देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ७२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्रिभिः स वदनैः श्रेष्ठैर्व्यरोचत मनोहरैः ।<br>त्रिभिर्भिन्नानि कार्याणि मुखैः समकरोन्मुनिः ॥ ३१<br><br>वेदानेकेन सोऽधीते सुरां चैकेन सोऽपिबत् ।<br>तृतीयेन दिशः सर्वा युगपच्च निरीक्षते ॥ ३२ | अपने तीन श्रेष्ठ तथा मनोहर मुखोंके कारण वह अत्यन्त शोभासम्पन्न दिखायी देता था। वह मुनि अपने तीन मुखोंसे तीन भिन्न-भिन्न कार्य करता था। वह एक मुखसे वेदाध्ययन करता था, एक मुखसे मधुपान करता था और तीसरे मुखसे सब दिशाओंका एक साथ निरीक्षण करता था॥ ३१-३२॥ |
| त्रिशिरा भोगमुत्सृज्य तपश्चक्रे सुदुष्करम् ।<br>तपस्वी स मृदुर्दान्तो धर्ममेव समाश्रितः ॥ ३३ | वह त्रिशिरा भोगका त्याग करके मृदु, संयमी और धर्मपरायण तपस्वी होकर अत्यन्त कठोर तप करने लगा॥ ३३॥ |
| पञ्चाग्निसाधनं काले पादपाग्रे निवेशनम् ।<br>जलमध्ये निवासं च हेमन्ते शिशिरे तथा ॥ ३४<br><br>निराहारो जितात्मासौ त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।<br>तपश्चचार मेधावी दुष्करं मन्दबुद्धिभिः ॥ ३५ | ग्रीष्मकालमें पंचाग्नि तापते, वृक्षकी डालीमें पैरके बल अधोमुख लटके रहते एवं हेमन्त और शिशिर ऋतुमें जलमें स्थित रहते थे। सब कुछ त्याग करके जितेन्द्रिय भावसे निराहार रहकर उस बुद्धिमान् [त्रिशिरा]-ने मन्दबुद्धि प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर तपस्या आरम्भ कर दी॥ ३४-३५॥ |
| तं च दृष्ट्वा तपस्यन्तं खेदमाप शचीपतिः ।<br>विषादमगमत्तत्र शक्रोऽयं मास्मभूदिति ॥ ३६ | उसको तप करते देखकर शचीपति इन्द्र दुःखित हुए। उन्हें यह विषाद हुआ कि कहीं यह इन्द्र न बन जाय॥ ३६॥ |
| दृष्ट्वा तस्य तपो वीर्यं सत्यं चामिततेजसः ।<br>चिन्तां च महतीं प्राप ह्यनिशं पाकशासनः ॥ ३७<br><br>विवर्धमानस्त्रिशिरा मामयं शातयिष्यति ।<br>नोपेक्ष्यः सर्वथा शत्रुर्वर्धमानबलो बुधैः ॥ ३८<br><br>तस्मादुपायः कर्तव्यस्तपोनाशाय साम्प्रतम् ।<br>कामस्तु तपसां शत्रुः कामान्नश्यति वै तपः ॥ ३९<br><br>तथैवाद्य प्रकर्तव्यं भोगासक्तो भवेद्यथा । | उस अत्यन्त तेजस्वी [विश्वरूप]-का तप, पराक्रम और सत्य देखकर इन्द्र निरन्तर इस प्रकार चिन्तित रहने लगे—उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होता हुआ यह त्रिशिरा मुझे ही समाप्त कर देगा, इसीलिये बुद्धिमानोंने कहा है कि बढ़ते हुए पराक्रमवाले शत्रु की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इसके तपके नाशका उपाय इसी समय करना चाहिये। कामदेव तपस्वियोंका शत्रु है, कामसे ही तपका नाश होता है। अतः मुझे वैसा ही करना चाहिये, जिससे यह भोगोंमें आसक्त हो जाय॥ ३७-३९ ½॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा बुद्धिमान्बलमर्दनः ॥ ४०<br><br>आज्ञापयत्सोऽप्सरसस्त्वाष्ट्रपुत्रप्रलोभने ।<br>उर्वशीं मेनकां रम्भां घृताचीं च तिलोत्तमाम् ॥ ४१<br><br>समाहूयाब्रवीच्छक्रस्तास्तदा रूपगर्विताः ।<br>प्रियं कुरुध्वं मे सर्वाः कार्येऽद्य समुपस्थिते ॥ ४२ | ऐसा मनमें विचारकर बल नामक दैत्यका नाश करनेवाले उन बुद्धिमान् इन्द्रने त्वष्टाके पुत्र त्रिशिराको प्रलोभनमें डालनेके लिये अप्सराओंको आज्ञा दी। उन्होंने उर्वशी, मेनका, रम्भा, घृताची, तिलोत्तमा आदिको बुलाकर कहा—अपने रूपपर गर्व करनेवाली हे अप्सराओ! आज मेरा कार्य आ पड़ा है, तुम सब मेरे उस प्रिय कार्यको सम्पन्न करो॥ ४०-४२॥ |
| यत्तो मेऽद्य महाञ्छत्रुस्तपस्तपति दुर्जयः ।<br>कार्यं कुरुत गच्छध्वं प्रलोभयत माचिरम् ॥ ४३ | मेरा एक महान् दुर्धर्ष शत्रु संयत होकर तपस्या कर रहा है। शीघ्र ही उसके पास जाओ और उसे प्रलोभित करो; इस प्रकार शीघ्र ही मेरा कार्य करो॥ ४३॥ |
| अ० १ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शृङ्गारवेशैर्विविधैर्भावैर्देहसमुद्भवैः ।<br>प्रलोभयत भद्रं वः शमयध्वं ज्वरं मम ॥ ४४ | अनेक प्रकारके शृंगार-वेशों तथा शरीरके हाव-भावोंसे उसे प्रलोभित करो और मेरे मानसिक सन्तापको शान्त करो; तुमलोगोंका कल्याण हो ॥ ४४ ॥ |
| अस्वस्थोऽहं महाभागास्तस्य ज्ञात्वा तपोबलम् ।<br>बलवानासनं मेऽद्य ग्रहीष्यत्यविलम्बितः ॥ ४५ | हे महाभागा अप्सराओ! उसके तपोबलको जानकर मैं व्याकुल हो गया हूँ, वह बलवान् शीघ्र ही मेरा पद छीन लेगा ॥ ४५ ॥ |
| भयं मे समुपायातं क्षिप्रं नाशयताबलाः ।<br>उपकुर्वन्तु सहिताः कार्येऽद्य समुपस्थिते ॥ ४६ | हे अबलाओ! मेरे सामने यह भय आ गया है, तुमलोग शीघ्र ही इसका नाश कर दो। इस कार्यके आ पड़नेपर तुम सब मिलकर आज मेरा उपकार करो ॥ ४६ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं नार्य ऊचुस्तं प्रणताः पुरः ।<br>मा भयं कुरु देवेश यतिष्यामः प्रलोभने ॥ ४७ | उनके इस वचनको सुनकर नारियों (अप्सराओं)-ने उन्हें नमन करते हुए कहा—हे देवराज! आप भय न करें, हम उसे प्रलोभनमें डालनेका प्रयत्न करेंगी ॥ ४७ ॥ |
| यथा न स्याद्भयं तस्मात्तथा कार्यं महाद्युते ।<br>नृत्यगीतविहारैश्च मुनेस्तस्य प्रलोभने ॥ ४८<br><br>कटाक्षैरङ्गभेदैश्च मोहयित्वा मुनिं विभो ।<br>लोलुपं वशमस्माकं करिष्यामो नियन्त्रितम् ॥ ४९ | हे महातेजस्विन्! जिस प्रकारसे आपको भय न हो, हम वैसा ही करेंगी। उस मुनिको लुभानेके लिये हम नृत्य, गीत और विहार करेंगी। हे विभो! कटाक्षों और अंगोंकी विविध भंगिमाओंसे मुनिको मोहित करके उन्हें लोलुप, अपने वशीभूत तथा नियन्त्रणमें कर लेंगी ॥ ४८-४९ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याभाष्य हरिं नार्यो ययुस्त्रिशिरसोऽन्तिकम् ।<br>कुर्वन्त्यो विविधान्भावान्कामशास्त्रोचितानपि ॥ ५० | व्यासजी बोले—इन्द्रसे ऐसा कहकर वे अप्सराएँ त्रिशिराके समीप गयीं और कामशास्त्रमें कहे गये विभिन्न प्रकारके हाव-भावका प्रदर्शन करने लगीं ॥ ५० ॥ |
