत्र यज्ञयूपाश्च मण्डपाश्च मनोहराः।<br>मखैः पूर्णा धराश्चासन् ब्राह्मणैः क्षत्रियैः कृतैः॥ ३०सर्वत्र मनोहर यज्ञमण्डप तथा यज्ञयूप दृष्टिगोचर होते थे। ब्राह्मणों तथा क्षत्रियोंद्वारा सम्पन्न किये गये यज्ञोंसे सारी पृथ्वी सुशोभित होने लगी॥ ३०॥