देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० ९] पञ्चम स्कन्ध ५७३
अथ नवमोऽध्यायः
देवताओंद्वारा भगवतीको आयुध और आभूषण समर्पित करना तथा उनकी स्तुति करना, देवीका प्रचण्ड अट्टहास करना, जिसे सुनकर महिषासुरका उद्विग्न होकर अपने प्रधान अमात्यको देवीके पास भेजना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>देवा विष्णुवचः श्रुत्वा सर्वे प्रमुदितास्तदा।<br>ददुश्च भूषणान्याशु वस्त्राणि स्वायुधानि च॥ १ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] तब भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर सभी देवता बहुत प्रसन्न हुए। वे तुरंत महालक्ष्मीको वस्त्र, आभूषण और अपने-अपने आयुध प्रदान करने लगे॥ १॥ |
| क्षीरोदश्चाम्बरे दिव्ये रक्ते सूक्ष्मे तथाजरे।<br>निर्मलञ्च तथा हारं प्रीतस्तस्यै सुमण्डितम्॥ २<br><br>ददौ चूडामणिं दिव्यं सूर्यकोटिसमप्रभम्।<br>कुण्डले च तथा शुभ्रे कटकानि भुजेषु वै॥ ३<br><br>केयूरान्कङ्कणान्दिव्यान्नानारत्नविराजितान् ।<br>ददौ तस्यै विश्वकर्मा प्रसन्नेन्द्रियमानसः॥ ४<br><br>नूपुरौ सुस्वरौ कान्तौ निर्मलौ रत्नभूषितौ।<br>ददौ सूर्यप्रतीकाशौ त्वष्टा तस्यै सुपादयोः॥ ५ | क्षीरसागरने देवीको दिव्य, रक्तवर्णवाले, महीन तथा कभी भी जीर्ण न होनेवाले दो वस्त्र; निर्मल तथा मनोहर हार; करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान दिव्य चूडामणि; दो सुन्दर कुण्डल तथा कड़े प्रसन्नतापूर्वक दिये। विश्वकर्माने भुजाओंपर धारण करनेके लिये बाजूबन्द और अनेक प्रकारके रत्नजटित दिव्य कंकण प्रसन्नचित्त होकर उन्हें प्रदान किये। साथ ही त्वष्टाने मधुर ध्वनिवाले, चमकीले, स्वच्छ, रत्नजटित और सूर्यके समान प्रकाशमान दो नूपुर पैरोंमें पहननेके लिये उन्हें प्रदान किये॥ २–५॥ |
| तथा ग्रैवेयकं रम्यं ददौ तस्यै महार्णवः।<br>अङ्गुलीयरत्नानि तेजोवन्ति च सर्वशः॥ ६ | महासमुद्रने उन्हें गलेमें धारण करनेके लिये मनोहर कण्ठहार और रत्नोंसे निर्मित तेजोमय अँगूठियाँ प्रदान कीं॥ ६॥ |
| अम्लानपङ्कजां मालां गन्धाढ्यां भ्रमरानुगाम्।<br>तथैव वैजयन्तीञ्च वरुणः सम्प्रयच्छत॥ ७ | वरुणदेवने कभी न मुरझानेवाले कमलोंकी माला, जो सुगन्धसे परिपूर्ण थी तथा जिसपर भौंरे मँडरा रहे थे और वैजयन्ती नामक माला भगवतीको प्रदान की॥ ७॥ |
| हिमवानथ सन्तुष्टो रत्नानि विविधानि च।<br>ददौ च वाहनं सिंहं कनकाभं मनोहरम्॥ ८ | हिमवान्ने प्रसन्न होकर उन्हें नाना प्रकारके रत्न तथा सुवर्णके समान चमकीले वर्णवाला एक मनोहर सिंह वाहनके रूपमें प्रदान किया॥ ८॥ |
| भूषणैर्भूषिता दिव्यैः सा रराज वरा शुभा।<br>सिंहारूढा वरारोहा सर्वलक्षणसंयुता॥ ९ | सभी लक्षणोंसे सम्पन्न तथा सुन्दर रूपवाली वे कल्याणमयी श्रेष्ठ भगवती दिव्य आभूषणोंसे विभूषित होकर सिंहपर आरूढ़ होकर अत्यन्त सुशोभित हो रही थीं॥ ९॥ |
| विष्णुश्चक्रात्समुत्पाद्य ददावस्यै रथाङ्गकम्।<br>सहस्रारं सुदीप्तञ्च देवारिशिरसां हरम्॥ १० | तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने अपने चक्रसे उत्पन्न करके सहस्र अरोंवाला, तेजसम्पन्न और दैत्योंका सिर काट लेनेकी सामर्थ्यवाला एक चक्र उन्हें प्रदान किया॥ १०॥ |