भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 658, कुल 889 में से

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पृष्ठ 658
अ० २२ ]पञ्चम स्कन्ध६४९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विना बाणपातैर्विना मुष्टिघातै-<br>र्विना शूलखड्गैर्विना शक्तिदण्डैः ।<br>रिपूहन्तुमेवासि शक्ता विनोदा-<br>त्तथापीह लोकोपकाराय लीला ॥ ३२यद्यपि बिना बाण चलाये; बिना मुष्टिप्रहार किये और बिना त्रिशूल, तलवार, बर्छी, दण्ड आदिका प्रयोग किये भी आप विनोदपूर्वक शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हैं, फिर भी जगत्के उपकारके लिये ही आपकी यह लीला दृष्टिगोचर होती है ॥ ३२ ॥
इदं शाश्वतं नैव जानन्ति मूढा<br>न कार्यं विना कारणं सम्भवेद्वा ।<br>वयं तर्कयामोऽनुमानं प्रमाणं<br>त्वमेवासि कर्तास्य विश्वस्य चेति ॥ ३३आपका यह रूप सनातन है—इस रहस्यको अविवेकी लोग नहीं जानते हैं। [हे माता!] बिना कारणके कोई कार्य नहीं होता। अतः अनुमान और प्रमाणके आधारपर हम यही जानते हैं कि इस विश्वकी रचना करनेवाली आप ही हैं ॥ ३३ ॥
अजः सृष्टिकर्ता मुकुन्दोऽवितायं<br>हरो नाशकद्वै पुराणे प्रसिद्धः ।<br>न किं त्वत्प्रसूतास्त्रयस्ते युगादौ<br>त्वमेवासि सर्वस्य तेनैव माता ॥ ३४ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु पालनकर्ता और शंकर संहारकर्ताके रूपमें पुराणमें प्रसिद्ध हैं, किंतु क्या वे तीनों देव आपसे उत्पन्न नहीं हुए हैं? युगके प्रारम्भमें केवल आप ही रहती हैं, अतः आप ही सबकी माता हैं ॥ ३४ ॥
त्रिभिस्त्वं पुराराधिता देवि दत्ता<br>त्वया शक्तिरुग्रा च तेभ्यः समग्रा ।<br>त्वया संयुतास्ते प्रकुर्वन्ति कामं<br>जगत्पालनोत्पत्तिसंहारमेव ॥ ३५हे देवि! पूर्वकालमें इन तीनोंने आपकी आराधना की थी, तब आपने उन्हें अपनी समस्त प्रबल शक्ति प्रदान की थी। वास्तवमें उसी शक्तिसे सम्पन्न होकर वे जगत्का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं ॥ ३५ ॥
ते किं न मन्दमतयो यतयो विमूढा-<br>स्त्वां ये न विश्वजननीं समुपाश्रयन्ति ।<br>विद्यां परां सकलकामफलप्रदां तां<br>मुक्तिप्रदां विबुधवृन्दसुवन्दिताङ्घ्रिम् ॥ ३६जो संन्यासी लोग विश्वकी जननी, परम विद्या-स्वरूपिणी, समस्त वांछित फल प्रदान करनेवाली, मुक्तिदायिनी तथा सभी देवताओंसे वन्दित चरणोंवाली आप भगवतीकी उपासना नहीं करते, क्या वे मन्दबुद्धि तथा अज्ञानी नहीं हैं? ॥ ३६ ॥
ये वैष्णवाः पाशुपताश्च सौरा<br>दम्भास्त एव प्रतिभान्ति नूनम् ।<br>ध्यायन्ति न त्वां कमलाञ्च लज्जां<br>कान्तिं स्थितिं कीर्तिमथापि पुष्टिम् ॥ ३७विष्णु, शिव तथा सूर्यकी आराधना करनेवाले जो लोग कमला, लज्जा, कान्ति, स्थिति, कीर्ति और पुष्टि नामोंसे विख्यात आप भगवतीका ध्यान नहीं करते हैं, वे निश्चितरूपसे दम्भी प्रतीत होते हैं ॥ ३७ ॥
हरिहरादिभिरप्यथ सेविता<br>त्वमिह देववरैरसुरैस्तथा ।<br>भुवि भजन्ति न येऽल्पधियो नरा<br>जननि ते विधिना खलु वञ्चिताः ॥ ३८विष्णु और शंकर आदि श्रेष्ठ देवता तथा असुर भी आपकी पूजा करते हैं। अतः हे माता! इस जगत्में जो मन्दबुद्धि मनुष्य आपकी आराधना नहीं करते, निश्चय ही विधाताने उन्हें ठग लिया है ॥ ३८ ॥
जलधिजापदपङ्कजरञ्जनं<br>जतुरसेन करोति हरिः स्वयं ।<br>त्रिनयनोऽपि धराधरजाङ्घ्रिपं-<br>कजपरागनिषेवणतत्परः ॥ ३९भगवान् विष्णु अपने पास लक्ष्मीरूपमें विराजमान आप भगवतीके चरणकमलोंमें स्वयं महावर लगाते हैं। इसी प्रकार त्रिनेत्र भगवान् शिव भी अपने पास पार्वती-रूपमें विराजमान आप भगवतीके चरणकमलकी रजके सेवनमें निरन्तर तत्पर रहते हैं; तब अन्य