भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 889 में से

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पृष्ठ 643
६३४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९

| देवा मखेष्वपि हुतं मुनिभिः स्वभागं<br>गृहीयुरम्ब विधिवत्प्रतिपादितं किम्।<br>स्वाहा न चेत्त्वमसि तत्र निमित्तभूता<br>तस्मात्त्वमेव ननु पालयसीव विश्वम्॥ ३० | हे माता! यदि आप यज्ञोंमें 'स्वाहा' के रूपमें निमित्त न बनतीं तो क्या देवगण उन यज्ञोंमें मुनियोंके द्वारा विधिवत् प्रदत्त आहुति-रूप यज्ञभाग प्राप्त करते? अतः यह निश्चय हो गया कि आप ही विश्वका पालन करती हैं॥ ३०॥ | | सर्वं त्वयेदमखिलं विहितं भवादौ<br>त्वं पासि वै हरिहरप्रमुखान्दिगीशान्।<br>कालेऽत्सि विश्वमपि ते चरितं भवाद्यं<br>जानन्ति नैव मनुजाः क्व नु मन्दभाग्याः॥ ३१ | सृष्टिके प्रारम्भमें इस सम्पूर्ण जगत्की रचना आपने ही की है, आप ही विष्णु-शिव आदि प्रमुख देवताओं तथा दिक्पालोंकी रक्षा करती हैं और प्रलयकालमें आप ही सम्पूर्ण विश्वको अपनेमें विलीन कर लेती हैं। [हे देवि!] जब ब्रह्मा आदि देवता भी आपके आद्य चरित्रको नहीं जान पाते, तब मन्दभाग्य हम देवता उसे कैसे जान सकते हैं?॥ ३१॥ | | हत्वासुरं महिषरूपधरं महोग्रं<br>मातस्त्वया सुरगणः किल रक्षितोऽयम्।<br>कां ते स्तुतिं जननि मन्दधियो विदामो<br>वेदा गतिं तव यथार्थतया न जग्मुः॥ ३२ | हे माता! आपने महिषका रूप धारण करनेवाले अत्यन्त उग्र असुरका वध करके इस देवसमुदायकी रक्षा की है। हे जननि! जब वेद भी यथार्थरूपसे आपकी गतिको नहीं जान पाये, तब हम मन्दबुद्धि देवता उसे कैसे जान सकते हैं, हम कैसे आपकी स्तुति करें?॥ ३२॥ | | कार्यं कृतं जगति नो यदसौ दुरात्मा<br>वैरी हतो भुवनकण्टकदुर्विभाव्यः।<br>कीर्तिः कृता ननु जगत्सु कृपा विधेया-<br>प्यस्मांश्च पाहि जननि प्रथितप्रभावे॥ ३३ | विख्यात प्रभाववाली हे जननि! आपने जगत्में महान् कार्य किया है जो कि आपने संसारके अचिन्त्य कण्टकस्वरूप हमारे शत्रु दुरात्मा महिषासुरका वध कर दिया। ऐसा करके आपने सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी कीर्ति स्थापित कर दी है, अब आप सारे संसारपर अनुग्रह करें और हमारी रक्षा करें॥ ३३॥ | | व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैर्देवी तानुवाच मृदुस्वरा।<br>अन्यत्कार्यं च दुःसाध्यं ब्रुवन्तु सुरसत्तमाः॥ ३४<br><br>यदा यदा हि देवानां कार्यं स्यादतिदुर्घटम्।<br>स्मर्तव्याहं तदा शीघ्रं नाशयिष्यामि चापदम्॥ ३५ | व्यासजी बोले— इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर देवीने मधुर स्वरमें उनसे कहा—हे श्रेष्ठ देवतागण! इसके अतिरिक्त भी कोई दुःसाध्य कार्य हो तो उसे आपलोग बता दीजिये। जब-जब आप देवताओंके सामने कोई महान् दुःसाध्य कार्य उपस्थित हो, तब-तब आपलोग मेरा स्मरण कीजियेगा; मैं उस संकटको शीघ्र ही दूर कर दूँगी॥ ३४-३५॥ | | देवा ऊचुः<br>सर्वं कृतं त्वया देवि कार्यं नः खलु साम्प्रतम्।<br>यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः॥ ३६ | देवता बोले— हे देवि! इस समय आपने हमारा सारा कार्य पूर्ण कर दिया है जो कि आपके द्वारा हमारा शत्रु यह महिषासुर मार डाला गया॥ ३६॥ |

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