भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 708, कुल 889 में से

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पृष्ठ 708
अ० ३१ ]पञ्चम स्कन्ध६९९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दृष्ट्वा तां मोहमगमच्छुम्भः कामविमोहितः।<br>पञ्चबाणाहतः कामं मनसा समचिन्तयत्॥ २१उन्हें देखकर शुम्भ मोहित हो गया। कामबाणसे आहत वह शुम्भ कामासक्त होकर मन-ही-मन सोचने लगा— ॥ २१ ॥
अहो रूपमिदं सम्यगहो चातुर्यमद्भुतम्।<br>सौकुमार्यञ्च धैर्यञ्च परस्परविरोधि यत्॥ २२अहो, इसका ऐसा आकर्षक रूप तथा ऐसा अद्भुत चातुर्य है। सुकुमारता तथा धीरता—ये दोनों परस्पर विरोधीभाव इसमें एक साथ विद्यमान हैं!॥ २२॥
सुकुमारातिन्वङ्गी सद्यः प्रकटयौवना।<br>चित्रमेतदसौ बाला कामभावविवर्जिता॥ २३अत्यन्त कृश शरीरवाली इस सुकुमारीमें अभी-अभी यौवन प्रस्फुटित हुआ है, किंतु आश्चर्य है कि यह रमणी कामभावनासे रहित है॥ २३॥
कामकान्तासमा रूपे सर्वलक्षणलक्षिता।<br>अम्बिकेयं किमेतत्तु हन्ति सर्वान्महाबलान्॥ २४रूपमें कामदेवकी पत्नी रतिके समान सुन्दर तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न यह स्त्री कहीं अम्बिका ही तो नहीं, जो सभी महाबली दानवोंका संहार कर रही है॥ २४॥
उपायः कोऽत्र कर्तव्यो येन मे वशगा भवेत्।<br>न मन्त्रा वा मरालाक्षीसाधने सन्निधौ मम॥ २५इस अवसरपर मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिससे यह मेरी वशवर्तिनी हो जाय? इस हंस-सदृश नेत्रोंवालीको वशमें करनेहेतु मेरे पास कोई मन्त्र भी नहीं है॥ २५॥
सर्वमन्त्रमयी ह्येषा मोहिनी मदगर्विता।<br>सुन्दरीयं कथं मे स्याद्वशगा वरवर्णिनी॥ २६सर्वमन्त्रमयी, सबको मोहित करनेवाली, अभिमानमें मत्त रहनेवाली तथा उत्तम लक्षणोंवाली यह सुन्दरी किस प्रकार मेरे वशमें होगी?॥ २६॥
पातालगमनं मेऽद्य न युक्तं समराङ्गणात्।<br>सामदानविभेदैश्च नेयं साध्या महाबला॥ २७अब युद्धभूमि छोड़कर पाताललोक जाना भी मेरे लिये उचित नहीं है। साम, दान तथा भेद आदि उपायोंसे भी यह महाबलशालिनी वशमें नहीं की जा सकती॥ २७॥
किं कर्तव्यं क्व गन्तव्यं विषमे समुपस्थिते।<br>मरणं नोत्तमं चात्र स्त्रीकृतं तु यशोऽपहृत्॥ २८इस विषम परिस्थितिके आ जानेपर अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? स्त्रीके हाथों मर जाना भी उचित नहीं है; क्योंकि ऐसी मृत्यु यशको नष्ट करनेवाली होती है॥ २८॥
मरणमृषिभिः प्रोक्तं सङ्गरे मङ्गलास्पदम्।<br>यत्तत्समानबलयोर्योधयोर्युध्यतोः किल॥ २९ऋषियोंने उस मृत्युको श्रेयस्कर कहा है, जो समरभूमिमें समान बलवाले योद्धाओंके साथ लड़ते-लड़ते प्राप्त हो॥ २९॥
प्राप्तेयं दैवरचिता नारी नरशतोत्तमा।<br>नाशायास्मत्कुलस्येह सर्वथातिबलाबला॥ ३०सैकड़ों वीरोंसे श्रेष्ठ, महाबलशालिनी तथा दैव-विरचित यह नारी मेरे कुलके पूर्ण विनाशके लिये यहाँ उपस्थित हुई है॥ ३०॥
वृथा किं सामवाक्यानि मया योज्यानि साम्प्रतम्।<br>हननायागता ह्येषा किं नु साम्ना प्रसीदति॥ ३१मैं इस समय सामनीतिसे युक्त वचनोंका प्रयोग व्यर्थमें क्यों करूँ? क्योंकि यह तो संहारके लिये आयी हुई है, तो फिर सामवचनोंसे यह कैसे