भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 642
अ० १९ ]पञ्चम स्कन्ध६३३

| मन्ये गुणास्तव भुवि प्रथितप्रभावाः<br>कुर्वन्ति ये हि विमुखान्ननु भक्तिभावात्।<br>लोकान्स्वबुद्धिरचितैर्विविधागमैश्च<br>विष्ण्वीशभास्करगणेशपरान्विधाय ॥ २४ | मैं तो यही समझता हूँ कि अद्भुत प्रभावोंवाले जो आपके सत्त्व, रज और तम गुण हैं, वे ही मनुष्योंको उन्हींकी अपनी ही बुद्धिद्वारा विरचित अनेक प्रकारके शास्त्रोंमें उलझाकर उन्हें विष्णु, शिव, सूर्य, गणेश आदिका उपासक बनाकर आपके भक्तिभावसे सर्वथा विमुख कर देते हैं॥ २४॥ | | कुर्वन्ति ये तव पदाद्विमुखान्नराग्या-<br>न्स्वोक्तागमैर्हरिहरार्चनभक्तियोगैः ।<br>तेषां न कुप्यसि दयां कुरुषेऽम्बिके त्वं<br>तान्मोहमन्त्रनिपुणान्प्रथयस्यलं च॥ २५ | हे अम्बिके! जो लोग विष्णु तथा शिवकी पूजा और भक्तिसे परिपूर्ण शास्त्रोंके उपदेशद्वारा ब्राह्मणोंको आपके चरणोंसे विमुख कर देते हैं, उनके ऊपर भी आप क्रोध नहीं करती हैं, बल्कि दया ही करती हैं और इसके अतिरिक्त मोहन आदि मन्त्रोंके ज्ञाताओंको भी आप संसारमें बहुत प्रसिद्ध बना देती हैं॥ २५॥ | | तुर्ये युगे भवति चातिबलं गुणस्य<br>तुर्यस्य तेन मथितान्यसदागमानि।<br>त्वां गोपयन्ति निपुणाः कवयः कलौ वै<br>त्वत्कल्पितान्सुरगणानपि संस्तुवन्ति॥ २६ | सत्ययुगमें सत्त्वगुणकी प्रबलता रहती है, अतः उस युगमें असत्-शास्त्रोंपर आस्था नहीं हो पाती। किंतु कलिमें तो कवित्वके अभिमानी लोग आपकी उपेक्षा करते हैं और आपहीके द्वारा बनाये गये देवताओंकी स्तुति करते हैं॥ २६॥ | | ध्यायन्ति मुक्तिफलदां भुवि योगसिद्धां<br>विद्यां पराञ्च मुनयोऽतिविशुद्धसत्त्वाः।<br>ते नाप्नुवन्ति जननीजठरे तु दुःखं<br>धन्यास्त एव मनुजास्त्वयि ये विलीनाः॥ २७ | इस पृथवीतलपर अत्यन्त शुद्ध अन्तःकरणवाले जो सात्त्विक मुनिगण मुक्ति-फल प्रदान करनेवाली योगसिद्धा एवं पराविद्यास्वरूपिणी आप भगवतीका ध्यान करते हैं, वे पुनः माताके गर्भमें आकर कष्ट नहीं पाते। जो मनुष्य आपमें ध्यानमग्न हैं, वे धन्य हैं॥ २७॥ | | चिच्छक्तिरस्ति परमात्मनि येन सोऽपि<br>व्यक्तो जगत्सु विदितो भवकृत्यकर्ता।<br>कोऽन्यस्त्वया विरहितः प्रभवत्यमुष्मिन्<br>कर्तुं विहर्तुमपि सञ्चलितुं स्वशक्त्या॥ २८ | आप चित्-शक्ति हैं और वही चित्-शक्ति परमात्मामें विद्यमान है, जिसके कारण वे भी [नाम और रूपसे] अभिव्यक्त होकर इस जगत्के सृजन, पालन एवं संहाररूपी कार्योंके कर्ताके रूपमें लोकोंमें प्रसिद्ध होते हैं। उन परमात्माके अतिरिक्त दूसरा कौन है, जो आपसे रहित होकर अपनी शक्तिसे इस जगत्का सृजन, पालन और संहार करनेमें समर्थ हो सकता है?॥ २८॥ | | तत्त्वानि चिद्विरहितानि जगद्विधातुं<br>किं वा क्षमाणि जगदम्ब यतो जडानि।<br>किं चेन्द्रियाणि गुणकर्मयुतानि सन्ति<br>देवि त्वया विरहितानि फलं प्रदातुम्॥ २९ | हे जगदम्बे! क्या चित्-शून्य तत्त्व जगत्की रचना करनेमें समर्थ हो सकते हैं? चूंकि तत्त्व जड़ हैं, अतः वे जगत्की रचनामें समर्थ नहीं हैं। हे देवि! यद्यपि इन्द्रियाँ गुण तथा कर्मसे युक्त हैं, फिर भी आपसे रहित होकर क्या वे फल प्रदान कर सकती हैं?॥ २९॥ |