| गायन्त्यस्तालभेदैस्ता नृत्यन्त्यः पुरतो मुनेः ।<br>तं प्रलोभयितुं चक्रुर्नानाभावान्वराङ्गनाः ॥ ५१ | वे अप्सराएँ मुनिके सम्मुख अनेक प्रकारके तालोंमें गाती और नाचती हुई उन्हें मोहित करनेके लिये विविध प्रकारके हाव-भाव करती थीं ॥ ५१ ॥ |
| नापश्यत्स तपोराशिरङ्गनानां विडम्बनम् ।<br>इन्द्रियाणि वशे कृत्वा मूकान्धबधिरः स्थितः ॥ ५२ | किंतु उन तपस्वीने अप्सराओंकी चेष्टाको देखातक नहीं और इन्द्रियोंको वशमें करके वे गूँगे, अन्धे और बहरेकी तरह बैठे रहे ॥ ५२ ॥ |
| दिनानि कतिचित्तस्थुर्नार्यस्तस्याश्रमे वरे ।<br>कुर्वन्त्यो गाननृत्यादिप्रपञ्चानतिमोहदान् ॥ ५३ | वे अप्सराएँ गान, नृत्य आदि मोहित करनेवाले प्रपंच करती हुई कुछ दिनोंतक उनके श्रेष्ठ आश्रममें रहीं ॥ ५३ ॥ |
| न चचाल यदा कामं ध्यानाच्च त्रिशिरा मुनिः ।<br>परावृत्य तदा देव्यः पुनः शक्रमुपस्थिताः ॥ ५४ | जब उनकी कामचेष्टाओंसे मुनि त्रिशिराका ध्यान विचलित नहीं हुआ, तब वे अप्सराएँ पुनः लौटकर इन्द्रके सम्मुख उपस्थित हुईं ॥ ५४ ॥ |
| कृताञ्जलिपुटाः सर्वा देवराजमथाब्रुवन् ।<br>श्रान्ता दीना भयत्रस्ता विवर्णवदना भृशम् ॥ ५५ | अत्यन्त थकी हुई, दीन अवस्थावाली, भयभीत और उदास मुखवाली उन सबने हाथ जोड़कर देवराजसे इस प्रकार कहा— ॥ ५५ ॥ |
| ७२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |
| देवदेव महाराज यत्नश्च परमः कृतः।<br>न स शक्यो दुराधर्षो धैर्याच्चालयितुं विभो॥ ५६ | हे देवदेव! हे महाराज! हे विभो! हमने महान् प्रयत्न किया, परंतु हम उस दुर्धर्ष मुनिको धैर्यसे विचलित करनेमें समर्थ नहीं हो पायीं॥ ५६॥ | | उपायोऽन्यः प्रकर्तव्यः सर्वथा पाकशासन।<br>नास्माकं बलमेतस्मिंस्तापसे विजितेन्द्रिये॥ ५७ | हे पाकशासन! आपको कोई दूसरा ही उपाय करना चाहिये, उन जितेन्द्रिय तपस्वीपर हमारा कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ सकता॥ ५७॥ | | दिष्ट्या वयं न शप्ताः स्म यदनेन महात्मना।<br>मुनिना वह्नितुल्येन तपसा द्योतितेन हि॥ ५८ | हमारा बड़ा भाग्य है कि तपस्यासे अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले उन महात्मा मुनिने हमें शाप नहीं दिया॥ ५८॥ | | विसृज्याप्सरसः शक्रश्चिन्तयामास मन्दधीः।<br>तस्यैव च वधोपायं पापबुद्धिरसाम्प्रतम्॥ ५९ | अप्सराओंको विदा करके क्षुद्रबुद्धि तथा पापबुद्धि इन्द्र उसके ही वधका अनुचित उपाय सोचने लगे॥ ५९॥ | | विसृज्य लोक लज्जां स तथा पापभयं भृशम्।<br>चकार पापबुद्धिं तु तद्वधाय महीपते॥ ६० | हे राजन्! लोक-लज्जा और महान् पापके भयको छोड़कर उन्होंने उसके वधके लिये अपनी बुद्धिको पापमय बना दिया॥ ६०॥ |
