देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ७०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गदामुद्यम्य शुम्भोऽथ जघान कालिकां रणे॥ ५२<br>कालिका दैत्यराजानं गदया न्यहनद् भृशम्।<br>बभंजास्य रथं चण्डी गदया कनकोज्ज्वलम्॥ ५३<br>खरान्हत्वा जघानाशु दारुकं दारुणस्वना।<br>स पदातिर्गदां गुर्वीं समादाय क्रुधान्वितः॥ ५४ | शुम्भने अपनी गदा लेकर उससे कालिकापर प्रहार किया। भगवती कालिका भी अपनी गदासे दैत्यराज शुम्भपर तेज प्रहार करने लगीं। भयानक स्वरवाली चण्डीने गदासे उस दैत्यके सुवर्णमय चमकीले रथको चूर-चूर कर डाला और [शुम्भका रथ खींचनेवाले] गदहोंको मारकर उसके सारथिको भी मार डाला॥ ५२-५३ १/२॥<br>अब क्रोधमें भरे हुए शुम्भने अपनी विशाल गदा लेकर अट्टहास करते हुए पैदल ही पहुँचकर कालिकाकी दोनों भुजाओंके मध्यभाग (वक्षःस्थल)-पर प्रहार किया॥ ५४ १/२॥ |
| कालिकाभुजयोर्मध्ये प्रहसन्नहनत्तदा।<br>वञ्चयित्वा गदाघातं खड्गमादाय सत्वरा॥ ५५<br>चिच्छेदास्य भुजं सव्यं सायुधं चन्दनार्चितम्।<br>स छिन्नबाहुर्विरथो गदापाणिः परिप्लुतः॥ ५६ | तब कालिकाने उसके गदा-प्रहारको निष्फल करके शीघ्रतापूर्वक तलवार उठाकर शुम्भके चन्दनचर्चित तथा आयुधयुक्त बायें हाथको काट दिया॥ ५५ १/२॥<br>हाथ कट जाने तथा रथविहीन होनेके बावजूद भी रक्तसे लथपथ वह शुम्भ हाथमें गदा लिये हुए शीघ्रतापूर्वक कालिकाके पास पहुँचकर उनके ऊपर प्रहार करने लगा॥ ५६ १/२॥ |
| अचिरेण समागम्य कालिकामहनत्तदा।<br>काली च करवालेन भुजं तस्याथ दक्षिणम्॥ ५७<br>चिच्छेद प्रहसन्ती सा सगदं किल साङ्गदम्।<br>कर्तुं पादप्रहारं स कुपितः प्रययौ जवात्॥ ५८ | तब कालीने अपने करवाल (तलवार)-से उसके गदायुक्त तथा बाजूबन्दसे सुशोभित दाहिने हाथको हँसते-हँसते काट डाला॥ ५७ १/२॥<br>इसके बाद वह शुम्भ कुपित होकर कालिकापर पैरसे प्रहार करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ा। तभी कालिकाने अपनी तलवारसे तुरंत उसके दोनों पैर भी काट डाले॥ ५८ १/२॥ |
| काली चिच्छेद चरणौ खड्गेनास्य त्वरान्विता।<br>सच्छिन्नकरपादोऽपि तिष्ठ तिष्ठेति च ब्रुवन्॥ ५९<br>धावमानो ययावाशु कालिकां भीषयन्निव।<br>तमागच्छन्तमालोक्य कालिका कमलोपमम्॥ ६० | हाथ-पैर कट जानेपर भी 'ठहरो-ठहरो' ऐसा कहता हुआ वह शुम्भ कालिकाको भयभीत करते हुए वेगपूर्वक दौड़ता हुआ उनकी ओर बढ़ा॥ ५९ १/२॥<br>उसे आते देखकर कालिकाने उसके कमलसदृश मस्तकको काट दिया, जिससे उसके कण्ठसे रक्तकी अजस्र धारा बहने लगी। मस्तक कट जानेपर पर्वततुल्य वह शुम्भ जमीनपर गिर पड़ा और उसके प्राण शरीरसे निकलकर तत्काल प्रयाण कर गये॥ ६०-६१ १/२॥ |
| चकर्त मस्तकं कण्ठाद्रुधिरौघवहं भृशम्।<br>छिन्नेऽसौ मस्तके भूमौ पपात गिरिसन्निभः॥ ६१<br>प्राणा विनिर्ययुस्तस्य देहादुत्क्रम्य सत्वरम्।<br>गतासुं पतितं दैत्यं दृष्ट्वा देवाः सवासवाः॥ ६२<br>तुष्टुवुस्तां तदा देवीं चामुण्डां कालिकां तथा। | दैत्य शुम्भको इस प्रकार प्राणविहीन होकर गिरा हुआ देखकर इन्द्रसहित सभी देवता भगवती चामुण्डा तथा कालिकाकी स्तुति करने लगे॥ ६२ १/२॥ |