भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 725

| ७१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३४ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा भक्तिसंयुतः।<br>पूजयेज्जगतां धात्रीं स सर्वसुखभाग्भवेत्॥ २०<br><br>नवरात्रव्रतं कुर्यान्नरनारीगणश्च यः।<br>वाञ्छितं फलमाप्नोति सर्वदा भक्तितत्परः॥ २१ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र—जो भी भक्तिपरायण होकर जगज्जननी जगदम्बाकी पूजा करता है, वह सब प्रकारके सुखका भागी हो जाता है। जो स्त्री अथवा पुरुष भक्तितत्पर होकर नवरात्रव्रत करता है, वह सदा मनोवांछित फल प्राप्त करता है॥ २०–२१॥
आश्विने शुक्लपक्षे तु नवरात्रव्रतं शुभम्।<br>करोति भावसंयुक्तः सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥ २२जो मनुष्य आश्विन शुक्लपक्षमें इस उत्तम नवरात्रव्रतको श्रद्धाभावसे करता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं॥ २२॥
विधिवन्मण्डलं कृत्वा पूजास्थानं प्रकल्पयेत्।<br>कलशं स्थापयेत्तत्र वेदमन्त्रविधानतः॥ २३विधिपूर्वक मण्डलका निर्माण करके पूजा-स्थानका निर्माण करना चाहिये और वहाँपर विधिविधानसे वैदिक मन्त्रोंद्वारा कलशकी स्थापना करनी चाहिये॥ २३॥
यन्त्रं सुरुचिरं कृत्वा स्थापयेत्कलशोपरि।<br>वापयित्वा यवांश्चारून्पार्श्वतः परिवर्तितान्॥ २४<br><br>कृत्वोपरि वितानञ्च पुष्पमालासमावृतम्।<br>धूपदीपसुसंयुक्तं कर्तव्यं चण्डिकागृहम्॥ २५अत्यन्त सुन्दर यन्त्रका निर्माण करके उसे कलशके ऊपर स्थापित कर देना चाहिये। तत्पश्चात् कलशके चारों ओर परिष्कृत तथा उत्तम जौका वपन करके पूजा-स्थानके ऊपर पुष्पमालासे अलंकृत चाँदनी लगाकर देवीका मण्डप बनाना चाहिये तथा उसे सदा धूप-दीपसे सम्पन्न रखना चाहिये॥ २४–२५॥
त्रिकालं तत्र कर्तव्या पूजा शक्त्यनुसारतः।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं चण्डिकायाश्च पूजने॥ २६<br><br>धूपैर्दीपैः सुनैवेद्यैः फलपुष्पैरनेकणः।<br>गीतवाद्यैः स्तोत्रपाठैर्वेदपारायणैस्तथा॥ २७<br><br>उत्सवस्तत्र कर्तव्यो नानावादित्रसंयुतैः।<br>कन्यकानां पूजनञ्च विधेयं विधिपूर्वकम्॥ २८<br><br>चन्दनैर्भूषणैर्वस्त्रैर्भक्ष्यैश्च विविधैस्तथा।<br>सुगन्धतैलमाल्यैश्च मनसो रुचिकारकैः॥ २९<br><br>एवं सम्पूजनं कृत्वा होमं मन्त्रविधानतः।<br>अष्टम्यां वा नवम्यां वा कारयेद्विधिपूर्वकम्॥ ३०<br><br>ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चात्पारणां दशमीदिने।<br>कर्तव्यं शक्तितो दानं देयं भक्तिपरैर्नृपैः॥ ३१अपनी शक्तिके अनुसार वहाँ [प्रातः, मध्याह्न तथा सायंकाल] तीनों समय पूजा करनी चाहिये। देवीकी पूजामें धनकी कृपणता नहीं करनी चाहिये। धूप, दीप, उत्तम नैवेद्य, अनेक प्रकारके फल-पुष्प, गीत, वाद्य, स्तोत्रपाठ तथा वेदपारायण—इनके द्वारा भगवतीकी पूजा होनी चाहिये। नानाविध वाद्य बजाकर उत्सव मनाना चाहिये। इस अवसरपर चन्दन, आभूषण, वस्त्र, विविध प्रकारके व्यंजन, सुगन्धित तेल, हार—मनको प्रसन्न करनेवाले इन पदार्थोंसे विधिपूर्वक कन्याओंका पूजन करना चाहिये। इस प्रकार पूजन सम्पन्न करके अष्टमी या नवमीको मन्त्रोच्चारपूर्वक विधिवत् हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। इसके बाद दशमीको पारण करना चाहिये। भक्तिनिष्ठ राजाओंको यथाशक्ति दान भी करना चाहिये॥ २६–३१॥
एवं यः कुरुते भक्त्या नवरात्रव्रतं नरः।<br>नारी वा सधवा भक्त्या विधवा वा पतिव्रता॥ ३२इस प्रकार पुरुष अथवा पतिव्रता सधवा या विधवा स्त्री जो कोई भी भक्तिपूर्वक नवरात्रव्रत करता है, वह इस लोकमें सुख तथा मनोभिलषित