देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 585, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
|---|
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा सा सुरान्देवी जहासातीव सुस्वरम्।<br>चित्रमेतच्च संसारे भ्रममोहयुतं जगत्॥ ३२<br>ब्रह्मविष्णुमहेशाद्याः सेन्द्राश्चान्ये सुरास्तथा।<br>कम्पयुक्ता भयत्रस्ता वर्तन्ते महिषात्किल॥ ३३ | व्यासजी बोले—देवताओंसे ऐसा कहकर वे भगवती अत्यन्त उच्च स्वरमें हँस पड़ीं। [वे बोलीं—] इस संसारमें यह बड़ी विचित्र बात है कि यह सारा जगत् ही भ्रम तथा मोहसे ग्रसित है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि तथा अन्य देवता भी महिषासुरसे भयभीत होकर काँपने लगते हैं॥ ३२-३३॥ | | अहो दैवबलं घोरं दुर्जयं सुरसत्तमाः।<br>कालः कर्तास्ति दुःखानां सुखानां प्रभुरीश्वरः॥ ३४<br>सृष्टिपालनसंहारे समर्था अपि ते यदा।<br>मुह्यन्ति क्लेशसन्तप्ता महिषेण प्रपीडिताः॥ ३५ | हे श्रेष्ठ देवताओ! दैवबल बड़ा ही भयानक और दुर्जय है। काल ही सुख और दुःखका कर्ता है। यही सबका प्रभु तथा ईश्वर है। सृष्टि, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ रहते हुए भी वे ब्रह्मा आदि मोह-ग्रस्त हो जाते हैं, कष्ट भोगते हैं और महिषासुरके द्वारा सताये जाते हैं॥ ३४-३५॥ | | इति कृत्वा स्मितं देवी साट्टहासं चकार ह।<br>उच्चैः शब्दं महाघोरं दानवानां भयप्रदम्॥ ३६ | मुसकराकर ऐसा कहनेके पश्चात् देवी अट्टहास करने लगीं। उस अट्टहासका महाभयानक गर्जन दानवोंको भयभीत कर देनेवाला था॥ ३६॥ | | चकम्पे वसुधा तत्र श्रुत्वा तच्छब्दमद्भुतम्।<br>चेलुश्च पर्वताः सर्वे चुक्षोभाब्धिश्च वीर्यवान्॥ ३७<br>मेरुश्चचाल शब्देन दिशः सर्वाः प्रपूरिताः।<br>भयं जग्मुस्तदा श्रुत्वा दानवास्तत्स्वनं महत्॥ ३८<br>जय पाहीति देवास्तामूचुः परमहर्षिताः। | उस अद्भुत शब्दको सुनकर पृथ्वी काँपने लगी, सभी पर्वत चलायमान हो उठे और अगाध महासमुद्रमें विक्षोभ उत्पन्न होने लगा। उस शब्दसे सुमेरुपर्वत हिलने लगा और सभी दिशाएँ गूँज उठीं। उस तीव्र ध्वनिको सुनकर सभी दानव भयभीत हो गये। सभी देवता परम प्रसन्न होकर 'आपकी जय हो', 'हमारी रक्षा करो'—ऐसा उन देवीसे कहने लगे॥ ३७-३८ १/२॥ | | महिषोऽपि स्वनं श्रुत्वा चुकोप मदगर्वितः॥ ३९<br>किमेतदिति तान्दैत्यानपृच्छ स्वनशङ्कितः।<br>गच्छन्तु त्वरिता दूता ज्ञातुं शब्दसमुद्भवम्॥ ४०<br>कृतः केनायमत्युग्रः शब्दः कर्णव्यथाकरः।<br>देवो वा दानवो वापि यो भवेत्स्वनकारकः॥ ४१<br>गृहीत्वा तं दुरात्मानं मत्समीपं नयन्त्विह।<br>हनिष्यामि दुराचारं गर्जन्तं स्मयदुर्मदम्॥ ४२<br>क्षीणायुष्यं मन्दमतिं नयामि यमसादनम्।<br>पराजिताः सुराः कामं न गर्जन्ति भयातुराः॥ ४३<br>नासुरा मम वश्यास्ते कस्येदं मूढचेष्टितम्।<br>त्वरिता मामुपायान्तु ज्ञात्वा शब्दस्य कारणम्॥ ४४ | अभिमानमें चूर महिषासुर भी वह ध्वनि सुनकर क्रुद्ध हो उठा। उस ध्वनिसे सशंकित महिषासुरने दैत्योंसे पूछा—यह कैसी ध्वनि है? इस ध्वनिके उद्गम-स्थलको जाननेके लिये दूतगण तत्काल यहाँसे जायें। कानोंको पीड़ा पहुँचानेवाला यह अति भीषण शब्द किसने किया है? देवता या दानव जो कोई भी इस ध्वनिको उत्पन्न करनेवाला हो, उस दुष्टात्माको पकड़कर मेरे पास ले आयें। ऐसा गर्जन करनेवाले उस अभिमानके मदमें उन्मत्त दुराचारीको मैं मार डालूँगा। मैं क्षीण-आयु तथा मन्दबुद्धिवाले उस दुष्टको अभी यमपुरी पहुँचा दूँगा। देवता मुझसे पराजित होकर भयभीत हो गये हैं, अतः वे ऐसा गर्जन कर ही नहीं सकते। दानव भी ऐसा नहीं कर सकते; क्योंकि वे सब तो मेरे अधीन हैं, तो फिर यह |