देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 648
अ० २० ] पञ्चम स्कन्ध ६३९
| पतिव्रतधरा नार्यः सुशीलाः सत्यसंयुताः।<br>पितृभक्तिपराः पुत्रा आसन्धर्मपरायणाः॥ ३१ | उस समय स्त्रियाँ पातिव्रतधर्मपरायण, सुशील तथा सत्यनिष्ठ थीं और पुत्र पिताके प्रति श्रद्धा रखनेवाले तथा धर्मशील होते थे॥ ३१॥ |
| न पाखण्डं न वाधर्मः कुत्रापि पृथिवीतले।<br>वेदवादाः शास्त्रवादा नान्ये वादास्तथाभवन्॥ ३२ | पृथिवीतलपर पाखण्ड तथा अधर्म कहीं भी नहीं रह गया। उस समय वेदवाद और शास्त्रवादके अतिरिक्त अन्य कोई वाद प्रचलित नहीं थे॥ ३२॥ |
| कलहो नैव केषाञ्चिन्न दैन्यं नाशुभा मतिः।<br>सर्वत्र सुखिनो लोकाः काले च मरणं तथा॥ ३३ | उस समय किसीमें भी परस्पर कलह नहीं होता था, दीनता नहीं थी और किसीकी अशुभ बुद्धि नहीं रह गयी थी। सभी जगह लोग सुखी थे और आयु पूर्ण होनेपर ही उनकी मृत्यु होती थी, किसीकी अकालमृत्यु नहीं होती थी॥ ३३॥ |
| सुहृदां न वियोगश्च नापदश्च कदाचन।<br>नानावृष्टिर्न दुर्भिक्षं न मारी दुःखदा नृणाम्॥ ३४ | मित्रोंमें वियोग नहीं होता था, किसीपर कभी विपत्तियाँ नहीं आती थीं, अनावृष्टि नहीं होती थी, न अकाल पड़ता था और न तो दुःखदायिनी महामारी ही मनुष्योंको ग्रसित करती थी॥ ३४॥ |
| न रोगो न च मात्सर्यं न विरोधः परस्परम्।<br>सर्वत्र सुखसम्पन्ना नरा नार्यः सुखान्विताः॥ ३५<br><br>क्रीडन्ति मानवाः सर्वे स्वर्गे देवगणा इव।<br>न चौरा न च पाखण्डा वञ्चका दम्भिकास्तथा॥ ३६<br><br>पिशुना लम्पटाः स्तब्धा न बभूवुस्तदा नृप।<br>न वेदद्वेषिणः पापा मानवाः पृथिवीपते॥ ३७<br><br>सर्वधर्मरता नित्यं द्विजसेवापरायणाः। | न किसीको रोग था और न तो लोगोंका आपसमें डाह तथा विरोध ही था। सर्वत्र नर तथा नारी सब प्रकारसे सुखी थे। सभी मनुष्य स्वर्गमें रहनेवाले देवताओंकी भाँति आनन्द भोगते थे। हे राजन्! उस समय चोर, पाखण्डी, धोखेबाज, दम्भी, चुगलखोर, लम्पट तथा जड़ प्रकृतिवाले मनुष्य नहीं रह गये थे। हे भूपते! वेदोंसे द्वेष करनेवाले तथा पापी मनुष्य उस समय नहीं थे, अपितु सभी लोग धर्मनिष्ठ थे और नित्य ब्राह्मणोंकी सेवामें लगे रहते थे॥ ३५—३७ ½॥ |
| त्रिधात्वात्सृष्टिधर्मस्य त्रिविधा ब्राह्मणास्ततः॥ ३८<br><br>सात्त्विका राजसाश्चैव तामसाश्च तथापरे।<br>सर्वे वेदविदो दक्षाः सात्त्विकाः सत्त्ववृत्तयः॥ ३९<br><br>प्रतिग्रहविहीनाश्च दयादमपरायणाः।<br>यज्ञांस्ते सात्त्विकैरन्नैः कुर्वाणा धर्मतत्पराः॥ ४०<br><br>पुरोडाशविधानैश्च पशुभिर्न कदाचन।<br>दानमध्ययनञ्चैव यजनं तु तृतीयकम्॥ ४१<br>त्रिकर्मरसिकास्ते वै सात्त्विका ब्राह्मणा नृप। | सृष्टिधर्मके तीन प्रकार होनेके कारण ब्राह्मण भी तीन प्रकारके थे—सात्त्विक, राजस तथा तामस। उनमें सत्त्व-वृत्तिवाले सभी सात्त्विक ब्राह्मण वेदोंके ज्ञाता तथा [यज्ञकार्योंमें] दक्ष, दान लेनेकी प्रवृत्तिसे रहित, दयालु तथा संयम रखनेवाले थे। वे धर्मपरायण रहकर सात्त्विक अन्नोंसे यज्ञ करते हुए सदा पुरोडाशके द्वारा विधिविधानसे हवन करते थे और पशुबलिके द्वारा कभी भी यज्ञ सम्पन्न नहीं करते थे। हे राजन्! वे सात्त्विक ब्राह्मण दान, अध्ययन और यज्ञ—इन्हीं तीनों कार्योंमें सदा अभिरुचि रखते थे*॥ ३८—४१ ½॥ |
* सात्त्विक ब्राह्मणोंद्वारा किये जानेवाले निरामिष यज्ञकी प्रशंसा करनेसे यह स्पष्ट है कि मांस-भक्षणादि तथा काम-क्रोधादि विकार रजोगुण तथा तमोगुणसे उत्पन्न हो जाते हैं, अतः सर्वथा त्याज्य हैं; इन्हें भ्रमवश विधि नहीं समझना चाहिये।