देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 710, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 710
| अ० ३१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७०१ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| वीणानादं परित्यज्य घण्टानादं करोषि यत्।<br>रूपयौवनयोः सर्वं विरोधि वरवर्णिनि॥ ४२ | हे सुन्दरि! वीणा-वादन छोड़कर तुम यह जो घण्टा-नाद कर रही हो, वह सब तुम्हारे रूप तथा यौवनके सर्वथा विपरीत है॥ ४२॥ |
| यदि ते सङ्गरेच्छास्ति कुरूपा भव भामिनि।<br>लम्बोष्ठी कुनखी क्रूरा ध्वांक्षवर्णा विलोचना॥ ४३<br><br>लम्बपादा कुदन्ती च मार्जारनयनाकृतिः।<br>ईदृशं रूपमास्थाय तिष्ठ युद्धे स्थिरा भव॥ ४४<br><br>कर्कशं वचनं ब्रूहि ततो युद्धं करोम्यहम्।<br>ईदृशीं सुदतीं दृष्ट्वा न मे पाणिः प्रसीदति॥ ४५<br><br>हन्तुं त्वां मृगशावाक्षि कामकान्तोपमे मृधे। | हे भामिनि! यदि युद्ध करना ही तुम्हें अभीष्ट है तो तुम सर्वप्रथम लम्बे ओठोंवाली, विचित्र नखोंवाली, क्रूर स्वभाववाली, कौए-जैसे वर्णवाली, विकृत आँखोंवाली, लम्बे पैरोंवाली, भयंकर दाँतोंवाली और बिल्लीसदृश नेत्रोंवाली कुरूप स्त्री बन जाओ। ऐसा ही विकराल रूप धारण करके तुम युद्धभूमिमें स्थिरतापूर्वक खड़ी हो जाओ और कर्कश वचन बोलो, तभी मैं तुम्हारे साथ युद्ध करूँगा; क्योंकि हे मृगशावक-सदृश नेत्रोंवाली! हे रतितुल्य सुन्दरि! सुन्दर दाँतोंवाली ऐसी रमणीको देखकर तुम्हें युद्धमें मारनेके लिये मेरा हाथ नहीं उठ पा रहा है॥ ४३—४५ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति ब्रुवाणं कामार्तं वीक्ष्य तं जगदम्बिका॥ ४६<br><br>स्मितपूर्वमिदं वाक्यमुवाच भरतोत्तम। | व्यासजी बोले— हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! उस कामातुर शुम्भको ऐसा बोलते हुए देखकर भगवती जगदम्बा मुसकराकर यह वचन कहने लगीं—॥ ४६ १/२॥ |
| देव्युवाच<br>किं विषीदसि मन्दात्मन् कामबाणविमोहितः॥ ४७<br><br>प्रेक्षिकाहं स्थिता मूढ कुरु कालिकया मृधम्।<br>चामुण्डया वा कुर्वैते तव योग्ये रणाङ्गणे॥ ४८<br><br>प्रहरस्व यथाकामं नाहं त्वां योद्धुमुत्सहे।<br>इत्युक्त्वा कालिकां प्राह देवी मधुरया गिरा॥ ४९ | देवी बोलीं— हे मन्दबुद्धि! कामबाणसे विमोहित होकर तुम इस प्रकार विषाद क्यों कर रहे हो? हे मूढ़! तुम पहले कालिका अथवा चामुण्डाके साथ ही युद्ध कर लो। ये दोनों देवियाँ ही समरांगणमें तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें पूर्ण समर्थ हैं। मैं तो केवल दर्शक बनकर खड़ी हूँ। तुम इन दोनोंपर यथेच्छ प्रहार करो। मैं तुमसे लड़नेकी इच्छा नहीं करती॥ ४७-४८ १/२॥ |
| जह्येनं कालिके क्रूरे कुरूपप्रियमाहवे। | शुम्भसे ऐसा कहकर भगवतीने मधुर वाणीमें कालिकासे कहा—हे क्रूर कालिके! कुरूपाके साथ लड़नेकी इच्छावाले इस दानवको तुम युद्धमें मार डालो॥ ४९ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्ता कालिका कालप्रेरिता कालरूपिणी॥ ५०<br><br>गदां प्रगृह्य तरसा तस्थावाजौ कृतोद्यमा।<br>तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयानकम्॥ ५१<br><br>पश्यतां सर्वदेवानां मुनीनाञ्च महात्मनाम्। | व्यासजी बोले— भगवतीके इस प्रकार कहनेपर कालरूपिणी कालिका कालसे प्रेरित होकर बड़ी तेजीसे तत्काल गदा उठाकर सावधानीपूर्वक रणमें खड़ी हो गयीं। इसके बाद सभी देवताओं, मुनियों और महात्माओंके देखते-देखते उन दोनोंमें अतीव भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया॥ ५०-५१ १/२॥ |