भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 646
अ० २० ]पञ्चम स्कन्ध६३७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भ्रमन्ति नित्यं किल दासभूता<br>आज्ञाकराः केवलभारवाहाः।<br>दिवानिशं स्वार्थपराः कदापि<br>नैवाप्नुवन्त्योदरपूर्तिमात्रम् ॥ ९ही वे लोग दूसरोंके दास बनकर निरन्तर घूमते रहते हैं और आज्ञाकारी होकर दूसरोंका भार ढोया करते हैं। वे दिन-रात स्वार्थसाधनमें लगे रहते हैं, फिर भी उन्हें अपना पेट भरनेतकके लिये अन्न कभी नहीं मिलता॥ ८-९॥
अन्धाश्च मूका बधिराश्च खञ्जाः<br>कुष्ठान्विता ये भुवि दुःखभाजः।<br>तत्रानुमानं कविभिर्विधेयं<br>नाराधिता तैः सततं भवानी॥ १०इस संसारमें जो लोग अन्धे, गूँगे, बहरे, लूले और कोढ़ीके रूपमें कष्ट भोग रहे हैं, उनके विषयमें विद्वानोंको यह अनुमान कर लेना चाहिये कि उन्होंने भगवतीकी निरन्तर आराधना नहीं की है॥ १०॥
ये राजभोगान्वितऋद्धिपूर्णाः<br>संसेव्यमाना बहुभिर्मनुष्यैः।<br>दृश्यन्ति ये वा विभवैः समेता-<br>स्तैः पूजिताम्बेत्यनुमेयमेव॥ ११जो लोग राजोचित भोगसे युक्त, ऐश्वर्यसे सम्पन्न, अनेक मनुष्योंसे सेवित और वैभवशाली दिखायी पड़ते हैं, उनके विषयमें यह अनुमान लगाना चाहिये कि उन्होंने अवश्य ही जगदम्बाकी उपासना की है॥ ११॥
तस्मात्सत्यवतीसूनो देव्याश्चरितमुत्तमम्।<br>कथयस्व कृपां कृत्वा दयावानसि साम्प्रतम्॥ १२अतएव हे सत्यवतीनन्दन! अब आप कृपा करके भगवतीके उत्तम चरित्रका वर्णन कीजिये; आप बड़े दयालु हैं॥ १२॥
हत्वा तं महिषं पापं स्तुता सम्पूजिता सुरैः।<br>क्व गता सा महालक्ष्मीः सर्वतेजःसमुद्भवा॥ १३उस पापी महिषासुरका वध करनेके पश्चात् देवताओंसे भलीभाँति पूजित होकर सभी देवताओंके तेजसे प्रादुर्भूत वे भगवती महालक्ष्मी कहाँ चली गयीं?॥ १३॥
कथितं ते महाभाग गतान्तर्धानमाशु सा।<br>स्वर्गे वा मृत्युलोके वा संस्थिता भुवनेश्वरी॥ १४<br><br>लयं गता वा तत्रैव वैकुण्ठे वा समाश्रिता।<br>अथवा हेमशैले सा तत्त्वतो मे वदाधुना॥ १५हे महाभाग! आपने अभी कहा है कि वे तुरंत अन्तर्धान हो गयीं। स्वर्गलोक अथवा मृत्युलोक किस जगह वे भगवती भुवनेश्वरी प्रतिष्ठित हुईं? वे वहींपर विलीन हो गयीं या वैकुण्ठधाममें विराजने लगीं अथवा वे सुमेरुपर्वतपर विराजमान हुईं, अब आप मुझे यह सब यथार्थरूपमें बतायें॥ १४-१५॥
व्यास उवाच<br>पूर्वं मया ते कथितं मणिद्वीपं मनोहरम्।<br>क्रीडास्थानं सदा देव्या वल्लभं परमं स्मृतम्॥ १६<br><br>यत्र ब्रह्मा हरिः स्थाणुः स्त्रीभावं ते प्रपेदिरे।<br>पुरुषत्वं पुनः प्राप्य स्वानि कार्याणि चक्रिरे॥ १७<br><br>यः सुधासिन्धुमध्येऽस्ति द्वीपः परमशोभनः।<br>नानारूपैः सदा तत्र विहारं कुरुतेऽम्बिका॥ १८व्यासजी बोले—[हे राजन्!] इसके पहले मैं आपसे रमणीय मणिद्वीपका वर्णन कर चुका हूँ। वह भगवतीका क्रीडास्थल है तथा उनके लिये सदा परम प्रिय बतलाया गया है। जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्त्रीरूपमें परिणत हो गये थे और पुनः पुरुषत्व पाकर वे अपने-अपने कार्योंमें संलग्न हो गये। वह परम सुन्दर द्वीप सुधासागरके मध्यमें विराजमान है। भगवती जगदम्बा वहाँ अनेक रूपोंमें सदा विहार करती रहती हैं॥ १६-१८॥