देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ५७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्वत्रिशूलात्समुत्पाद्य शङ्करः शूलमुत्तमम्।<br>ददौ देव्यै सुरारीणां कृन्तनं भयनाशनम्॥ ११ | शंकरजीने अपने त्रिशूलसे उत्पन्न करके भगवतीको एक ऐसा उत्तम त्रिशूल अर्पण किया, जो दानवोंको काट डालनेकी शक्तिसे सम्पन्न तथा देवताओंके भयका नाश करनेवाला था॥ ११॥ |
| वरुणश्च प्रसन्नात्मा ददौ शङ्खं समुज्ज्वलम्।<br>घोषवन्तं स्वशङ्खात्तु समुत्पाद्य सुमङ्गलम्॥ १२ | वरुणदेवने अपने शंखसे उत्पन्न करके प्रसन्नचित्त होकर देवीजीको एक ऐसा शंख प्रदान किया; जो मंगलमय, अत्यन्त उज्ज्वल तथा तीव्र ध्वनि करनेवाला था॥ १२॥ |
| हुताशनस्तथा शक्तिं शतघ्नीं सुमनोजवाम्।<br>प्रायच्छत्तु प्रसन्नात्मा तस्यै दैत्यविनाशिनीम्॥ १३ | अग्निदेवने प्रसन्नचित्त होकर सैकड़ों शत्रुओंका संहार करनेवाली, मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाली तथा दैत्योंका विनाश करनेवाली एक शक्ति उन्हें प्रदान की॥ १३॥ |
| इषुधिं बाणपूर्णञ्च चापं चाद्भुतदर्शनम्।<br>मारुतो दत्तवांस्तस्यै दुराकर्षं खरस्वरम्॥ १४ | पवनदेवने उन भगवती महालक्ष्मीको बाणोंसे भरा हुआ एक तरकस तथा देखनेमें अत्यन्त अद्भुत, कठिनाईसे खींचा जा सकनेवाला और कर्कश टंकार करनेवाला धनुष प्रदान किया॥ १४॥ |
| स्ववज्राद्वज्रमुत्पाद्य ददाविन्द्रोऽतिदारुणम्।<br>घण्टामैरावतात्तूर्णं सुशब्दां चातिसुन्दराम्॥ १५ | देवराज इन्द्रने अपने वज्रसे उत्पन्न करके एक अत्यन्त भयंकर वज्र तथा ऐरावत हाथीसे उतारकर एक परम सुन्दर तथा तीव्र ध्वनि करनेवाला घण्टा तुरंत भगवतीको अर्पण किया॥ १५॥ |
| ददौ दण्डं यमः कामं कालदण्डसमुद्भवम्।<br>येनान्तं सर्वभूतानामकरोत्काल आगते॥ १६ | यमराजने अपने कालदण्डसे आविर्भूत एक ऐसा दण्ड भगवतीको प्रदान किया, जिससे वे समय आनेपर सभी प्राणियोंका अन्त करते थे॥ १६॥ |
| ब्रह्मा कमण्डलुं दिव्यं गङ्गावारिप्रपूरितम्।<br>ददावस्यै मुदा युक्तो वरुणः पाशमेव च॥ १७ | ब्रह्माजीने गंगाजलसे परिपूर्ण दिव्य कमण्डलु और वरुणदेवने अपना पाश उन्हें प्रसन्नतापूर्वक प्रदान किया॥ १७॥ |
| कालः खड्गं तथा चर्म प्रायच्छत्तु नराधिप।<br>परशुं विश्वकर्मा च तीक्ष्णमस्यै ददावथ॥ १८ | हे राजन्! कालने महालक्ष्मीको खड्ग तथा ढाल दिये और विश्वकर्माने उन्हें तीक्ष्ण परशु अर्पण किया॥ १८॥ |
| धनदस्तु सुरापूर्णं पानपात्रं सुवर्णजम्।<br>पङ्कजं वरुणश्चादाद्देव्यै दिव्यं मनोहरम्॥ १९ | कुबेरने भगवतीको एक सुवर्णमय पानपात्र तथा वरुणने उन्हें दिव्य तथा मनोहर कमल-पुष्प प्रदान किया॥ १९॥ |
| गदां कौमोदकीं त्वष्टा घण्टाशतनिनादिनीम्।<br>अदात्तस्यै प्रसन्नात्मा सुरशत्रुविनाशिनीम्॥ २०<br><br>अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यञ्च दंशनम्।<br>ददौ त्वष्टा जगन्मात्रे निजरश्मीन्दिवाकरः॥ २१ | प्रसन्न मनवाले त्वष्टाने सैकड़ों घण्टोंके समान ध्वनि करनेवाली और दानवोंका विनाश कर डालनेवाली कौमोदकी नामक गदा उन्हें प्रदान की। साथ ही उन त्वष्टाने जगज्जननी भगवती महालक्ष्मीको अनेक प्रकारके अस्त्र तथा अभेद्य कवच प्रदान किये और सूर्यदेवने उन्हें अपनी किरणें प्रदान कीं॥ २०-२१॥ |