देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ७१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३५ |
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अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
सुरथ और समाधिकी तपस्यासे प्रसन्न भगवतीका प्रकट होना और उन्हें इच्छित वरदान देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| इति तस्य वचः श्रुत्वा दुःखितौ वैश्यपार्थिवौ।<br>प्रणिपत्य मुनिं प्रीत्या प्रश्रयावनतौ भृशम्॥ १<br><br>हर्षेणोत्फुल्लनयनावूचतुर्वाक्यकोविदौ ।<br>कृताञ्जलिपुटौ शान्तौ भक्तिप्रवणचेतसौ॥ २ | उनका यह वचन सुनकर दुःखित हृदयवाले वैश्य और राजाने प्रसन्नतापूर्वक विनम्रभावसे मुनिके चरणोंमें प्रणाम किया। भक्तिपरायण चित्तवाले, शान्त स्वभाववाले तथा हर्षके कारण खिले हुए नेत्रोंवाले वे दोनों वाक्य-विशारद राजा और वैश्य हाथ जोड़कर कहने लगे॥ १-२॥ |
| भगवन्पावितावद्य शान्तौ दीनौ शुचान्वितौ।<br>तव सूक्तसरस्वत्या गङ्गयेव भगीरथः॥ ३ | हे भगवन्! हम दोनों दुःखी जनोंको आपकी सूक्तिरूपिणी वाणीने उसी प्रकार शान्त तथा पवित्र कर दिया, जैसे गंगाने राजा भगीरथको कर दिया था॥ ३॥ |
| साधवः सम्भवन्तीह परोपकृतितत्पराः।<br>अकृत्रिमगुणारामाः सुखदाः सर्वदेहिनाम्॥ ४<br><br>पूर्वपुण्यप्रसङ्गेन प्राप्तोऽयमाश्रमः शुभः।<br>तवावाभ्यां महाभाग महादुःखविनाशकः॥ ५<br><br>भवन्ति मानवा भूमौ बहवः स्वार्थतत्पराः।<br>परार्थसाधने दक्षाः केचित्क्वापि भवादृशाः॥ ६<br><br>दुःखितोऽहं मुनिश्रेष्ठ वैश्योऽयं चातिदुःखितः।<br>उभौ संसारसन्तप्तौ तवाश्रमपदे मुदा॥ ७<br><br>दर्शनादेव हे विद्वन् गतं दुःखमिहावयोः।<br>देहजं मानसं वाक्यश्रवणादेव साम्प्रतम्॥ ८ | सज्जन लोग परोपकारपरायण, स्वाभाविक रूपसे गुणोंके भण्डार और सभी प्राणियोंको सुख देनेवाले होते हैं। पूर्वजन्मोंके पुण्यके कारण ही महान् दुःखका नाश करनेवाले आपके इस शुभ आश्रममें हम दोनोंका आना हुआ। पृथ्वीपर बहुत-से स्वार्थी मनुष्य होते हैं, परंतु दूसरोंके हित-साधनमें कुशल आप-जैसे कुछ ही लोग कहीं-कहीं मिलते हैं। हे मुनिश्रेष्ठ! मैं दुःखी हूँ और ये वैश्य अत्यन्त दुःखी हैं। हम दोनों इस संसारसे पीड़ित हैं। हे विद्वन्! आपके इस आश्रममें आकर प्रसन्नतापूर्वक आपके दर्शन और उपदेश-श्रवणसे हमारा शारीरिक तथा मानसिक क्लेश दूर हो गया॥ ४-८॥ |
| धन्यावावां कृतकृत्यौ जातौ सूक्तिसुधारसात्।<br>पावितौ भवता ब्रह्मन् कृपया करुणार्णव॥ ९ | हे ब्रह्मन्! आपकी अमृतमयी वाणीके रससे हम दोनों धन्य और कृतकृत्य हो गये। हे करुणासागर! आपने अपनी कृपासे हम दोनोंको पवित्र कर दिया॥ ९॥ |
| गृहाणास्मत्करौ साधो नय पारं भवार्णवे।<br>मग्नौ श्रान्ताविति ज्ञात्वा मन्त्रदानेन साम्प्रतम्॥ १० | हे साधो! हम दोनों थककर इस संसाररूपी महासागरमें डूब रहे हैं—यह जानकर अब आप हम दोनोंका हाथ पकड़िये और मन्त्रदान देकर भवसागरसे पार कर दीजिये॥ १०॥ |