देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 668, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 668
अ० २४] पञ्चम स्कन्ध ६५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| देव्युवाच<br>सत्यं दूत महाभाग प्रवक्तुं निपुणो ह्यसि॥ १२<br><br>निशुम्भशुम्भौ जानामि बलवन्ताविति ध्रुवम्।<br>प्रतिज्ञा मे कृता बाल्यादन्यथा सा कथं भवेत्॥ १३<br><br>तस्माद् ब्रूहि निशुम्भञ्च शुम्भं वा बलवत्तरम्।<br>विना युद्धं न मे भर्ता भविता कोऽपि सौष्ठवात्॥ १४<br><br>जित्वा मां तरसा कामं करं गृह्णातु साम्प्रतम्।<br>युद्धेच्छया समायातां विद्धि मामबलां नृप॥ १५<br><br>युद्धं देहि समर्थोऽसि वीरधर्मं समाचर।<br>बिभेषि मम शूलाच्चेत्पातालं गच्छ मा चिरम्॥ १६<br><br>त्रिदिवं च धरां त्यक्त्वा जीवितेच्छा यदस्ति ते।<br>इति दूत वदाशु त्वं गत्वा स्वपतिमादरात्॥ १७<br><br>स विचार्य यथायुक्तं करिष्यति महाबलः।<br>संसारे दूतधर्मोऽयं यत्सत्यं भाषणं किल॥ १८<br><br>शत्रौ पत्यौ च धर्मज्ञ तथा त्वं कुरु मा चिरम्। | देवी बोलीं—हे महाभाग दूत! तुम बात करनेमें निपुण हो; यह सत्य है। शुम्भ और निशुम्भ निश्चय ही बलवान् हैं—यह मैं जानती हूँ। किंतु मैंने बाल्यकालसे ही जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे मिथ्या कैसे किया जाय? अतः तुम निशुम्भसे अथवा उससे भी बलवान् शुम्भसे कह दो कि बिना युद्ध किये मात्र सौन्दर्यके बलपर कोई भी मेरा पति नहीं बन सकेगा। मुझे अपने बलसे जीतकर वह अभी पाणिग्रहण कर ले। हे राजन्! आप यह जान लीजिये कि मैं अबला होती हुई भी युद्धकी इच्छासे यहाँ आयी हूँ। यदि तुम समर्थ हो तो मेरे साथ युद्ध करो और वीरधर्मका पालन करो। इसके अतिरिक्त यदि मेरे त्रिशूलसे डरते हो और यदि जीनेकी तुम्हारी अभिलाषा है तो स्वर्ग और पृथ्वीलोकको छोड़कर अविलम्ब पाताललोक चले जाओ। हे दूत! अभी जाकर अपने स्वामीसे आदरपूर्वक ये बातें कह दो। इसके बाद वे महाबली शुम्भ विचार करके जो उचित होगा, उसे करेंगे। संसारमें यही दूतधर्म है कि जो सच्ची बात हो, उसे वैसा-का-वैसा शत्रु और स्वामी—दोनोंके प्रति अवश्य कह दे। हे धर्मज्ञ! तुम भी वैसा ही व्यवहार करो; विलम्ब मत करो॥ १२—१८ ½ ॥ |
| व्यास उवाच<br>अथ तद्वचनं श्रुत्वा नीतिमद् बलसंयुतम्॥ १९<br><br>हेतुयुक्तं प्रगल्भञ्च विस्मितः प्रययौ तदा।<br>गत्वा दैत्यपतिं दूतो विचार्य च पुनः पुनः॥ २०<br><br>प्रणम्य पादयोः प्रह्वः प्रत्युवाच नृपञ्च तम्।<br>राजनीतिकरं वाक्यं मृदुपूर्वं प्रियं वचः॥ २१ | व्यासजी बोले—उस समय भगवती जगदम्बाके नीतियुक्त, शक्तिसम्पन्न, हेतुपूर्ण और ओजस्वी वचन सुनकर वह दूत आश्चर्यचकित हो गया और वहाँसे लौट गया। दैत्यपति शुम्भके पास पहुँचकर बार-बार विचार करके वह दूत विनम्र भावसे अपने राजाको प्रणाम करके उनसे नीतिपूर्ण, मधुरतासे युक्त तथा मनोहर बात कहने लगा॥ १९—२१॥ |
| दूत उवाच<br>सत्यं प्रियं च वक्तव्यं तेन चिन्तापरो ह्यहम्।<br>सत्यं प्रियं च राजेन्द्र वचनं दुर्लभं किल॥ २२<br><br>अप्रियं वदतां कामं राजा कुप्यति सर्वथा।<br>साक्षात्कृतः समायाता कस्य वा किंबलाबला॥ २३ | दूत बोला—हे राजेन्द्र! सत्य और प्रिय बात कहनी चाहिये, इसीलिये मैं अत्यन्त चिन्तामें पड़ा हुआ हूँ; क्योंकि जो सत्य हो और प्रिय भी हो, वैसा वचन निश्चय ही दुर्लभ है। अप्रिय बोलनेवाले दूतोंपर राजा सर्वथा कुपित हो सकते हैं, [तथापि अपना धर्मपालन करते हुए मैं सच्ची बात कह रहा हूँ] वह स्त्री कहाँसे आयी है, किसकी पुत्री है और कितनी |