देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ६९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० |
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| संस्कृत मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पलादाः पक्षिणः क्रूराः सारमेयाश्च जम्बुकाः ।<br>ननृतुश्चातिसन्तुष्टा गृध्राः कङ्काश्च वायसाः ॥ ३१ | मांसाहारी क्रूर पक्षी, कुत्ते, सियार, गीध, कंक तथा कौए अति प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे ॥ ३१ ॥ |
| रणभूर्भाति भूयिष्ठपतितासुरवर्ष्मकैः ।<br>रुधिरस्रावसंयुक्तैर्गजाश्वदेहसंकुला ॥ ३२ | उस समय बहुत-से गिरे हुए दैत्योंके रक्त बहते हुए शरीरोंसे तथा हाथियों और घोड़ोंके देहसे पटी हुई वह रणभूमि अत्यधिक [ भयानक ] प्रतीत हो रही थी ॥ ३२ ॥ |
| पतितान्दानवान्दृष्ट्वा निशुम्भोऽतिरुषान्वितः ।<br>प्रययौ चण्डिकां तूर्णं गदामादाय दारुणाम् ॥ ३३ | [ भूमिपर ] गिरे हुए दानवोंको देखकर निशुम्भ अत्यन्त कुपित हो उठा और एक भयंकर गदा लेकर शीघ्रतापूर्वक भगवतीके समक्ष पहुँच गया ॥ ३३ ॥ |
| सिंहं जघान गदया मस्तके मदगर्वितः ।<br>प्रहृत्य च स्मितं कृत्वा पुनर्देवीमताडयत् ॥ ३४ | अभिमानमें चूर उस निशुम्भने सिंहके मस्तकपर गदासे प्रहार किया। तत्पश्चात् उसने मुसकराकर पुनः देवीपर प्रहार करके उन्हें चोट पहुँचायी ॥ ३४ ॥ |
| सापि तं कुपितातीव निशुम्भं पुरतः स्थितम् ।<br>प्रहरन्तं समीक्ष्याथ देवी वचनमब्रवीत् ॥ ३५ | इससे वे भगवती भी अत्यन्त कुपित हो गयीं और समक्ष स्थित होकर प्रहार कर रहे उस निशुम्भको देखकर कहने लगीं— ॥ ३५ ॥ |
| देव्युवाच<br>तिष्ठ मन्दमते तावद्यावत्खड्गमिदं तव ।<br>ग्रीवायां प्रेरयाम्यस्माद् गन्तासि यमसादनम् ॥ ३६ | **देवी बोलीं—**हे मन्दबुद्धि! मैं तलवार चला रही हूँ। तुम तबतकके लिये ठहर जाओ, जबतक मेरी यह तलवार तुम्हारी गर्दनतक नहीं पहुँच जाती। इसके बाद तुम यमपुरी निश्चय ही पहुँच जाओगे ॥ ३६ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा तरसा देवी कृपाणेन समाहिता ।<br>चिच्छेद मस्तकं तस्य निशुम्भस्याथ चण्डिका ॥ ३७ | **व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर भगवती चण्डिकाने एकाग्रचित्त होकर बड़ी शीघ्रतासे अपने कृपाणसे उस निशुम्भका मस्तक काट दिया ॥ ३७ ॥ |
| सच्छिन्नमस्तको देव्या कबन्धोऽतीव दारुणः ।<br>बभ्राम च गदापाणिस्त्रासयन्देवतागणान् ॥ ३८ | इस प्रकार भगवतीके द्वारा सिर कटा हुआ अत्यन्त विकराल वह धड़ हाथमें गदा धारण किये देवगणोंको भयभीत करता हुआ इधर-उधर घूमने लगा ॥ ३८ ॥ |
| देवी तस्य शितैर्बाणैश्चिच्छेद चरणौ करौ ।<br>पपातोर्व्यां ततः पापी गतासुः पर्वतोपमः ॥ ३९ | तत्पश्चात् भगवतीने तीक्ष्ण बाणोंसे उसके दोनों हाथ तथा पैर भी काट दिये। इसके बाद पर्वतके समान शरीरवाला वह पापी दैत्य प्राणहीन होकर धरतीपर गिर पड़ा ॥ ३९ ॥ |
| तस्मिन्निपतिते दैत्ये निशुम्भे भीमविक्रमे ।<br>हाहाकारो महानासीत्तत्सैन्ये भयकम्पिते ॥ ४०<br><br>त्यक्त्वायुधानि सर्वाणि सैनिकाः क्षतजाप्लुताः ।<br>जग्मुर्बुम्बारवं सर्वे कुर्वाणा राजमन्दिरम् ॥ ४१ | प्रचण्ड पराक्रमवाले उस निशुम्भ दैत्यके गिर जानेपर भयसे कम्पित दानवसेनामें महान् हाहाकार मच गया। रक्तसे लथपथ समस्त दानवसैनिक अपने-अपने सभी आयुध फेंककर चीख-पुकार करते हुए राजभवनकी ओर भाग गये ॥ ४०-४१ ॥ |
| तानागतान्सम्प्रेक्ष्य शुम्भः शत्रुनिषूदनः ।<br>पप्रच्छ क्व निशुम्भोऽसौ कथं भग्नाः पलायिताः ॥ ४२ | शत्रुओंके संहारकी शक्ति रखनेवाले शुम्भने वहाँ आये हुए उन सैनिकोंको देखकर उनसे पूछा—निशुम्भ कहाँ है और घायल होकर तुम सब युद्धभूमिसे भाग क्यों आये ? ॥ ४२ ॥ |