भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 584, कुल 889 में से

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पृष्ठ 584
अ० ९ ]पञ्चम स्कन्ध५७५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सायुधां भूषणैर्युक्तां दृष्ट्वा ते विस्मयं गताः।<br>तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं त्रैलोक्यमोहिनीं शिवाम्॥ २२इस प्रकार सभी आयुधों तथा आभूषणोंसे युक्त उन भगवतीको देखकर देवतागण अत्यन्त विस्मित हुए और त्रैलोक्यमोहिनी उन कल्याणकारिणी देवीकी स्तुति करने लगे॥ २२॥
देवा ऊचुः<br>नमः शिवायै कल्याण्यै शान्त्यै पुष्ट्यै नमो नमः।<br>भगवत्यै नमो देव्यै रुद्राण्यै सततं नमः॥ २३देवता बोले— शिवाको नमस्कार है। कल्याणी, शान्ति और पुष्टि देवीको बार-बार नमस्कार है। भगवतीको नमस्कार है। देवी रुद्राणीको निरन्तर नमस्कार है॥ २३॥
कालरात्र्यै तथाम्बायै इन्द्राण्यै ते नमो नमः।<br>सिद्धयै बुद्धयै तथा वृद्धयै वैष्णव्यै ते नमो नमः॥ २४आप कालरात्रि, अम्बा तथा इन्द्राणीको बार-बार नमस्कार है। आप सिद्धि, बुद्धि, वृद्धि तथा वैष्णवीको बार-बार नमस्कार है॥ २४॥
पृथिव्यां या स्थिता पृथ्व्या न ज्ञाता पृथिवीञ्च या।<br>अन्तःस्थिता यमयति वन्दे तामीश्वरीं पराम्॥ २५पृथ्वीके भीतर स्थित रहकर जो पृथ्वीको नियन्त्रित करती हैं, किंतु पृथ्वी जिन्हें नहीं जान पातीं, उन परा परमेश्वरीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ २५॥
मायायां या स्थिता ज्ञाता मायया न च तामजाम्।<br>अन्तःस्थिता प्रेरयति प्रेरयित्रीं नुमः शिवाम्॥ २६जो मायाके अन्दर स्थित रहनेपर भी मायाके द्वारा नहीं जानी जा सकीं तथा जो मायाके अन्दर विराजमान रहकर उसे प्रेरणा प्रदान करती हैं, उन जन्मरहित तथा प्रेरणा प्रदान करनेवाली भगवती शिवाको हम नमस्कार करते हैं॥ २६॥
कल्याणं कुरु भो मातस्त्राहि नः शत्रुतापितान्।<br>जहि पापं हयारिं त्वं तेजसा स्वेन मोहितम्॥ २७<br>खलं मायाविनं घोरं स्त्रीवध्यं वरदर्पितम्।<br>दुःखदं सर्वदेवानां नानारूपधरं शठम्॥ २८हे माता! आप हमारा कल्याण करें और शत्रुओंसे संत्रस्त हम देवताओंकी रक्षा करें। आप अपने तेजसे इस मोहग्रस्त पापी महिषासुरका वध कर डालें। यह महिषासुर दुष्ट, घोर मायावी, केवल स्त्रीके द्वारा मारा जा सकनेवाला, वरदान प्राप्त करनेसे अभिमानी, समस्त देवताओंको दुःख देनेवाला तथा अनेक रूप धारण करनेवाला महादुष्ट है॥ २७-२८॥
त्वमेका सर्वदेवानां शरणं भक्तवत्सले।<br>पीडितान्दानवेनाद्य त्राहि देवि नमोऽस्तु ते॥ २९हे भक्तवत्सले! एकमात्र आप ही सभी देवताओंकी शरण हैं; दानव महिषासुरसे पीड़ित हम देवताओंकी आप रक्षा कीजिये। हे देवि! आपको नमस्कार है॥ २९॥
व्यास उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी सुरैः सर्वसुखप्रदा।<br>नानुवाच महादेवी स्मितपूर्वं शुभं वचः॥ ३०व्यासजी बोले— इस प्रकार सब देवताओंके स्तुति करनेपर समस्त सुख प्रदान करनेवाली महादेवी मुसकराकर उन देवताओंसे यह मंगलमय वचन कहने लगीं॥ ३०॥
देव्युवाच<br>भयं त्यजन्तु गीर्वाणा महिषान्मन्दचेतसः।<br>हनिष्यामि रणेऽद्यैव वरदृप्तं विमोहितम्॥ ३१देवी बोलीं— हे देवतागण! आपलोग मन्दबुद्धि महिषासुरका भय त्याग दें। मैं वर पानेके कारण अभिमानमें चूर तथा मोहग्रस्त उस महिषासुरको आज ही रणमें मार डालूँगी॥ ३१॥
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