देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 649, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 649
६४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजसा वेदविद्वांसः क्षत्रियाणां पुरोहिताः ॥ ४२<br>षट्कर्मनिरताः सर्वे विधिवन्मांसभक्षकाः ।<br>यजनं याजनं दानं तथैव च प्रतिग्रहः ॥ ४३ | राजस ब्राह्मण वेदके विद्वान् थे और वे क्षत्रियोंके पुरोहित होते थे। वे यथाविधि मांसभक्षी थे। वे सदा छः कर्मोंमें ही संलग्न रहते थे। यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, दान लेना, वेद पढ़ना और वेद पढ़ाना—ये ही उनके छः कर्म थे॥ ४२-४३ ½ ॥ |
| अध्ययनं तु वेदानां तथैवाध्यापनं तु षट् ।<br>तामसाः क्रोधसंयुक्ता रागद्वेषपराः पुनः ॥ ४४<br>राज्ञां कर्मकरा नित्यं किञ्चिदध्ययने रताः । | तामस प्रकृतिवाले ब्राह्मण क्रोधी और राग-द्वेषपरायण रहते थे। वे सदा राजाओंके यहाँ कर्मचारीके रूपमें कार्य करते थे। वे कुछ-कुछ अध्ययनमें भी संलग्न रहते थे॥ ४४ ½ ॥ |
| महिषे निहते सर्वे सुखिनो वेदतत्पराः ॥ ४५<br>बभूवुर्व्रतनिष्णाता दानधर्मपरास्तथा ।<br>क्षत्रियाः पालने युक्ता वैश्या वणिज्वृत्तयः ॥ ४६<br>कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदवृत्तयः परे ।<br>एवं प्रमुदितो लोको महिषे विनिपातिते ॥ ४७ | इस प्रकार महिषासुरका वध हो जानेपर सभी ब्राह्मण सुखी, वेदपरायण, व्रतनिष्ठ तथा दान-धर्ममें संलग्न हो गये; क्षत्रिय प्रजापालनमें लग गये; वैश्य व्यवसायमें तत्पर हो गये और कुछ अन्य वैश्य कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा तथा सूदपर धन देनेके कर्ममें प्रवृत्त हो गये। इस प्रकार महिषासुरके संहारके पश्चात् सारा जनसमुदाय आनन्दसे परिपूर्ण हो गया॥ ४५-४७॥ |
| अनुद्वेगः प्रजानां वै सम्बभूव धनागमः ।<br>बहुक्षीराः शुभा गावो नद्यश्चैव बहूदकाः ॥ ४८<br>वृक्षा बहुफलाश्चासन्मानवा रोगवर्जिताः ।<br>नाधयो नेतयः क्वापि प्रजानां दुःखदायकाः ॥ ४९ | प्रजाओंकी व्याकुलता दूर हो गयी, उन्हें पर्याप्त धन प्राप्त होने लगा, गौएँ परम सुन्दर तथा बहुत दूध देनेवाली हो गयीं, नदियाँ प्रचुर जलसे भर गयीं, वृक्ष बहुत अधिक फलोंसे लद गये और सभी मनुष्य रोगरहित हो गये। कहीं भी किसी प्राणीको मानसिक व्याधियाँ तथा प्राकृतिक आपदाएँ व्यथित नहीं करती थीं॥ ४८-४९॥ |
| न निधनमुपयान्ति प्राणिनस्तेऽप्यकाले<br>सकलविभवयुक्ता रोगहीनाः सदैव ।<br>निगमविहितधर्मे तत्पराश्चण्डिकाया-<br>श्चरणसरसिजानां सेवने दत्तचित्ताः ॥ ५० | उस समय सभी प्राणी अकालमृत्युको प्राप्त नहीं होते थे, वे सब प्रकारके वैभवसे सम्पन्न तथा नीरोग रहते थे। वेदप्रतिपादित धर्ममें तत्पर रहते हुए सभी लोगोंने भगवती चण्डिकाके चरणकमलोंकी सेवामें ही अपना चित्त लगा दिया था॥ ५०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषवधानन्तरं पृथिवीसुखवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
अथैकविंशोऽध्यायः
शुम्भ और निशुम्भको ब्रह्माजीके द्वारा वरदान, देवताओंके साथ उनका युद्ध और देवताओंकी पराजय
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि देव्याश्चरितमुत्तमम् ।<br>सुखदं सर्वजन्तूनां सर्वपापप्रणाशनम् ॥ १ | हे राजन्! सुनिये, मैं देवीका उत्तम चरित्र कहता हूँ; यह सम्पूर्ण प्राणियोंको सुख देनेवाला तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाला है॥ १॥ |