भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 644
अ० २० ]पञ्चम स्कन्ध६३५
स्मरिष्यामो यथा तेऽम्ब सदैव पदपङ्कजम्।<br>तथा कुरु जगन्मातर्भक्तिं त्वय्यप्यचञ्चलाम्॥ ३७हे अम्ब! हे जगज्जननि! अब आप हमारे मनमें अपने प्रति ऐसी अविचल भक्ति स्थापित कीजिये कि हम सदा आपके चरण-कमलका स्मरण करते रहें॥ ३७॥
अपराधसहस्राणि मातैव सहते सदा।<br>इति ज्ञात्वा जगद्योनिं न भजन्ते कुतो जनाः॥ ३८माता ही [अपनी सन्तानके] हजारों अपराध सह सकती है—ऐसा समझकर लोग जगत्‌की उत्पत्तिस्वरूपा भगवतीकी उपासना क्यों नहीं करते?॥ ३८॥
द्वौ सुपर्णौ तु देहेऽस्मिंस्तयोः सख्यं निरन्तरम्।<br>नान्यः सखा तृतीयोऽस्ति योऽपराधं सहेत हि॥ ३९<br><br>तस्माज्जीवः सखायं त्वां हित्वा किं नु करिष्यति।<br>पापात्मा मन्दभाग्योऽसौ सुरमानुषयोनिषु॥ ४०<br><br>प्राप्य देहं सुदुष्प्रापं न स्मरेत्त्वां नराधमः।<br>मनसा कर्मणा वाचा ब्रूमः सत्यं पुनः पुनः॥ ४१इस देहरूपी वृक्षपर जीवात्मा और परमात्मारूपी दो पक्षी रहते हैं। उन दोनोंमें सर्वदा मित्रता बनी रहती है, किंतु उनका तीसरा सखा ऐसा कोई भी नहीं है, जो अपराधको सह सके। अतएव यह जीव आप-जैसे मित्रको त्यागकर क्या करेगा? देवताओं और मानवोंकी योनिमें वह प्राणी पापी, मन्दभागी और अधम है, जो अत्यन्त दुर्लभ देह पाकर भी आपका स्मरण नहीं करता॥ ३९-४० १/२॥
सुखे वाप्यथवा दुःखे त्वं नः शरणमद्भुतम्।<br>पाहि नः सततं देवि सर्वैस्तव वरायुधैः॥ ४२<br><br>अन्यथा शरणं नास्ति त्वत्पादाम्बुजरेणुतः।हम मन, वाणी और कर्मसे बार-बार यह सत्य कह रहे हैं कि सुख अथवा दुःख—प्रत्येक परिस्थितिमें एकमात्र आप ही हमारे लिये अद्भुत शरण हैं। हे देवि! आप अपने समस्त श्रेष्ठ आयुधोंद्वारा हमारी निरन्तर रक्षा करें। आपके चरणकमलोंकी धूलिको छोड़कर हमारे लिये कोई दूसरा शरण नहीं है॥ ४१-४२ १/२॥
व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैर्देवी तत्रैवान्तरधीयत।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवास्तां वीक्ष्य निर्गताम्॥ ४३व्यासजी बोले— इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर भगवती जगदम्बा वहीं अन्तर्धान हो गयीं। तब उन्हें अन्तर्हित देखकर देवता बड़े विस्मयमें पड़ गये॥ ४३॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीसान्त्वनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥


अथ विंशोऽध्यायः

देवीका मणिद्वीप पधारना तथा राजा शत्रुघ्नका भूमण्डलाधिपति बनना

जनमेजय उवाच<br>अथाद्भुतं वीक्ष्य मुने प्रभावं<br>देव्या जगच्छान्तिकरं परञ्च।<br>न तृप्तिरस्ति द्विजवर्य शृण्वतः<br>कथामृतं ते मुखपद्मजातम्॥ १जनमेजय बोले— हे मुने! अब मैंने भगवतीके अत्यन्त अद्भुत तथा जगत्‌को शान्ति प्रदान करनेवाले प्रभावको तो देख लिया, फिर भी हे द्विजवर! आपके मुखारविन्दसे निकली हुई सुधामयी कथाको बार-बार