भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 702

अ० ३०] पञ्चम स्कन्ध ६९३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तां वीक्ष्य विपुलापाङ्गीं त्रैलोक्यवरसुन्दरीम्।<br>सुरक्तनयनां रम्यां क्रोधरक्तेक्षणां तथा॥ १९<br>विवाहेच्छां परित्यज्य जयाशां दूरतस्तथा।<br>मरणे निश्चयं कृत्वा तस्थावाहितकार्मुकः॥ २०[स्वभावतः] लाल नेत्रोंवाली, किंतु उस समय कोपके कारण अतिरक्त नयनोंवाली, तीनों लोकोंमें परम सुन्दरी तथा विशाल नेत्रप्रान्तोंवाली उन मनोहर भगवतीको देखकर विजयकी आशा तथा विवाहकी अभिलाषाका दूरसे ही परित्याग करके वह दानव अब अपने मरणका निश्चय-कर हाथमें धनुष लिये हुए खड़ा ही रह गया॥ १९-२०॥
तं तथा दानवं देवी स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>बभाषे शृण्वतां तेषां दैत्यानां रणमस्तके॥ २१<br>गच्छध्वं पामरा यूयं पातालं वा जलार्णवम्।<br>जीविताशां स्थिरां कृत्वा त्यक्त्वात्रैवायुधानि च॥ २२<br>अथवा मच्छराघातहतप्राणा रणाजिरे।<br>प्राप्य स्वर्गसुखं सर्वे क्रीडन्तु विगतज्वराः॥ २३<br>कातरत्वं च शूरत्वं न भवत्येव सर्वथा।<br>ददाम्यभयदानं वै यान्तु सर्वे यथासुखम्॥ २४तब भगवतीने युद्धस्थलमें उपस्थित उन सभी दानवोंको सुनाते हुए मुसकराकर उस दैत्यसे यह वचन कहा—हे नीच दानवो! यदि तुम सब जीवित रहनेकी इच्छा रखते हो तो अपने आयुध यहीं छोड़कर पाताललोक या समुद्रमें चले जाओ अथवा तुमलोग समरांगणमें मेरे बाणोंके प्रहारसे निष्प्राण होकर स्वर्गमें सुख प्राप्तकर वहाँ निर्भय होकर विहार करो। कायरता तथा पराक्रम दोनोंका एक साथ रह पाना सम्भव नहीं है। मैं तुम सबको अभयदान देती हूँ; तुम सब सुखपूर्वक चले जाओ॥ २१-२४॥
व्यास उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्या निशुम्भो मदगर्वितः।<br>निशितं खड्गमादाय चर्म चैवाष्टचन्द्रकम्॥ २५<br>धावमानस्तु तरसासिना सिंहं मदोत्कटम्।<br>जघानातिबलामूर्ध्नि भ्रामयञ्जगदम्बिकाम्॥ २६व्यासजी बोले— उन भगवतीका वचन सुनकर मदोन्मत्त निशुम्भ तीक्ष्ण खड्ग तथा अष्टचन्द्र नामक ढाल लेकर बड़े वेगसे दौड़ा और उसने बलपूर्वक अपने खड्गसे मतवाले सिंहके मस्तकपर प्रहार किया। तत्पश्चात् उसने तलवार घुमाकर जगदम्बापर भी प्रहार किया॥ २५-२६॥
ततो देवी स्वगदया वञ्चयित्वासिपातनम्।<br>ताडयामास तं बाहोर्मूले परशुना तदा॥ २७तब भगवतीने अपनी गदासे उसके तलवारके प्रहारको रोककर अपने परशुसे उसके बाहुमूल (कन्धे)-पर आघात किया॥ २७॥
खड्गेन निहतः सोऽपि बाहुमूले महामदः।<br>संस्तभ्य वेदनां भूयो जघान चण्डिकां तदा॥ २८अपने कन्धेपर खड्गसे प्रहार होनेपर भी उस महाभिमानी अहंकारी निशुम्भने उस आघातकी वेदना सहकर भगवती चण्डिकापर पुनः प्रहार किया॥ २८॥
सापि घण्टास्वनं घोरं चकार भयदं नृणाम्।<br>पपौ पुनः पुनः पानं निशुम्भं हन्तुमिच्छती॥ २९तत्पश्चात् भगवती चण्डिकाने भी प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाली भीषण घण्टाध्वनि की और निशुम्भको मारनेकी इच्छा प्रकट करती हुई उन्होंने बार-बार मधुपान किया॥ २९॥
एवं परस्परं युद्धं बभूवातिभयप्रदम्।<br>देवानां दानवानाञ्च परस्परजयैषिणाम्॥ ३०इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेकी प्रबल इच्छावाले देवताओं तथा दानवोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया॥ ३०॥