भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 726, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 726
अ० ३४ ]पञ्चम स्कन्ध७१७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इह लोके सुखं भोगान्प्राप्नोति मनसेप्सितान् ।<br>देहान्ते परमं स्थानं प्राप्नोति व्रततत्परः ॥ ३३<br><br>जन्मान्तरेऽम्बिकाभक्तिर्भवत्यव्यभिचारिणी ।<br>जन्मोत्तमकुले प्राप्य सदाचारो भवेद्वि सः ॥ ३४भोगोंको प्राप्त करता है और वह व्रतपरायण व्यक्ति देह-त्याग होनेपर परम दिव्य देवीलोकको प्राप्त करता है ॥ ३२-३३ ॥<br><br>उसे जन्मान्तरमें देवी जगदम्बाकी अविचल भक्ति प्राप्त होती है और उत्तम कुलमें जन्म पाकर वह स्वभावतः सदाचारी होता है ॥ ३४ ॥
नवरात्रव्रतं प्रोक्तं व्रतानामुत्तमं व्रतम् ।<br>आराधनं शिवायास्तु सर्वसौख्यकरं परम् ॥ ३५नवरात्रव्रतको व्रतोंमें उत्तम व्रत कहा गया है; भगवती शिवाका आराधन सब प्रकारके उत्तम सुखको देनेवाला है ॥ ३५ ॥
अनेन विधिना राजन् समाराध्य चण्डिकाम् ।<br>जित्वा रिपूनस्खलितं राज्यं प्राप्स्यस्यनुत्तमम् ॥ ३६<br><br>सुखञ्च परमं भूप देहेऽस्मिन्स्वगृहे पुनः ।<br>पुत्रदारान्समासाद्य लप्स्यसे नात्र संशयः ॥ ३७हे राजन्! इस विधिसे भगवती चण्डिकाकी आराधना कीजिये, इससे शत्रुओंको जीतकर आप अपना उत्तम राज्य पुनः प्राप्त कर लेंगे और हे भूप! अपनी स्त्री-पुत्र आदि स्वजनोंको प्राप्तकर आप अपने भवनमें परम उत्तम सुखका इसी शरीरसे उपभोग करेंगे; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३६-३७ ॥
वैश्योत्तम त्वमेवाद्य समाराधय कामदाम् ।<br>देवीं विश्वेश्वरीं मायां सृष्टिंसंहारकारिणीम् ॥ ३८<br><br>स्वजनानां च मान्यस्त्वं भविष्यसि गृहे गतः ।<br>सुखं सांसारिकं प्राप्य यथाभिलषितं पुनः ॥ ३९हे वैश्यश्रेष्ठ! आप भी आजसे समस्त कामनाओंको देनेवाली, सृष्टि और संहारकी कारणभूता विश्वेश्वरी देवी महामायाकी आराधना कीजिये। इससे आप अपने घर जानेपर अपने लोगोंमें मान्य हो जायँगे और मनोभिलषित सांसारिक सुख प्राप्त करके अन्तमें शुभ देवीलोकमें वास करेंगे—इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३८-३९ १/२ ॥
देवीलोके शुभे वासो भविता ते न संशयः ।<br>नाराधिता भगवती यैस्ते नरकभागिनः ॥ ४०<br><br>इह लोकेऽतिदुःखार्ता नानारोगैः प्रपीडिताः ।<br>भवन्ति मानवा राजञ्छत्रुभिश्च पराजिताः ॥ ४१हे राजन्! जो मनुष्य भगवतीकी आराधना नहीं करते, वे नरकके भागी होते हैं। वे इस लोकमें अत्यन्त दुःखी, विविध व्याधियोंसे पीड़ित, शत्रुओंद्वारा पराजित, स्त्री-पुत्रसे हीन, तृष्णाग्रस्त और बुद्धिभ्रष्ट होते हैं ॥ ४०-४१ १/२ ॥
निष्कलत्रा ह्यपुत्राश्च तृष्णार्ताः स्तब्धबुद्धयः ।<br>बिल्वीदलैः करवीरैः शतपत्रैश्च चम्पकैः ॥ ४२<br><br>अर्चिता जगतां धात्री यैस्तेऽतीव विलासिनः ।<br>भवन्ति कृतपुण्यास्ते शक्तिभक्तिपरायणाः ॥ ४३बिल्वपत्रोंसे तथा कनैल, कमल और चम्पाके फूलोंसे जो जगज्जननीकी आराधना करते हैं, शक्तिस्वरूपा भगवतीकी भक्तिमें रत वे पुण्यशाली लोग विविध प्रकारके सुख प्राप्त करते हैं ॥ ४२-४३ ॥
धनविभवसुखाढ्या मानवा मानवन्तः<br>सकलगुणगणानां भाजनं भारतीशाः ।<br>निगमपठितमन्त्रैः पूजिता यैर्भवानी<br>नृपतितिलकमुख्यास्ते भवन्तीह लोके ॥ ४४[हे नृपश्रेष्ठ!] जो लोग वेदोक्त मन्त्रोंसे भवानीका पूजन करते हैं, वे मानव इस संसारमें सब प्रकारके धन, वैभव तथा सुखसे परिपूर्ण, समस्त गुणोंके आगार, माननीय, विद्वान् और राजाओंके शिरोमणि होते हैं ॥ ४४ ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भगवत्याः पूजाराधनविधिवर्णनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