भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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अ० २९] पञ्चम स्कन्ध ६८५

शिवदूती अट्टहासैः पातयामास भूतले।<br>तांश्चखादाथ चामुण्डा कालिका च त्वरान्विता॥ ५६शिवदूती अपने अट्टहाससे ही दैत्योंको धराशायी कर देती थीं और चामुण्डा तथा कालिका बड़ी शीघ्रतासे उन्हें खाने लगती थीं॥ ५६॥
शिखिसंस्था च कौमारी कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः।<br>निजघान रणे शत्रून्देवानां च हिताय वै॥ ५७मयूरपर विराजमान भगवती कौमारी देवताओंके कल्याणके लिये कानोंतक खींचे गये तथा पत्थरपर सान चढ़े तीक्ष्ण बाणोंसे शत्रुओंका संहार करने लगीं॥ ५७॥
वारुणी पाशसम्बद्धान्दैत्यान्समरमस्तके।<br>पातयामास तत्पृष्ठे मूर्च्छितानागतचेतनान्॥ ५८भगवती वारुणी समरांगणमें दैत्योंको अपने पाशमें बाँधकर उन्हें अचेत करके एकके ऊपर एकके क्रमसे गिरा देती थीं और वे निष्प्राण हो जाते थे॥ ५८॥
एवं मातृगणेनाजावतिवीर्यपराक्रमम्।<br>मर्दितं दानवं सैन्यं पलायनपरं ह्यभूत्॥ ५९इस प्रकार उन मातृशक्तियोंके प्रयाससे दानवोंकी वह ओजस्विनी तथा पराक्रमी सेना युद्धभूमिमें तहस-नहस होकर भाग खड़ी हुई॥ ५९॥
बुम्बारवस्तु सुमहानभूत्तत्र बलार्णवे।<br>पुष्पवृष्टिं तदा देवाश्चक्रुर्देव्या गणोपरि॥ ६०उस सेनारूपी समुद्रमें बड़े जोरसे रोने-चिल्लानेकी ध्वनि होने लगी। देवीके गणोंके ऊपर देवता पुष्पोंकी वर्षा करने लगे॥ ६०॥
तच्छ्रुत्वा निनदं घोरं जयशब्दं च दानवाः।<br>रक्तबीजश्चुकोपाशु दृष्ट्वा दैत्यान्पलायितान्॥ ६१<br><br>गर्जमानांस्तथा देवान्वीक्ष्य दैत्यो महाबलः।<br>रक्तबीजस्तु तेजस्वी रणमभ्याययौ तदा॥ ६२<br><br>सायुधो रथसंविष्टः कुर्वञ्ज्याशब्दमद्भुतम्।<br>आजगाम तदा देवीं क्रोधरक्तेक्षणोद्यतः॥ ६३दानवोंकी भयंकर चीत्कार तथा देवताओंकी जयध्वनि सुनकर रक्तबीज बहुत कुपित हुआ। उस समय दैत्योंको पलायित देखकर तथा देवताओंको गरजते हुए देखकर वह महाबली तथा तेजस्वी दैत्य रक्तबीज युद्धभूमिमें स्वयं आ डटा। वह आयुधोंसे सुसज्जित होकर रथपर सवार था और प्रत्यंचाकी अद्भुत टंकार करता हुआ क्रोधके मारे आँखें लाल किये युद्धके लिये देवीके सम्मुख आ गया॥ ६१–६३॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे रक्तबीजेन देव्या युद्धवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥


अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

रक्तबीजका वध और निशुम्भका युद्धक्षेत्रके लिये प्रस्थान

व्यास उवाचव्यासजी बोले— हे राजन्! किसी समय शंकरजीने
वरदानमिदं तस्य दानवस्य शिवार्पितम्।<br>अत्यद्भुततरं राजञ्छृणु तत्प्रब्रवीम्यहम्॥ १उस दानव रक्तबीजको यह बड़ा ही अद्भुत वर दे डाला था, मैं उसे बता रहा हूँ; आप सुनिये॥ १॥
तस्य देहाद्रक्तबिन्दुर्यदा पतति भूतले।<br>समुत्पतन्ति दैतेयास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः॥ २उस दानवके शरीरसे जब रक्तकी बूँद पृथ्वीपर गिरती थी, तब उसीके रूप तथा पराक्रमवाले दानव तुरंत उत्पन्न हो जाते थे। भगवान् शंकरने