भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| ६६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २४ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
न ज्ञानगोचरं किञ्चित्किं ब्रवीमि विचेष्टितम्।<br>युद्धकामा मया दृष्टा गर्विता कटुभाषिणी॥ २४<br><br>तया यत्कथितं सम्यक् तच्छृणुष्व महामते।<br>मया बाल्यात्प्रतिज्ञेयं कृता पूर्वं विनोदतः॥ २५<br><br>सखीनां पुरतः कामं विवाहं प्रति सर्वथा।<br>यो मां युद्धे जयेद्बद्धा दर्पञ्च विधुनोति वै॥ २६<br><br>तं वरिष्याम्यहं कामं पतिं समबलं किल।<br>न मे प्रतिज्ञा मिथ्या सा कर्तव्या नृपसत्तम॥ २७सबल अथवा निर्बल है—इनमेंसे कुछ भी मैं नहीं जान सका, तब मैं उसके मनकी बात क्या बताऊँ! मुझे तो वह घमण्डी, कटु बोलनेवाली और सदा युद्धके लिये उत्सुक दिखायी पड़ती थी॥ २२—२४॥<br><br>हे महामते! उस स्त्रीने जो कुछ कहा है, उसे आप भलीभाँति सुनें—'मैंने पहले ही बाल्यावस्थामें सखियोंके समक्ष विनोदवश विवाहके विषयमें यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि जो युद्धमें मुझे जीत लेगा और मेरे अभिमानको चूर्ण कर देगा, उसी समान बलवालेका मैं पतिरूपसे वरण करूँगी। हे नृपश्रेष्ठ! मेरी वह प्रतिज्ञा मिथ्या नहीं की जानी चाहिये। अतः हे धर्मज्ञ! मेरे साथ युद्ध करो और मुझे जीतकर अपने अधीन कर लो'॥ २५—२७ १/२॥
तस्माद्युध्यस्व धर्मज्ञ जित्वा मां स्ववशं कुरु।<br>तयेति व्याहृतं वाक्यं श्रुत्वाहं समुपागतः॥ २८<br><br>यथेच्छसि महाराज तथा कुरु तव प्रियम्।<br>सा युद्धार्थं कृतमतिः सायुधा सिंहगामिनी॥ २९<br><br>निश्चला वर्तते भूप यद्योग्यं तद्विधीयताम्।उस स्त्रीके द्वारा कही गयी यह बात सुनकर मैं आपके पास आया हूँ। हे महाराज! अब आप जैसे भी अपना हित समझते हों, वैसा ही करें। आयुधोंसे सुसज्जित तथा सिंहपर सवार वह युद्धके लिये दृढ़ संकल्प किये हुए है। हे भूप! वह अपनी बातपर अडिग है, अतः जो उचित हो उसे आप करें॥ २८–२९ १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सुग्रीवस्य नराधिपः॥ ३०<br><br>पप्रच्छ भ्रातरं शूरं समीपस्थं महाबलम्।**व्यासजी बोले—**अपने दूत सुग्रीवका यह वचन सुनकर राजा शुम्भने पासमें ही बैठे हुए शूरवीर तथा महाबली भाई निशुम्भसे पूछा॥ ३० १/२॥
शुम्भ उवाच<br>भ्रातः किमत्र कर्तव्यं ब्रूहि सत्यं महामते॥ ३१<br><br>नार्यैका योद्धुकामास्ति समाह्वयति साम्प्रतम्।<br>अहं गच्छामि संग्रामे त्वं वा गच्छ बलान्वितः॥ ३२<br><br>यद्रोचते निशुम्भात्र तत्कर्तव्यं मया किल।**शुम्भ बोला—**हे भाई! इस स्थितिमें मुझे क्या करना चाहिये, हे महामते! सच-सच बताओ। एक स्त्री युद्ध करनेकी अभिलाषा रखती है, इस समय [हमें युद्धके लिये] बुला रही है। अतः युद्धस्थलमें मैं जाऊँ अथवा सेना लेकर तुम जाओगे? हे निशुम्भ! इस विषयमें तुम्हें जो अच्छा लगेगा, निश्चय ही मैं वही करूँगा॥ ३१–३२ १/२॥
निशुम्भ उवाच<br>न मया न त्वया वीर गन्तव्यं रणमूर्धनि॥ ३३<br><br>प्रेषयस्व महाराज त्वरितं धूम्रलोचनम्।<br>स गत्वा तां रणे जित्वा गृहीत्वा चारुलोचनाम्॥ ३४<br>आगमिष्यति शुम्भात्र विवाहः संविधीयताम्।**निशुम्भ बोला—**हे वीर! अभी रणक्षेत्रमें न मुझे और न तो आपको ही जाना चाहिये। हे महाराज! शीघ्र ही धूम्रलोचनको भेज दीजिये। वहाँ जाकर युद्धमें उस सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रीको जीतकर और उसे पकड़कर वह यहाँ ले आयेगा। तत्पश्चात् हे शुम्भ! आप उसके साथ सम्यक् विवाह कर लीजिये॥ ३३–३४ १/२॥