भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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५७२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ८

| नयनत्रितयं तस्या जज्ञे पावकतेजसा।<br>कृष्णं रक्तं तथा श्वेतं वर्णत्रयविभूषितम्॥ ६४ | अग्निके तेजसे उन भगवतीके तीनों नेत्र बने। तीन प्रकारके वर्णोंसे सुशोभित वे नेत्र काले, लाल तथा श्वेत थे॥ ६४॥ | | वक्रे स्निग्धे कृष्णवर्णे सन्ध्ययोस्तेजसा भ्रुवौ।<br>जाते देव्याः सुतेजस्के कामस्य धनुषीव ते॥ ६५ | उनकी भौंहें दोनों सन्ध्याओंके तेजसे बनीं। वे टेढ़ी, चिकनी, काले रंगकी, अत्यन्त तेजोमय तथा कामदेवके धनुषकी भाँति प्रतीत हो रही थीं॥ ६५॥ | | वायोश्च तेजसा शस्तौ श्रवणौ सम्बभूवतुः।<br>नातिदीर्घौ नातिह्रस्वौ दोलाविव मनोभुवः॥ ६६<br>तिलपुष्पसमाकारा नासिका सुमनोहरा।<br>सञ्जाता स्निग्धवर्णा वै धनदस्य च तेजसा॥ ६७ | उनके दोनों उत्तम कान वायुके तेजसे बने, जो न बहुत बड़े तथा न बहुत छोटे थे। वे कामदेवके झूलेके सदृश प्रतीत हो रहे थे। तिलके फूलके समान आकृतिवाली, अत्यन्त मनोहर और स्निग्ध नाक कुबेरके तेजसे उत्पन्न हुई॥ ६६-६७॥ | | दन्ताः शिखरिणः श्लक्ष्णाः कुन्दाग्रसदृशाः समाः।<br>सञ्जाताः सुप्रभा राजन् प्राजापत्येन तेजसा॥ ६८ | हे राजन्! उन देवीके नुकीले, चिकने, चमकीले, कुन्दके अग्रभागके सदृश तथा समान दाँत प्रजापतिके तेजसे उत्पन्न हुए॥ ६८॥ | | अधरश्चातिरक्तोऽस्याः सञ्जातोऽरुणतेजसा।<br>उत्तरोष्ठस्तथा रम्यः कार्तिकेयस्य तेजसा॥ ६९ | उनका रक्तवर्ण अधरोष्ठ अरुणके तेजसे उत्पन्न हुआ तथा ऊपरका अत्यन्त मनोहर उत्तरोष्ठ (ऊपरका ओष्ठ) कार्तिकेयके तेजसे उत्पन्न हुआ॥ ६९॥ | | अष्टादशभुजाकारा बाहवो विष्णुतेजसा।<br>वसूनां तेजसाङ्गुल्यो रक्तवर्णास्तथाभवन्॥ ७०<br>सौम्येन तेजसा जातं स्तनयोर्युग्ममुत्तमम्।<br>ऐन्द्रेणास्यास्तथा मध्यं जातं त्रिवलिसंयुतम्॥ ७१<br>जङ्घोरू वरुणस्याथ तेजसा सम्बभूवतुः।<br>नितम्बः स तु सञ्जातो विपुलस्तेजसा भुवः॥ ७२ | उन देवीकी अठारह भुजाएँ विष्णुके तेजसे प्रकट हुईं तथा उनकी रक्तवर्णकी अँगुलियाँ वसुओंके तेजसे उत्पन्न हुईं। उनके दोनों उत्तम स्तन चन्द्रमाके तेजसे आविर्भूत हुए तथा तीन रेखाओंसे युक्त उनका मध्यभाग इन्द्रके तेजसे उत्पन्न हुआ। उनकी जाँघें तथा ऊरु-प्रदेश वरुणके तेजसे उत्पन्न हुए तथा उनका विशाल नितम्ब पृथ्वीके तेजसे उत्पन्न हुआ॥ ७०–७२॥ | | एवं नारी शुभाकारा सुरूपा सुस्वरा भृशम्।<br>समुत्पन्ना तथा राजंस्तेजोराशिसमुद्भवा॥ ७३ | हे राजन्! इस प्रकार उस तेजोराशिसे सुन्दर आकारवाली, दिव्य रूपसे सम्पन्न तथा मधुर स्वरवाली भगवती नारी-रूपमें प्रकट हुईं॥ ७३॥ | | तां दृष्ट्वा सुष्ठुसर्वाङ्गीं सुदतीं चारुलोचनाम्।<br>मुदं प्रापुः सुराः सर्वे महिषेण प्रपीडिताः॥ ७४ | मनोहर अंग-प्रत्यंगवाली, सुन्दर दाँतोंवाली तथा भव्य नेत्रोंवाली उन देवीको देखकर महिषासुरसे पीड़ित समस्त देवता अत्यन्त आनन्दित हो उठे॥ ७४॥ | | विष्णुस्त्वाह सुरान्सर्वान्भूषणान्यायुधानि च।<br>प्रयच्छन्तु शुभान्यस्यै देवाः सर्वाणि साम्प्रतम्॥ ७५<br>स्वायुधेभ्यः समुत्पाद्य तेजोयुक्तानि सत्वराः।<br>समर्पयन्तु सर्वेऽद्य देव्यै नानायुधानि वै॥ ७६ | उसी समय भगवान् विष्णुने सभी देवताओंसे कहा—हे देवताओ! अब आपलोग अपने-अपने सभी शुभ भूषण एवं आयुध इन देवीको प्रदान करें। अपने-अपने आयुधोंसे नानाविध तेजस्वी शस्त्रास्त्र उत्पन्न करके सभी लोग शीघ्र ही देवीको अर्पित कर दें॥ ७५–७६॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
देव्याः स्वरूपोद्भववर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