भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 704
अ० ३० ]पञ्चम स्कन्ध६१५

| तच्छ्रुत्वा वचनं राजंस्ते प्रोचुः प्रणता भृशम्।<br>राजंस्ते निहतो भ्राता शेते समरमूूर्धनि॥ ४३ | दानवराज शुम्भका वह वचन सुनकर उन सैनिकोंने अति विनम्रतापूर्वक कहा—हे राजन्! आपके भाई निशुम्भ मृत होकर रणभूमिमें सोये पड़े हैं॥ ४३॥ | | तया निपातिताः शूरा ये च तेऽप्यनुजानुगाः।<br>वयं त्वां कथितुं सर्वं वृत्तान्तं समुपागताः॥ ४४ | उस स्त्रीने आपके अनुज (निशुम्भ)-के जो भी अनुचर दानववीर थे, उन्हें मार डाला। यही सब समाचार आपको बतानेके लिये हम यहाँ आये हुए हैं॥ ४४॥ | | निशुम्भो निहतस्तत्र तया चण्डिकयाधुना।<br>न हि युद्धस्य कालोऽद्य तव राजन् रणाङ्गणे॥ ४५ | उस चण्डिकाने इसी समय युद्धभूमिमें निशुम्भका संहार किया है। अतएव हे राजन्! उसके साथ समरभूमिमें आपके लिये आज युद्ध करनेका [उचित] अवसर नहीं है॥ ४५॥ | | देवकार्यं समुद्दिश्य कापीय परमाङ्गना।<br>हन्तुं दैत्यकुलं नूनं प्राप्तेति परिचिन्तय॥ ४६ | आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे दानवकुलका संहार करनेके लिये यह कोई अद्भुत देवी प्रकट हुई है॥ ४६॥ | | नैषा प्राकृतयोषैव देवी शक्तिरनुत्तमा।<br>अचिन्त्यचरिता क्वापि दुर्ज्ञेया दैवतैरपि॥ ४७ | यह सामान्य नारी नहीं है, अपितु देवीरूपिणी कोई अत्युत्तम शक्ति है। अद्भुत चरित्रोंवाली ये देवी देवताओंके भी ज्ञानसे परे हैं॥ ४७॥ | | नानारूपधरातीय मायामूलविशारदा।<br>विचित्रभूषणा देवी सर्वायुधधरा शुभा॥ ४८ | ये कल्याणी भगवती अनेक रूप धारण करनेमें समर्थ हैं, मायाके मूल तत्त्वका पूर्ण ज्ञान रखनेवाली हैं और अद्भुत भूषण तथा समस्त प्रकारके आयुध धारण करनेवाली हैं॥ ४८॥ | | गहना गूढचरिता कालरात्रिरिवापरा।<br>अपारपारगा पूर्णा सर्वलक्षणसंयुता॥ ४९ | गूढ़ चरित्रोंवाली इन देवीको जान पाना अत्यन्त कठिन है। ये दूसरी कालरात्रिके समान प्रतीत होती हैं। असीमके भी पार जा सकनेमें समर्थ ये पूर्णतामयी देवी सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं॥ ४९॥ | | अन्तरिक्षस्थिता देवास्तां स्तुवन्त्यकुतोभयाः।<br>देवकार्यञ्च कुर्वाणां श्रीदेवीं परमाद्भुताम्॥ ५० | समस्त देवतागण अन्तरिक्षमें स्थित होकर देवकार्य सिद्ध करनेवाली परम अद्भुतस्वरूपिणी उन देवीका निर्भीकतापूर्वक स्तवन कर रहे हैं॥ ५०॥ | | पलायनं परो धर्मः सर्वथा देहरक्षणम्।<br>रक्षिते किल देहेस्मिन्कालेऽस्मत्सुखताङ्गते॥ ५१ | यदि आप शरीरकी रक्षा करना चाहते हैं तो इस समय पलायन ही परम धर्म है। इस शरीरकी रक्षा हो जानेके बाद पुनः आनन्ददायक अनुकूल समय आनेपर संग्राममें आपकी विजय होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है। | | संग्रामे विजयो राजन् भविता ते न संशयः।<br>कालः करोति बलिनं समये निर्बलं क्वचित्॥ ५२ | हे राजन्! कभी-कभी काल बलवान्‌को भी बलहीन बना देता है और पुनः समय आनेपर उसे बलशाली बनाकर विजयकी प्राप्ति |