भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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६८६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २९

| असंख्याता महावीर्या दानवा रक्तसम्भवाः।<br>प्रभवन्विति रुद्रेण दत्तोऽस्त्यत्यद्भुतो वरः॥ ३ | उसे यह बड़ा ही अद्भुत वर दे दिया था कि तुम्हारे रक्तसे असंख्य महान् पराक्रमी दानव उत्पन्न हो जायँगे ॥ २-३ ॥ | | स तेन वरदानेन दर्पितः क्रोधसंयुतः।<br>अभ्यगात्तरसा संख्ये हन्तुं देवीं सकालिकाम्॥ ४ | उस वरदानके कारण अभिमानमें भरा हुआ वह दैत्य अत्यन्त कुपित होकर कालिकासमेत अम्बिकाको मारनेके लिये बड़े वेगसे रणभूमिमें पहुँचा ॥ ४ ॥ | | स दृष्ट्वा वैष्णवीं शक्तिं गरुडोपरिसंस्थिताम्।<br>शक्त्या जघान दैत्येन्द्रस्तां वै कमललोचनाम्॥ ५ | गरुडपर विराजमान वैष्णवी शक्तिको देखकर उस दैत्येन्द्रने उन कमलनयनी देवीपर शक्ति (बर्छी)-से प्रहार कर दिया ॥ ५ ॥ | | गदया वारयामास शक्तिः सा शक्तिसंयुता।<br>अताडयच्च चक्रेण रक्तबीजं महासुरम्॥ ६ | तब उस शक्तिशालिनी वैष्णवी शक्तिने अपनी गदासे उस प्रहारको विफल कर दिया और अपने चक्रसे महान् असुर रक्तबीजपर आघात किया ॥ ६ ॥ | | रथाङ्गहतदेहात्तु बहु सुस्राव शोणितम्।<br>वज्राहतगिरेः शृङ्गान्निर्झरा इव गैरिकाः॥ ७ | उस चक्रके लगनेपर रक्तबीजके घायल शरीरसे रक्तकी विशाल धारा बह चली मानो वज्रप्रहारसे घायल पर्वतके शिखरसे गेरूकी धारा बह चली हो ॥ ७ ॥ | | यत्र यत्र यदा भूमौ पतन्ति रक्तबिन्दवः।<br>समुत्तस्थुस्तदाकाराः पुरुषाश्च सहस्रशः॥ ८ | पृथ्वीतलपर जहाँ-जहाँ रक्तकी बूँदें गिरती थीं, वहाँ-वहाँ उसीके समान आकारवाले हजारों पुरुष उत्पन्न हो जाते थे ॥ ८ ॥ | | ऐन्द्री तमसुरं घोरं वज्रेणाभिजघान च।<br>रक्तबीजं क्रुधाविष्टा निःससार च शोणितम्॥ ९ | तदनन्तर इन्द्रकी शक्ति ऐन्द्रीने क्रोधमें भरकर उस महान् असुर रक्तबीजपर वज्रसे आघात किया, जिससे उसके शरीरसे और रक्त निकलने लगा ॥ ९ ॥ | | ततस्तत्क्षतजाज्जाता रक्तबीजा ह्यनेकशः।<br>तद्वीर्याश्च तदाकाराः सायुधा युद्धदुर्मदाः॥ १० | तब उसके रक्तसे अनेक रक्तबीज उत्पन्न हो गये, जो उसीके समान पराक्रमी तथा आकारवाले थे। वे सब-के-सब शस्त्रसम्पन्न तथा युद्धोन्मत्त थे ॥ १० ॥ | | ब्रह्माणी ब्रह्मदण्डेन कुपिता ह्यहनद् भृशम्।<br>माहेश्वरी त्रिशूलेन दारयामास दानवम्॥ ११<br><br>नारसिंही नखाघातैस्तं विव्याध महासुरम्।<br>अहनत्तुण्डघातेन क्रुद्धा तं राक्षसाधमम्॥ १२<br><br>कौमारी च तथा शक्त्या वक्षस्येनमताडयत्। | ब्रह्माणीने कुपित होकर उसे ब्रह्मदण्डसे बहुत मारा और देवी माहेश्वरीने अपने त्रिशूलसे उस दानवको विदीर्ण कर दिया। देवी नारसिंहीने अपने नखोंके प्रहारोंसे उस महान् असुरको बींध डाला, देवी वाराहीने क्रुद्ध होकर उस अधम राक्षसको अपने तुण्डप्रहारसे चोट पहुँचायी और भगवती कौमारीने अपनी शक्तिसे उसके वक्षपर प्रहार किया ॥ ११-१२ १/२ ॥ | | सोऽपि क्रुद्धः शरासारैर्बिभेद निशितैश्च ताः॥ १३ | तब वह दानव रक्तबीज भी क्रुद्ध होकर अलग-अलग उन सभी देवियोंको तीखे बाणोंकी घोर वर्षा तथा गदा और शक्तिके प्रहारोंसे चोट पहुँचाने लगा। |