भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 609, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 609

| ६०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ | | :--- | :--- | | पतिते बाष्कले सैन्यं भग्नं तस्य दुरात्मनः ।<br>जयेति च मुदा देवाश्चक्रुशुर्गगने स्थिताः ॥ २६ | बाष्कलके गिरते ही उस दुरात्माकी सेना भाग गयी और आकाशमण्डलमें विद्यमान देवता प्रसन्नतापूर्वक भगवतीकी जय-जयकार करने लगे ॥ २६ ॥ | | तस्मिंश्च निहते दैत्ये दुर्मुखोऽतिबलान्वितः ।<br>आजगाम रणे देवीं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ २७ | उस दैत्यके मार दिये जानेपर महाबली दुर्मुख क्रोधसे आँखें लाल किये रणभूमिमें देवीके समक्ष आया ॥ २७ ॥ | | तिष्ठ तिष्ठाबले सोऽपि भाषमाणः पुनः पुनः ।<br>धनुर्बाणधरः श्रीमान्रथस्थः कवचावृतः ॥ २८ | उस समय वह वैभवशाली दैत्य ‘अरी अबले ! ठहरो, ठहरो’—ऐसा बार-बार कहते हुए धनुष-बाण धारण करके कवच पहने हुए रथपर सवार था ॥ २८ ॥ | | तमागच्छन्तमालोक्य देवी शङ्खमवादयत् ।<br>कोपयन्ती दानवं तं ज्याघोषञ्च चकार ह ॥ २९ | उस दानवको अपनी ओर आते देखकर देवीने शंखध्वनि की और उसे कुपित करती हुई वे अपने धनुषकी टंकार करने लगीं ॥ २९ ॥ | | सोऽपि बाणान्मुमोचाशु तीक्ष्णानाशीविषोपमान् ।<br>स्वबाणैस्तान्महामाया चिच्छेद च ननाद च ॥ ३० | दुर्मुख भी बड़ी तेजीसे सर्पके समान विषैले तीक्ष्ण बाण छोड़ने लगा। तब महामायाने अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और वे गर्जन करने लगीं ॥ ३० ॥ | | तयोः परस्परं युद्धं बभूव तुमुलं नृप ।<br>बाणशक्तिगदाघातैर्मुसलैस्तोमरैस्तथा ॥ ३१ | हे राजन् ! बाण, शक्ति, गदा, मूसल और तोमर आदिके प्रहारसे उन दोनोंमें परस्पर भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ३१ ॥ | | रणभूमौ तदा जाता रुधिरौघवहा नदी ।<br>पतितानि तदा तीरे शिरांसि प्रबभुस्तदा ॥ ३२<br>यथा सन्तरणार्थाय यमकिङ्करनायकैः ।<br>तुम्बीफलानि नीतानि नवशिक्षापरैर्मुदा ॥ ३३ | उस समय रणभूमिमें रुधिरकी नदी बह चली। उसके तटपर गिरे हुए मस्तक इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, मानो वैतरणी पार करनेके लिये तैरना सीखनेवाले यमदूतोंके द्वारा प्रसन्नतापूर्वक तुम्बीफल लाकर रख दिये गये हों ॥ ३२-३३ ॥ | | रणभूमिस्तदा घोरा बभूवातीव दुर्गमा ।<br>शरीरैः पतितैर्भूमौ खाद्यमानैर्वृकादिभिः ॥ ३४ | भूमिपर कटकर गिरे शवों तथा उन्हें खानेवाले भेड़िये आदि जन्तुओंसे वह रणभूमि अत्यन्त भयंकर तथा दुर्गम हो गयी थी ॥ ३४ ॥ | | गोमायुसारमेयाश्च काकाः कङ्का अयोमुखाः ।<br>गृध्राः श्येनाश्च खादन्ति शरीराणि दुरात्मनाम् ॥ ३५ | सियार, कुत्ते, कौए, कंक, अयोमुख नामक पक्षी, गिद्ध और बाज उन दुष्ट दानवोंके शरीरको [नोच-नोचकर] खा रहे थे ॥ ३५ ॥ | | ववौ वायुश्च दुर्गन्धो मृतानां देहसङ्गतः ।<br>अभूत्किलकिलाशब्दः खगानां पलभक्षिणाम् ॥ ३६ | मृतकोंके शरीरके संसर्गसे दुर्गन्धित हवा चल रही थी और मांसाहारी पक्षियोंकी किलकिला ध्वनि हो रही थी ॥ ३६ ॥ | | तदा चुकोप दुष्टात्मा दुर्मुखः कालमोहितः ।<br>देवीमुवाच गर्वेण कृत्वा चोर्ध्वकरं शुभम् ॥ ३७ | तब कालसे मोहित वह दुरात्मा दुर्मुख अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और गर्वके साथ अपनी सुन्दर भुजा उठाकर देवीसे कहने लगा— ॥ ३७ ॥ |