भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 735
७२६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्रिभिः स वदनैः श्रेष्ठैर्व्यरोचत मनोहरैः ।<br>त्रिभिर्भिन्नानि कार्याणि मुखैः समकरोन्मुनिः ॥ ३१<br><br>वेदानेकेन सोऽधीते सुरां चैकेन सोऽपिबत् ।<br>तृतीयेन दिशः सर्वा युगपच्च निरीक्षते ॥ ३२अपने तीन श्रेष्ठ तथा मनोहर मुखोंके कारण वह अत्यन्त शोभासम्पन्न दिखायी देता था। वह मुनि अपने तीन मुखोंसे तीन भिन्न-भिन्न कार्य करता था। वह एक मुखसे वेदाध्ययन करता था, एक मुखसे मधुपान करता था और तीसरे मुखसे सब दिशाओंका एक साथ निरीक्षण करता था॥ ३१-३२॥
त्रिशिरा भोगमुत्सृज्य तपश्चक्रे सुदुष्करम् ।<br>तपस्वी स मृदुर्दान्तो धर्ममेव समाश्रितः ॥ ३३वह त्रिशिरा भोगका त्याग करके मृदु, संयमी और धर्मपरायण तपस्वी होकर अत्यन्त कठोर तप करने लगा॥ ३३॥
पञ्चाग्निसाधनं काले पादपाग्रे निवेशनम् ।<br>जलमध्ये निवासं च हेमन्ते शिशिरे तथा ॥ ३४<br><br>निराहारो जितात्मासौ त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।<br>तपश्चचार मेधावी दुष्करं मन्दबुद्धिभिः ॥ ३५ग्रीष्मकालमें पंचाग्नि तापते, वृक्षकी डालीमें पैरके बल अधोमुख लटके रहते एवं हेमन्त और शिशिर ऋतुमें जलमें स्थित रहते थे। सब कुछ त्याग करके जितेन्द्रिय भावसे निराहार रहकर उस बुद्धिमान् [त्रिशिरा]-ने मन्दबुद्धि प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर तपस्या आरम्भ कर दी॥ ३४-३५॥
तं च दृष्ट्वा तपस्यन्तं खेदमाप शचीपतिः ।<br>विषादमगमत्तत्र शक्रोऽयं मास्मभूदिति ॥ ३६उसको तप करते देखकर शचीपति इन्द्र दुःखित हुए। उन्हें यह विषाद हुआ कि कहीं यह इन्द्र न बन जाय॥ ३६॥
दृष्ट्वा तस्य तपो वीर्यं सत्यं चामिततेजसः ।<br>चिन्तां च महतीं प्राप ह्यनिशं पाकशासनः ॥ ३७<br><br>विवर्धमानस्त्रिशिरा मामयं शातयिष्यति ।<br>नोपेक्ष्यः सर्वथा शत्रुर्वर्धमानबलो बुधैः ॥ ३८<br><br>तस्मादुपायः कर्तव्यस्तपोनाशाय साम्प्रतम् ।<br>कामस्तु तपसां शत्रुः कामान्नश्यति वै तपः ॥ ३९<br><br>तथैवाद्य प्रकर्तव्यं भोगासक्तो भवेद्यथा ।उस अत्यन्त तेजस्वी [विश्वरूप]-का तप, पराक्रम और सत्य देखकर इन्द्र निरन्तर इस प्रकार चिन्तित रहने लगे—उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होता हुआ यह त्रिशिरा मुझे ही समाप्त कर देगा, इसीलिये बुद्धिमानोंने कहा है कि बढ़ते हुए पराक्रमवाले शत्रु की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इसके तपके नाशका उपाय इसी समय करना चाहिये। कामदेव तपस्वियोंका शत्रु है, कामसे ही तपका नाश होता है। अतः मुझे वैसा ही करना चाहिये, जिससे यह भोगोंमें आसक्त हो जाय॥ ३७-३९ ½॥
इति सञ्चिन्त्य मनसा बुद्धिमान्बलमर्दनः ॥ ४०<br><br>आज्ञापयत्सोऽप्सरसस्त्वाष्ट्रपुत्रप्रलोभने ।<br>उर्वशीं मेनकां रम्भां घृताचीं च तिलोत्तमाम् ॥ ४१<br><br>समाहूयाब्रवीच्छक्रस्तास्तदा रूपगर्विताः ।<br>प्रियं कुरुध्वं मे सर्वाः कार्येऽद्य समुपस्थिते ॥ ४२ऐसा मनमें विचारकर बल नामक दैत्यका नाश करनेवाले उन बुद्धिमान् इन्द्रने त्वष्टाके पुत्र त्रिशिराको प्रलोभनमें डालनेके लिये अप्सराओंको आज्ञा दी। उन्होंने उर्वशी, मेनका, रम्भा, घृताची, तिलोत्तमा आदिको बुलाकर कहा—अपने रूपपर गर्व करनेवाली हे अप्सराओ! आज मेरा कार्य आ पड़ा है, तुम सब मेरे उस प्रिय कार्यको सम्पन्न करो॥ ४०-४२॥
यत्तो मेऽद्य महाञ्छत्रुस्तपस्तपति दुर्जयः ।<br>कार्यं कुरुत गच्छध्वं प्रलोभयत माचिरम् ॥ ४३मेरा एक महान् दुर्धर्ष शत्रु संयत होकर तपस्या कर रहा है। शीघ्र ही उसके पास जाओ और उसे प्रलोभित करो; इस प्रकार शीघ्र ही मेरा कार्य करो॥ ४३॥