भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 657

६४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २२

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नमो देवि विश्वेश्वरि प्राणनाथे<br>सदानन्दरूपे सुरानन्ददे ते।<br>नमो दानवान्तप्रदे मानवाना-<br>मनेकार्थदे भक्तिगम्यस्वरूपे ॥ २५हे विश्वेश्वरि! हे प्राणोंकी स्वामिनि! सदा आनन्दरूपमें रहनेवाली तथा देवताओंको आनन्द प्रदान करनेवाली हे देवि! आपको नमस्कार है। दानवोंका अन्त करनेवाली, मनुष्योंकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करनेवाली तथा भक्तिके द्वारा अपने रूपका दर्शन देनेवाली हे देवि! आपको नमस्कार है॥ २५॥
न ते नामसंख्यां न ते रूपमीदृ-<br>क्तथा कोऽपि वेदादिदेवस्वरूपे।<br>त्वमेवासि सर्वेषु शक्तिस्वरूपा<br>प्रजासृष्टिसंहारकाले सदैव ॥ २६हे आदिदेवस्वरूपिणि! आपके नामोंकी निश्चित संख्या तथा आपके इस रूपको कोई भी नहीं जान सकता। सबमें आप ही विराजमान हैं। जीवोंके सृजन और संहारकालमें शक्तिस्वरूपसे सदा आप ही कार्य करती हैं॥ २६॥
स्मृतिस्त्वं धृतिस्त्वं त्वमेवासि बुद्धि-<br>र्जरा पुष्टितुष्टी धृतिः कान्तिशान्ती।<br>सुविद्या सुलक्ष्मीर्गतिः कीर्तिमेधे<br>त्वमेवासि विश्वस्य बीजं पुराणम् ॥ २७आप ही स्मृति, धृति, बुद्धि, जरा, पुष्टि, तुष्टि, धृति, कान्ति, शान्ति, सुविद्या, सुलक्ष्मी, गति, कीर्ति, मेधा और विश्वकी पुरातन मूल प्रकृति हैं॥ २७॥
यदा यैः स्वरूपैः करोषीह कार्यं<br>सुराणां च तेभ्यो नमामोऽद्य शान्त्यै।<br>क्षमा योगनिद्रा दया त्वं विवक्षा<br>स्थिता सर्वभूतेषु शस्तैः स्वरूपैः ॥ २८आप जिस समय जिन स्वरूपोंसे देवताओंका कार्य सम्पन्न करती हैं, हम शान्तिके लिये आपके उन स्वरूपोंको नमस्कार करते हैं। आप ही क्षमा, योगनिद्रा, दया तथा विवक्षा—इन कल्याणकारी रूपोंसे सभी जीवोंमें निवास करती हैं॥ २८॥
कृतं कार्यमादौ त्वया यत्सुराणां<br>हतोऽसौ महारिर्मदान्धो हयारिः।<br>दया ते सदा सर्वदेवेषु देवि<br>प्रसिद्धा पुराणेषु वेदेषु गीता॥ २९पूर्वकालमें आपने हम देवताओंका कार्य किया था जो कि महान् शत्रु मदान्ध महिषासुरका वध कर डाला था। हे देवि! सभी देवताओंपर आपकी दया सदैव रहती है, आपकी दया पूर्ण प्रसिद्ध है और पुराणों तथा वेदोंमें भी उसका वर्णन किया गया है॥ २९॥
किमत्रास्ति चित्रं यदम्बा सुतं स्वं<br>मुदा पालयेत्पोषयेत्सम्यगेव।<br>यतस्त्वं जनित्री सुराणां सहाया<br>कुरुष्वैकचित्तेन कार्यं समग्रम् ॥ ३०इसमें आश्चर्यकी क्या बात; क्योंकि माता प्रसन्नतापूर्वक सम्यक् प्रकारसे अपने पुत्रका पालन-पोषण करती ही है। क्योंकि आप देवताओंकी जननी हैं, अतः उनका सहायक बनकर एकाग्र मनसे हमलोगोंका सम्पूर्ण कार्य सम्पन्न करें॥ ३०॥
न वा ते गुणानामियत्तां स्वरूपं<br>वयं देवि जानीमहे विश्ववन्द्ये।<br>कृपापात्रमित्येव मत्वा तथास्मा-<br>न्भयेभ्यः सदा पाहि पातुं समर्थे॥ ३१हे देवि! हे विश्ववन्द्ये! हमलोग न आपके गुणोंकी सीमा जानते हैं और न आपका स्वरूप ही जानते हैं। अतः रक्षा करनेमें समर्थ हे देवि! हमें केवल अपना कृपापात्र मानकर आप भयोंसे निरन्तर हमारी रक्षा करती रहें॥ ३१॥