देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 624, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 624
| अ० १६ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दयां कुरु विशालाक्षि तप्तोऽस्मि काममार्गणैः।<br>जन्मप्रभृति चार्वङ्गि दैन्यं नाचरितं मया ॥ ३२<br><br>ब्रह्मादीनीश्वरान्प्राप्य त्वयि तद्विदधाम्यहम्।<br>चरितं मम जानन्ति रणे ब्रह्मादयः सुराः ॥ ३३<br><br>सोऽप्यहं तव दासोऽस्मि मन्मुखं पश्य भामिनि। | हे विशालाक्षि! मैं कामदेवके बाणोंद्वारा सन्तप्त हो रहा हूँ, अतः तुम मेरे ऊपर दया करो। हे सुन्दरि! जन्मसे लेकर आजतक मैंने ब्रह्मा आदि देवताओंके समक्ष भी दीनता नहीं प्रदर्शित की, किंतु तुम्हारे समक्ष आज उसे प्रकट कर रहा हूँ। ब्रह्मा आदि देवता समरांगणमें मेरे चरित्रको जानते हैं। हे भामिनि! वही मैं आज तुम्हारी दासता स्वीकार करता हूँ, मेरी ओर देखो ॥ ३२–३३ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति ब्रुवाणं तं दैत्यं देवी भगवती हि सा ॥ ३४<br><br>प्रहस्य सस्मितं वाक्यमुवाच वरवर्णिनी। | व्यासजी बोले— ऐसा कहते हुए उस दैत्य महिषासुरसे हँसकर अनुपम सौन्दर्यमयी भगवती मुसकानके साथ यह वचन कहने लगीं ॥ ३४ १/२ ॥ |
| देव्युवाच<br>नाहं पुरुषमिच्छामि परं पुरुषं विना ॥ ३५<br><br>तस्य चेच्छाम्यहं दैत्य सृजामि सकलं जगत्।<br>स मां पश्यति विश्वात्मा तस्याहं प्रकृतिः शिवा ॥ ३६<br><br>तत्सान्निध्यवशादेव चैतन्यं मयि शाश्वतम्।<br>जडाहं तस्य संयोगात्प्रभवामि सचेतना ॥ ३७ | देवी बोलीं— मैं परमपुरुषके अतिरिक्त अन्य किसी पुरुषको नहीं चाहती। हे दैत्य! मैं उनकी इच्छाशक्ति हूँ, मैं ही सारे संसारकी सृष्टि करती हूँ। वे विश्वात्मा मुझे देख रहे हैं; मैं उनकी कल्याणमयी प्रकृति हूँ। निरन्तर उनके सांनिध्यके कारण ही मुझमें शाश्वत चेतना है। वैसे तो मैं जड़ हूँ, किंतु उन्हींके संयोगसे मैं चेतनायुक्त हो जाती हूँ जैसे चुम्बकके संयोगसे साधारण लोहेमें भी चेतना उत्पन्न हो जाती है ॥ ३५–३७ १/२ ॥ |
| अयस्कान्तस्य सान्निध्यादयस्सचेतना यथा।<br>न ग्राम्यसुखवाञ्छा मे कदाचिदपि जायते ॥ ३८<br><br>मूर्खस्त्वमसि मन्दात्मन् यत्स्त्रीसङ्गं चिकीर्षसि।<br>नरस्य बन्धनार्थाय शृङ्खला स्त्री प्रकीर्तिता ॥ ३९<br><br>लोहबद्धोऽपि मुच्येत स्त्रीबद्धो नैव मुच्यते।<br>किमिच्छसि च मन्दात्मन् मूत्रागारस्य सेवनम् ॥ ४०<br><br>शमं कुरु सुखाय त्वं शमात्सुखमवाप्स्यसि।<br>नारीसङ्गे महद्दुःखं जानन्किं त्वं विमुह्यसि ॥ ४१ | मेरे मनमें कभी भी विषयभोगकी इच्छा नहीं होती। हे मन्दबुद्धि! तुम मूर्ख हो जो कि स्त्रीसंग करना चाहते हो; पुरुषको बाँधनेके लिये स्त्री जंजीर कही गयी है। लोहेसे बँधा हुआ मनुष्य बन्धनमुक्त हो भी सकता है, किंतु स्त्रीके बन्धनमें बँधा हुआ प्राणी कभी नहीं छूटता। हे मूर्ख! मूत्रागार (गुह्य अंग)-का सेवन क्यों करना चाहते हो? सुखके लिये मनमें शान्ति धारण करो। शान्तिसे ही तुम सुख प्राप्त कर सकोगे। स्त्रीसंगसे बहुत दुःख मिलता है—इस बातको जानते हुए भी तुम अज्ञानी क्यों बनते हो? ॥ ३८–४१ ॥ |
| त्यज वैरं सुरैः सार्धं यथेष्टं विचरावनौ।<br>पातालं गच्छ वा कामं जीवितेच्छा यदस्ति ते ॥ ४२<br><br>अथवा कुरु संग्रामं बलवत्यस्मि साम्प्रतम्।<br>प्रेषिताहं सुरैः सर्वैस्तव नाशाय दानव ॥ ४३ | तुम देवताओंके साथ वैरभाव छोड़ दो और पृथ्वीपर इच्छानुसार विचरण करो। यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी अभिलाषा हो तो पाताललोक चले जाओ अथवा मेरे साथ युद्ध करो। इस समय मुझमें पूर्ण शक्ति विद्यमान है। हे दानव! सभी देवताओंने तुम्हारा नाश करनेके लिये मुझे यहाँ भेजा है ॥ ४२–४३ ॥ |