भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 705

| ६९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तं पुनः सबलं कृत्वा जायायोपदधाति हि।<br>दातारं याचकं कालः करोति समये क्वचित्॥ ५३<br><br>भिक्षुकं धनदातारं करोति समयान्तरे।करा देता है। कभी-कभी काल विषम परिस्थितिमें दाताको भिखारी बना देता है और पुनः कुछ समय बीतनेपर उसी भिखारीको धन देनेवाला बना देता है॥ ५१–५३ १/२ ॥
विष्णुः कालवशे नूनं ब्रह्मा वा पार्वतीपतिः॥ ५४<br><br>इन्द्राद्या निर्जराः सर्वे काल एव प्रभुः स्वयम्।<br>तस्मात्कालं प्रतीक्षस्व विपरीतं तवाधुना॥ ५५विष्णु, ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता निश्चितरूपसे सदा कालके वशवर्ती हैं। यह काल स्वयं ही सबका स्वामी है। हे राजन्! अभी काल आपके लिये विपरीत है, अतएव आप समयकी प्रतीक्षा कीजिये॥ ५४–५५॥
सम्मुखो देवतानाञ्च दैत्यानां नाशहेतुकः।<br>एकैव च गतिर्नास्ति कालस्य किल भूपते॥ ५६<br><br>नानारूपधराप्यस्ति ज्ञातव्यं तस्य चेष्टितम्।<br>कदाचित्सम्भवो नृणां कदाचित्प्रलयस्तथा॥ ५७<br><br>उत्पत्तिहेतुः कालोऽन्यः क्षयहेतुस्तथापरः।हे पृथ्वीपते! इस समय काल देवताओंके लिये अनुकूल तथा दैत्योंके लिये विनाशकारी है। कालकी गति सर्वथा एक ही तरहकी नहीं बनी रहती है। यह काल-गति नानाविध रूप भी धारण करती है। अतः कालकी चेष्टापर विचार करते रहना चाहिये। कभी प्राणियोंका जन्म होता है और कभी उनका मरण उपस्थित हो जाता है। एक काल उत्पत्तिका हेतु होता है तो दूसरा काल विनाशका हेतु बन जाता है॥ ५६–५७ १/२ ॥
प्रत्यक्षं ते महाराज देवाः सर्वे सवासवाः॥ ५८<br><br>करदास्ते कृताः पूर्वं कालेन सम्मुखेन च।<br>तेनैव विमुखेनाद्य बलिनोऽबलयासुराः॥ ५९<br><br>निहता नितरां कालः करोति च शुभाशुभम्।<br>नैवात्र कारणं काली नैव देवाः सनातनाः॥ ६०हे महाराज! आपके समक्ष इसका प्रमाण विद्यमान है कि पहले इन्द्र आदि सभी देवता आपके लिये अनुकूल समय रहनेपर आपके करदाता बन गये थे, किंतु आज उसी कालके विपरीत हो जानेके कारण एक अबलाने बलशाली असुरोंका संहार कर डाला। यही काल हित भी करता है तथा अहित भी करता है। इस पराजयमें न तो काली कारण हैं और न तो सनातन देवता ही कारण हैं॥ ५८–६०॥
यथा ते रोचते राजंस्तथा कुरु विमृश्य च।<br>कालोऽयं नात्र हेतुस्ते दानवानां तथा पुनः॥ ६१हे राजन्! आपको जैसा उचित जान पड़े भलीभाँति सोच-समझकर आप वैसा ही कीजिये। हमारी समझमें तो यह काल अभी आपके तथा अन्य दानवोंके लिये भी अनुकूल नहीं है॥ ६१॥
त्वदग्रतो गतः शक्रो भग्नः संख्ये निरायुधः।<br>तथा विष्णुस्तथा रुद्रो वरुणो धनदो यमः॥ ६२<br><br>तथा त्वमपि राजेन्द्र वीक्ष्य कालवशं जगत्।<br>पातालं गच्छ तरसा जीवन्भद्रमवाप्स्यसि॥ ६३किसी समय संग्राममें घायल होकर तथा अपने आयुध छोड़कर इन्द्र आपके सामनेसे भाग गये थे। ऐसे ही विष्णु, रुद्र, वरुण, कुबेर, यम आदि देवता भी आपके समक्ष टिक नहीं पाये थे। अतः हे राजेन्द्र! इस समस्त जगत्को कालके अधीन मानकर आप भी तत्काल पाताललोक चले जाइये; जीवन बचा रहा तो आप कल्याण अवश्य प्राप्त करेंगे॥ ६२–६३॥