भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 709
७००श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३१

| न दानैश्चालितुं योग्या नानाशस्त्रविभूषिता।<br>भेदस्तु विफलः कामं सर्वदेववशानुगा॥ ३२<br><br>तस्मात्तु मरणं श्रेयो न संग्रामे पलायनम्।<br>जयो वा मरणं वाद्य भवत्वेव यथाविधि॥ ३३ | प्रसन्न हो सकती है? अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे विभूषित होनेके कारण दान आदिके प्रलोभनोंसे भी यह विचलित नहीं की जा सकती। भेदनीति भी निष्फल सिद्ध होगी; क्योंकि सभी देवता इसके वशमें हैं॥ ३१-३२॥<br>अतएव संग्राममें मर जाना श्रेयस्कर है, किंतु पलायन करना ठीक नहीं है। अब तो प्रारब्धके अनुसार विजय अथवा मृत्यु जो भी होना हो, वह हो॥ ३३॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा शुम्भः सत्त्वाश्रितोऽभवत्।<br>युद्धाय सुस्थिरो भूत्वा तामुवाच पुरःस्थिताम्॥ ३४ | व्यासजी बोले— इस प्रकार अपने मनमें विचार करके शुम्भने धैर्यका सहारा लिया। अब युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके उसने अपने सामने खड़ी भगवतीसे कहा॥ ३४॥ | | देवि युध्यस्व कान्तेऽद्य वृथायं ते परिश्रमः।<br>मूर्खासि किल नारीणां नायं धर्मः कदाचन॥ ३५ | हे देवि! युद्ध करो, किंतु हे प्रिये! इस समय तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ है। तुम मूर्ख हो; क्योंकि युद्ध करना स्त्रियोंका धर्म कदापि नहीं है॥ ३५॥ | | नारीणां लोचने बाणा भ्रुवावेव शरासनम्।<br>हावभावास्तु शस्त्राणि पुमाल्लक्ष्यं विचक्षणः॥ ३६ | स्त्रियोंके नेत्र ही बाण हैं, उनकी भौंहें ही धनुष हैं, उनके हाव-भाव ही शस्त्र हैं और रसज्ञ पुरुष उनका लक्ष्य है॥ ३६॥ | | सन्नाहश्चाङ्गरागोऽत्र रथश्चापि मनोरथः।<br>मन्दप्रजल्पितं भेरीशब्दो नान्यः कदाचन॥ ३७ | अंगराग (शीतल चन्दन आदि) ही उनका कवच है, मनोकामना रथ है तथा धीरे-धीरे मधुर वाणीमें बोलना भेरी-ध्वनि है। अतएव स्त्रियोंके लिये अन्य शस्त्रोंकी कोई आवश्यकता नहीं रहती॥ ३७॥ | | अन्यास्त्रधारणं स्त्रीणां विडम्बनमसंशयम्।<br>लज्जैव भूषणं कान्ते न च धाष्टर्यं कदाचन॥ ३८ | यदि स्त्रियाँ इनके अतिरिक्त अन्य अस्त्र धारण करें तो यह निश्चितरूपसे उनके लिये विडम्बना ही है। हे प्रिये! लज्जा ही नारियोंका आभूषण है, धृष्टता उन्हें कभी भी शोभा नहीं देती॥ ३८॥ | | युध्यमाना वरा नारी कर्कशेवाभिदृश्यते।<br>स्तनौ सङ्गोपनीयौ वा धनुषः कर्षणे कथम्॥ ३९ | युद्ध करती हुई उत्तम नारी भी कर्कशाके सदृश दिखायी देती है। धनुष खींचते समय कोई स्त्री अपने दोनों स्तनोंको छिपानेमें कैसे सफल हो सकती है?॥ ३९॥ | | क्व मन्दगमनं कुत्र गदामादाय धावनम्।<br>बुद्धिदा कालिका तेऽत्र चामुण्डा परनायिका॥ ४०<br><br>चण्डिका मन्त्रमध्यस्था लालनेऽसुस्वरा शिवा।<br>वाहनं मृगराडास्ते सर्वसत्त्वभयङ्करः॥ ४१ | कहाँ नारियोंकी मन्थरगति और कहाँ युद्धमें गदा लेकर दौड़ना। इस समय यह कालिका तथा दूसरी स्त्री चामुण्डा ही तुम्हें बुद्धि देनेवाली हैं। मध्यस्थ होकर चण्डिका मन्त्रणा देती है, कर्कश स्वरवाली शिवा तुम्हारी शुश्रूषामें रहती है और सभी प्राणियोंमें भयंकर सिंह तुम्हारा वाहन है॥ ४०-४१॥ |