<div align="center">इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
त्रिशिरसस्तपोभङ्गार्थं देवराजेन्द्रद्वारा नानोपायचिन्तनवर्णनं
नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
### अथ द्वितीयोऽध्यायः
**इन्द्रद्वारा त्रिशिराका वध, क्रुद्ध त्वष्टाद्वारा अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे**
**हवन करके वृत्रासुरको उत्पन्न करना और उसे**
**इन्द्रके वधके लिये प्रेरित करना**
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| अथ स लोभमुपेत्य सुराधिपः<br>समधिगम्य गजासनसंस्थितः।<br>त्रिशिरसं प्रति दुष्टमतिस्तदा<br>मुनिमपश्यदमयपराक्रमम् ॥ १ | व्यासजी बोले—इस प्रकार लोभके वशीभूत होकर पापबुद्धि देवराज इन्द्रने ऐरावत हाथीपर सवार हो त्रिशिराके पास जाकर उस अमेय पराक्रमवाले मुनिको देखा॥ १॥ |
| तमभिवीक्ष्य दृढासनसंस्थितं<br>जितगिरं सुसमाधिवशं गतम्।<br>रविविभावसुसन्निभमोजसा<br>सुरपतिः परमापदमभ्यगात् ॥ २ | उसे दृढ़ आसनपर बैठे, वाणीको वशमें किये, पूर्ण समाधिमें स्थित और सूर्य तथा अग्निके समान तेजस्वी देखकर देवराज इन्द्र बहुत दुःखित हुए॥ २॥ |
| कथमसौ विनिहन्तुमहो मया<br>मुनिरपापमतिः किल सम्मतः।<br>रिपुरयं सुसमिद्धतपोबलः<br>कथमुपेक्ष्य इहासनकामुकः ॥ ३ | यह मुनि निष्पापबुद्धि है; इसे मारनेमें मैं कैसे समर्थ हो सकूँगा? तपोबलसे अत्यन्त समृद्ध तथा मेरा आसन प्राप्त करनेकी इच्छावाले इस शत्रु की उपेक्षा भी कैसे करूँ—ऐसा सोचकर देवसंघके |
| अ० २ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इति विचिन्त्य पविं परमायुधं<br>प्रति मुमोच मुनिं तपसि स्थितम्।<br>शशिदिवाकरसन्निभमाशुगं<br>त्रिशिरसं सुरसङ्घपतिः स्वयम्॥ ४ | स्वामी इन्द्रने अपने तीव्रगामी तथा श्रेष्ठ आयुध वज्रको सूर्य-चन्द्रमाके समान तेजस्वी, तपमें स्थित मुनि त्रिशिराके ऊपर चला दिया॥ ३-४॥ |
| तदभिघातहतः स धरातले<br>किल पपात ममार च तापसः।<br>शिखरिणः शिखरं कुलिशार्दितं<br>निपतितं भुवि चाद्भुतदर्शनम्॥ ५ | उसके प्रहारसे घायल होकर वे तपस्वी उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़े और निष्प्राण हो गये, जैसे वज्रसे विदीर्ण होकर पर्वतोंके शिखर पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं; यह घटना देखनेमें बड़ी अद्भुत थी॥ ५॥ |
| तं निहत्य मुदमाप सुरेश-<br>श्चुक्रुशुश्च मुनयस्तु संस्थिताः।<br>हा हतेति भृशमार्तनिस्वनाः<br>किं कृतं शतमखेन पापिना॥ ६ | उनको मारकर इन्द्र प्रसन्न हो गये, परंतु वहाँ स्थित अन्य मुनिगण आर्तस्वरमें चिल्लाने लगे कि हाय! हाय! सौ यज्ञ करनेवाले पापी इन्द्रने यह क्या कर डाला!॥ ६॥ |
