भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 625
६१६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सत्यं ब्रवीमि येनाद्य त्वया वचनसौहृदम्।<br>दर्शितं तेन तुष्टास्मि जीवन्गच्छ यथासुखम्॥ ४४<br><br>सतां सप्तपदी मैत्री तेन मुञ्चामि जीवितम्।<br>मरणेच्छास्ति चेद्युद्धं कुरु वीर यथासुखम्॥ ४५<br><br>हनिष्यामि महाबाहो त्वामहं नात्र संशयः।मैं तुमसे यह सत्य कह रही हूँ, तुमने वाणीद्वारा सौहार्दपूर्ण भाव प्रदर्शित किया है, अतः मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ। अब तुम जीवित रहते ही सुखपूर्वक यहाँसे चले जाओ। केवल सात पग साथ चलनेपर ही सज्जनोंमें मैत्री हो जाती है, इसी कारण मैं तुम्हें जीवित छोड़ दे रही हूँ। हे वीर! यदि मरनेकी ही इच्छा हो तो तुम मेरे साथ आनन्दसे युद्ध कर सकते हो। हे महाबाहो! मैं तुम्हें युद्धमें मार डालूँगी; इसमें संशय नहीं है॥ ४४-४५ ½ ॥
व्यास उवाच<br>इति तस्या वचः श्रुत्वा दानवः काममोहितः॥ ४६<br><br>उवाच श्लक्ष्णया वाचा मधुरं वचनं ततः।<br>बिभेम्यहं वरारोहे त्वां प्रहर्तुं वरानने॥ ४७<br><br>कोमलां चारुसर्वाङ्गीं नारीं नरविमोहिनीम्।<br>जित्वा हरिहरादींश्च लोकपालांश्च सर्वशः॥ ४८<br><br>किं त्वया सह युद्धं मे युक्तं कमललोचने।व्यासजी बोले— भगवतीका यह वचन सुनकर कामसे मोहित दानव [पुनः] मधुर वाणीमें मीठी बातें करने लगा— हे सुन्दरि! हे सुमुखि! कोमल, सुन्दर अंगोंवाली तथा पुरुषोंको मोह लेनेवाली तुझ युवतीके ऊपर प्रहार करनेमें मुझे भय लगता है। हे कमललोचने! विष्णु, शिव आदि बड़े-बड़े देवताओं और सब लोकपालोंपर विजय प्राप्त करके क्या अब तुम्हारे साथ मेरा युद्ध करना उचित होगा?॥ ४६—४८ ½॥
रोचते यदि चार्वङ्गि विवाहं कुरु मां भज॥ ४९<br><br>नोचेद् गच्छ यथेष्टं ते देशं यस्मात्समागता।<br>नाहं त्वां प्रहरिष्यामि यतो मैत्री कृता त्वया॥ ५०<br><br>हितमुक्तं शुभं वाक्यं तस्माद् गच्छ यथासुखम्।<br>का शोभा मे भवेदन्ते हत्वा त्वां चारुलोचनाम्॥ ५१<br><br>स्त्रीहत्या बालहत्या च ब्रह्महत्या दुरत्यया।हे सुन्दर अंगोंवाली! यदि तुम्हारी इच्छा हो तो मेरे साथ विवाह कर लो और मेरा सेवन करो; अन्यथा तुम जहाँसे आयी हो, उसी देशमें इच्छानुसार चली जाओ। मैं तुम्हारे साथ मित्रता कर चुका हूँ, इसलिये तुमपर प्रहार नहीं करूँगा। यह मैंने तुम्हारे लिये हितकर तथा कल्याणकारी बात बतायी है; इसलिये तुम सुखपूर्वक यहाँसे चली जाओ। सुन्दर नेत्रोंवाली तुझ रमणीका वध करनेसे मेरी कौन-सी गरिमा बढ़ जायगी? स्त्रीहत्या, बालहत्या और ब्रह्महत्याका पाप बहुत ही जघन्य होता है॥ ४९—५१ ½॥
गृहीत्वा त्वां गृहं नूनं गच्छाम्यद्य वरानने॥ ५२<br><br>तथापि मे फलं न स्याद् बलाद्भोगसुखं कुतः।<br>प्रब्रवीमि सुकेशि त्वां विनयावनतो यतः॥ ५३<br><br>पुरुषस्य सुखं न स्यादृते कान्तामुखाम्बुजात्।<br>तत्तथैव हि नारीणां न स्याच्च पुरुषं विना॥ ५४हे वरानने! वैसे तो मैं तुम्हें बलपूर्वक पकड़कर अपने घर निश्चितरूपसे ले जा सकता हूँ, किंतु बलप्रयोगसे मुझे सच्चा सुख नहीं मिलेगा, उसमें भोगसुख कैसे प्राप्त हो सकता है? अतएव हे सुकेशि! मैं बहुत विनीतभावसे तुमसे कह रहा हूँ कि जैसे पुरुषको अपनी प्रियाके मुखकमलके बिना सुख नहीं मिलता, उसी प्रकार स्त्रियोंको भी पुरुषके बिना सुख नहीं मिलता॥ ५२—५४॥