भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 676, कुल 889 में से

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पृष्ठ 676
अ० २५ ]पञ्चम स्कन्ध६६७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
इति ज्ञात्वा महाभाग यथारुचि तथा कुरु।<br>हितं सत्यं मितं वाक्यं वक्तव्यमनुयायिभिः॥ ४५हे महाभाग! यह सब भलीभाँति समझ-बूझकर आपकी जैसी रुचि हो, वैसा कीजिये। सेवकोंको तो अपने स्वामीसे हितकर, सत्य और नपी-तुली बात कहनी चाहिये॥ ४५॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां शुम्भः परबलार्दनः।<br>कनीयांसं समानीय पप्रच्छ रहसि स्थितः॥ ४६<br><br>भ्रातः कालिकयाद्यैव निहतो धूम्रलोचनः।<br>बलञ्च शातितं सर्वं गणा भग्नाः समागताः॥ ४७<br><br>अम्बिका शङ्खनादं वै करोति मदगर्विता।व्यासजी बोले—उनकी बात सुनकर शत्रुसेनाको विनष्ट कर डालनेवाले शुम्भने अपने छोटे भाई निशुम्भको एकान्त स्थानमें ले जाकर वहाँ स्थित हो उससे पूछा—हे भाई! आज कालिकाने अकेले ही धूम्रलोचनको मार डाला, सारी सेना नष्ट कर दी और शेष सैनिक अंग-भंग होकर भाग आये हैं। अभिमानमें चूर रहनेवाली वही अम्बिका शंखनाद कर रही है॥ ४६-४७½॥
ज्ञानिनां चैव दुर्ज्ञेया गतिः कालस्य सर्वथा॥ ४८<br><br>तृणं वज्रायते नूनं वज्रं चैव तृणायते।<br>बलवान्बलहीनः स्याद्दैवस्य गतिरीदृशी॥ ४९कालकी गतिको पूर्णरूपसे समझना ज्ञानियोंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। [कालकी प्रेरणासे] तृण वज्र बन जाता है, वज्र तृण बन जाता है और बलशाली प्राणी बलहीन हो जाता है; दैवकी ऐसी विचित्र गति है॥ ४८-४९॥
पृच्छामि त्वां महाभाग किं कर्तव्यमितः परम्।<br>अभोग्या चाम्बिका नूनं कारणादत्र चागता॥ ५०हे महाभाग! मैं तुमसे पूछता हूँ कि अब आगे मुझे क्या करना चाहिये? ऐसा लगता है कि यह अम्बिका किसी उद्देश्यसे यहाँ आयी हुई है। अतः निश्चय ही वह हमारे भोगके योग्य नहीं है॥ ५०॥
युक्तं पलायनं वीर युद्धं वा वद सत्वरम्।<br>लघुं ज्येष्ठं विजानामि त्वामहं कार्यसङ्कटे॥ ५१हे वीर! तुम मुझे शीघ्र बताओ कि इस समय भाग जाना उचित है या युद्ध करना? यद्यपि तुम छोटे हो, फिर भी इस संकटके समय मैं तुम्हें बड़ा मान रहा हूँ॥ ५१॥
निशुम्भ उवाच<br>न वा पलायनं युक्तं न दुर्गग्रहणं तथा।<br>युद्धमेव परं श्रेयः सर्वथैवानयानघ॥ ५२निशुम्भ बोला—हे अनघ! इस समय न तो भागना उचित है और न तो किलेमें छिपना ही ठीक है। अब तो इस स्त्रीके साथ हर प्रकारसे युद्ध करना ही श्रेयस्कर है॥ ५२॥
ससैन्योऽहं गमिष्यामि रणे तु प्रवराश्रितः।<br>हत्वा तामागमिष्यामि तरसा त्वबलामिमाम्॥ ५३<br><br>अथवा बलवद्दैवादन्यथा चेद्भविष्यति।<br>मृते मयि त्वया कार्यं विमृश्य च पुनः पुनः॥ ५४श्रेष्ठ सेनापतियोंको लेकर मैं अपनी सेनाके साथ युद्धभूमिमें जाऊँगा और उस कालिकाको मारकर तथा अबला अम्बिकाको पकड़कर शीघ्र यहाँ ले आऊँगा और यदि बलवान् दैवके कारण इसके विपरीत हो जाय तो मेरे मर जानेपर बार-बार सोच-विचारकर ही आप कोई कार्य कीजियेगा॥ ५३-५४॥
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