देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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६६८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २६
| इति तस्य वचः श्रुत्वा शुम्भः प्रोवाच चानुजम्।<br>तिष्ठ त्वं चण्डमुण्डौ द्वौ गच्छेतां बलसंयुतौ ॥ ५५<br><br>शशकग्रहणायत्र न युक्तं गजमोचनम्।<br>चण्डमुण्डौ महावीरो तां हन्तुं सर्वथा क्षमौ ॥ ५६ | छोटे भाई निशुम्भकी यह बात सुनकर शुम्भने उससे कहा—अभी तुम ठहरो, पहले पराक्रमी चण्ड-मुण्ड जायँ। खरगोश पकड़नेके लिये हाथी छोड़ना उचित नहीं है। चण्ड-मुण्ड बड़े वीर हैं, अतः ये दोनों उसे मार डालनेमें हर तरहसे समर्थ हैं॥ ५५-५६॥ |
| इत्युक्त्वा भ्रातरं शुम्भः सम्भाष्य च महाबलौ।<br>उवाच वचनं राजा चण्डमुण्डौ पुरःस्थितौ ॥ ५७<br><br>गच्छतं चण्डमुण्डौ द्वौ स्वसैन्यपरिवारितौ।<br>हन्तुं तामबलां शीघ्रं निर्लज्जां मदगर्विताम् ॥ ५८<br><br>गृहीत्वाथ निहत्याजौ कालिकां पिङ्गलोचनाम्।<br>आगम्यतां महाभागौ कृत्वा कार्यं महत्तरम् ॥ ५९<br><br>सा नायाति गृहीतापि गर्विता चाम्बिका यदि।<br>तदा बाणैर्महातीक्ष्णैर्हन्तव्याहवमण्डिता ॥ ६० | अपने भाई निशुम्भसे ऐसा कहकर और उससे परामर्श करके राजा शुम्भने समक्ष बैठे हुए महान् बलशाली चण्ड-मुण्डसे कहा—हे चण्ड-मुण्ड! तुम दोनों अपनी सेना लेकर उस निर्लज्ज और मदोन्मत्त अबलाका वध करनेके लिये शीघ्र जाओ। हे महाभागो! रणभूमिमें पिंग-नेत्रोंवाली उस कालिकाको मारकर और अम्बिकाको पकड़कर—यह महान् कार्य करके यहाँ लौट आओ। यदि वह मदोन्मत्त अम्बिका पकड़ी जानेपर भी नहीं आती तो अपने अत्यन्त तीक्ष्ण बाणोंसे उस रणभूषिताका भी वध कर देना॥ ५७—६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देव्या सह युद्धाय चण्डमुण्डप्रेषणं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
अथ षड्विंशोऽध्यायः
भगवती अम्बिकासे चण्ड-मुण्डका संवाद और युद्ध, देवी कालिकाद्वारा चण्ड-मुण्डका वध
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| इत्याज्ञप्तौ तदा वीरौ चण्डमुण्डौ महाबलौ।<br>जग्मतुस्तरसैवाजौ सैन्येन महतान्वितौ ॥ १ | [हे महाराज!] तदनन्तर शुम्भसे ऐसा आदेश पाकर महाबली चण्ड-मुण्ड विशाल सेनाके साथ बड़े वेगसे रणभूमिकी ओर चल पड़े॥ १ ॥ |
| दृष्ट्वा तत्र स्थितां देवीं देवानां हितकारिणीम्।<br>ऊचतुस्तौ महावीर्यौ तदा सामान्वितं वचः ॥ २ | तब देवताओंका हित करनेवाली देवीको वहाँ युद्धभूमिमें विद्यमान देखकर वे दोनों महापराक्रमी दानव उनसे सामनीतियुक्त वचन बोले— ॥ २ ॥ |
| बाले त्वं किं न जानासि शुम्भं सुरबलार्दनम्।<br>निशुम्भञ्च महावीर्यं तुराषाड्विजयोद्धतम् ॥ ३ | हे बाले! क्या तुम देवताओंकी सेनाका नाश करनेवाले शुम्भ तथा इन्द्रपर विजय प्राप्त करनेके कारण उद्धत स्वभाववाले महापराक्रमी निशुम्भको नहीं जानती हो? ॥ ३ ॥ |
| त्वमेकासि वरारोहे कालिकासिंहसंयुता।<br>जेतुमिच्छसि दुर्बुद्धे शुम्भं सर्वबलान्वितम् ॥ ४ | हे सुन्दरि! तुम यहाँ अकेली हो। हे दुर्बुद्धे! तुम मात्र कालिका और सिंहको साथ लेकर सभी प्रकारकी सेनाओंसे सम्पन्न शुम्भको जीतना चाहती हो! ॥ ४ ॥ |