| विनापराधं तपसां निधिर्हतः<br>शचीपतिः पापमतिर्दुरात्मा।<br>फलं किलायं तरसा कृतस्य<br>प्राप्नोतु पापी हननोद्भवस्य॥ ७ | पापबुद्धि और दुष्टात्मा शचीपति इन्द्रने इस निरपराध तपोनिधिको मार डाला। इस हत्याजनित पापका फल यह पापी अब शीघ्र ही प्राप्त करे॥ ७॥ |
| तं निहत्य तरसा सुरराजो<br>निजगाम निजमन्दिरमाशु।<br>स हतोऽपि विरराज महात्मा<br>जीवमान इव तेजसां निधिः॥ ८ | उन्हें मारकर देवराज तुरंत ही अपने भवनको जानेके लिये उद्यत हुए। तेजके निधि वे महात्मा (त्रिशिरा) मर जानेपर भी जीवितकी भाँति प्रतीत होते थे॥ ८॥ |
| तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ जीवन्तमिव वृत्रहा।<br>चिन्तामापातिखिन्नाङ्गः किं वा जीवेदयं पुनः॥ ९ | उसे जीवितकी भाँति भूमिपर गिरा हुआ देखकर अति उदास मनवाले वे वृत्रहन्ता इन्द्र इस चिन्तामें पड़ गये कि कहीं यह फिर जीवित न हो जाय॥ ९॥ |
| विमृश्य मनसातीव तक्षाणं पुरतः स्थितम्।<br>मघवा वीक्ष्य तं प्राह स्वकार्यसदृशं वचः॥ १० | मनमें बहुत देरतक विचार करनेके बाद इन्द्रने सामने खड़े तक्षा (बढ़ई)-को देखकर अपने कार्यके अनुरूप बात कही॥ १०॥ |
| तक्षंश्छिन्धि शिरांस्यस्य कुरुष्व वचनं मम।<br>मा जीवतु महातेजा भाति जीवन्निव स्वयम्॥ ११<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्य तक्षोवाच विगर्हयन्। | हे तक्षन्! मेरा कहा हुआ करो; इसके सिर काट लो, जिससे यह जीवित न रहे। यह महातेजस्वी जीवित न होते हुए भी जीवितकी भाँति प्रतीत होता है। उनकी यह बात सुनकर तक्षाने धिक्कारते हुए कहा—॥ ११ १/२॥ |
| तक्षोवाच<br>महास्कन्धो भृशं भाति परशुर्न तरिष्यति॥ १२<br>ततो नाहं करिष्यामि कार्यमेतद्विगर्हितम्।<br>त्वया वै निन्दितं कर्म कृतं सद्भिर्विगर्हितम्॥ १३<br>अहं बिभेमि पापाद्वै मृतस्यैव च मारणे।<br>मृतोऽयं मुनिरस्त्येव शिरसः कृन्तनेन किम्॥ १४<br>भयं किं तेऽत्र सञ्जातं पाकशासन कथ्यताम्। | तक्षा बोला— ये अति विशाल कन्धेवाले प्रतीत हो रहे हैं। मेरा परशु इस कन्धेको काट नहीं सकेगा। अतः मैं इस निन्दनीय कार्यको नहीं करूँगा, आपने तो निन्दित और सत्पुरुषोंद्वारा गर्हित कर्म कर डाला है, मैं पापसे डरता हूँ; फिर मरे हुएको क्यों मारूँ? ये मुनि तो मर गये हैं, फिर इनका सिर काटनेसे क्या प्रयोजन? हे पाकशासन! कहिये, इनसे आपको क्या भय उत्पन्न हुआ है?॥ १२-१४ १/२॥ |
| ७३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
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| इन्द्र उवाच<br>सजीव इव देहोऽयमाभाति विशदाकृतिः॥ १५<br>तस्माद् बिभेमि मा जीवेन्मुनिः शत्रुरयं मम। | **इन्द्र बोले—**यह निर्मल आकृतिवाली देह सजीवकी भाँति दिखायी देती है। यह मेरा शत्रु मुनि पुनः न जीवित हो जाय, इसलिये मैं डरता हूँ॥ १५ १/२॥ | | तक्षोवाच<br>नात्र किं त्रपसे विद्वन् क्रूरेणानेन कर्मणा॥ १६<br>ऋषिपुत्रमिमं हत्वा ब्रह्महत्याभयं न किम्। | **तक्षा बोला—**हे विद्वन्! क्या इस क्रूर कर्मको करते हुए आपको लज्जा नहीं आती? इस ऋषिपुत्रको मारकर क्या आपको ब्रह्महत्याका भय नहीं है?॥ १६ १/२॥ | | इन्द्र उवाच<br>प्रायश्चित्तं करिष्यामि पश्चात्तापक्षयाय वै॥ १७<br>शत्रुस्तु सर्वथा वध्यश्छलेनापि महामते। | **इन्द्र बोले—**मैं बादमें पापके नष्ट होनेके लिये प्रायश्चित्त कर लूँगा। हे महामते! शत्रुको तो सब प्रकारसे छलके द्वारा भी मार देना चाहिये॥ १७ १/२॥ | | तक्षोवाच<br>त्वं लोभाभिहतः पापं करोषि मघवन्निह॥ १८<br>तं विनाहं कथं पापं करोमि वद मे विभो। | **तक्षा बोला—**हे इन्द्र! आप लोभके वशीभूत होकर पाप कर रहे हैं। हे विभो! बतायें, मैं उसके बिना पाप क्यों करूँ?॥ १८ १/२॥ | | इन्द्र उवाच<br>मखेषु खलु भागं ते करिष्यामि सदैव हि॥ १९<br>शिरः पशोस्तु ते भागं यज्ञे दास्यन्ति मानवाः।<br>शुल्कनानेन छिन्धि त्वं शिरांस्यस्य कुरु प्रियम्॥ २० | **इन्द्र बोले—**मैं सदैवके लिये तुम्हारे यज्ञभागकी व्यवस्था कर दूँगा। मनुष्य यज्ञभागके रूपमें पशुका सिर तुम्हें देंगे। इस शुल्कके बदलेमें तुम इसके सिर काट दो और मेरा प्रिय कार्य कर दो॥ १९-२०॥ | | व्यास उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा महेन्द्रस्य वचस्तक्षा मुदान्वितः।<br>कुठारेण शिरांस्यस्य चकर्त सुदृढेन हि॥ २१ | **व्यासजी बोले—**देवराज इन्द्रका यह वचन सुनकर प्रसन्न हो बढ़ईने अपने सुदृढ़ कुठारसे उसके सिर काट डाले॥ २१॥ | | छिन्नानि त्रीणि शीर्षाणि पतितानि यदा भुवि।<br>तेभ्यस्तु पक्षिणः क्षिप्रं विनिष्पेतुः सहस्रशः॥ २२<br>कलविङ्कास्तित्तिरयस्तथैव च कपिञ्जलाः।<br>पृथक्पृथग्विनिष्पेतर्मुखतस्तरसा तदा॥ २३ | कटे हुए तीनों सिर जब भूमिपर गिरे तब उनमेंसे हजारों पक्षी शीघ्रतापूर्वक निकल पड़े। तब गौरैया, तित्तिर और कपिंजल पक्षी शीघ्रतापूर्वक उसके अलग-अलग मुखोंसे निकले॥ २२-२३॥ | | येन वेदानधीते स्म सोमं च पिबते तथा।<br>तस्माद्वक्त्रात्किलोत्पेतुः सद्य एव कपिञ्जलाः॥ २४<br>येन सर्वा दिशः कामं पिबन्निव निरीक्षते।<br>तस्मात्तु तित्तिरास्तत्र निःसृतास्तिग्मतेजसः॥ २५<br>यत्सुरापं तु तद्वक्त्रं तस्मात्तु चटकाः किल।<br>विनिष्पेतुस्त्रिशिरस एवं ते विहगा नृप॥ २६ | जिस मुखसे वह वेदपाठ और सोमपान करता था, उस मुखसे तत्काल बहुत-से कपिंजल पक्षी निकले; जिससे वह सभी दिशाओंका निरीक्षण करता था, उससे अत्यन्त तेजस्वी तित्तिर निकले और हे राजन्! जिससे वह मधुपान करता था, उस मुखसे गौरैया पक्षी निकले। इस प्रकार त्रिशिरासे वे पक्षी निकले॥ २४—२६॥ | | एवं विनिःसृतान्दृष्ट्वा तेभ्यः शक्रस्तदाण्डजान्।<br>मुमोद मनसा राजन् जगाम त्रिदिवं पुनः॥ २७ | हे राजन्! इस प्रकार उन मुखोंसे पक्षियोंको निकला हुआ देखकर इन्द्रके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे पुनः स्वर्गको चल दिये॥ २७॥ | | गते शक्रे तु तक्षापि स्वगृहं तरसा ययौ।<br>यज्ञभागं परं लब्ध्वा मुदमाप महीपते॥ २८ | हे पृथिवीपते! इन्द्रके चले जानेपर तक्षा भी शीघ्र ही अपने घर चल दिया। श्रेष्ठ यज्ञभाग पाकर वह बहुत प्रसन्न था॥ २८॥ | | इन्द्रोऽथ स्वगृहं गत्वा हत्वा शत्रुं महाबलम्।<br>मेने कृतार्थमात्मानं ब्रह्महत्यामचिन्तयन्॥ २९ | इन्द्रने भी अपने महाबली शत्रुको मारकर अपने भवन जा करके ब्रह्महत्याकी चिन्ता न करते हुए अपनेको कृतकृत्य मान लिया॥ २९॥ |
अ० २ ] षष्ठ स्कन्ध ७३१
अ० २ ] षष्ठ स्कन्ध ७३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं श्रुत्वा निहतं त्वष्टा पुत्रं परमधार्मिकम्।<br>चुकोपातीव मनसा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ३० | उस परम धार्मिक पुत्रको मारा गया सुनकर त्वष्टाने मनमें अत्यन्त क्रोधित हो यह वचन कहा— |
| अनागसं मुनिं यस्मात्पुत्रं निहतवान्मम।<br>तस्मादुत्पादयिष्यामि तद्वधार्थं सुतं पुनः॥ ३१ | जिसने मेरे निरपराध मुनिवृत्तिवाले पुत्रको मार डाला है, उसके वधके लिये मैं पुनः पुत्र उत्पन्न करूँगा। देवतालोग मेरे पराक्रम और तपोबलको देख लें; वह पापात्मा भी अपनी करनीका महान् फल जान ले॥ ३०—३२॥ |
| सुराः पश्यन्तु मे वीर्यं तपसश्च बलं तथा।<br>जानातु सर्व पापात्मा स्वकृतस्य फलं महत्॥ ३२ | |
| इत्युक्त्वाग्निं जुहावाथ मन्त्रैराथर्वणोदितैः।<br>पुत्रस्योत्पादनार्थाय त्वष्टा क्रोधसमाकुलः॥ ३३ | ऐसा कहकर क्रोधसे अत्यन्त व्याकुल त्वष्टा पुत्रकी उत्पत्तिके लिये अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे अग्निमें हवन करने लगे॥ ३३॥ |
| कृते होमेऽष्टरात्रं तु सन्दीप्ताच्च विभावसौ।<br>प्रादुर्बभूव तरसा पुरुषः पावकोपमः॥ ३४ | आठ रात्रियोंतक प्रज्वलित अग्निमें हवन करनेपर सहसा अग्निसदृश एक पुरुष प्रकट हुआ॥ ३४॥ |
| तं दृष्ट्वाग्रे सुतं त्वष्टा तेजोबलसमन्वितम्।<br>वेगात्प्रकटितं वह्नेर्दीप्यमानमिवानलम्॥ ३५ | वेगपूर्वक अग्निसे प्रकट हुए और अग्निके सदृश प्रकाशमान तथा तेज-बलसे युक्त उस पुत्रको अपने सम्मुख देखकर त्वष्टाने कहा—हे इन्द्रशत्रु! मेरे तपोबलसे तुम शीघ्र बढ़ जाओ॥ ३५-३६॥ |
| उवाच वचनं त्वष्टा सुतं वीक्ष्य पुरःस्थितम्।<br>इन्द्रशत्रो विवर्धस्व प्रतापात्तपसो मम॥ ३६ | |
| इत्युक्ते वचने त्वष्ट्रा क्रोधप्रज्वलितेन च।<br>सोऽवर्धत दिवं स्तब्ध्वा वैश्वानरसमद्युतिः॥ ३७ | क्रोधसे जाज्वल्यमान त्वष्टाके ऐसा कहते ही अग्निके समान कान्तिवाला वह पुत्र द्युलोकको स्तब्ध करता हुआ बड़ा होने लगा॥ ३७॥ |
| जातः स पर्वताकारः कालमृत्युसमः स्वराट्।<br>किं करोमीति तं प्राह पितरं परमातुरम्॥ ३८ | बढ़ते-बढ़ते वह पर्वताकार विशाल और काल पुरुषके समान भयानक हो गया। उसने अत्यन्त दुःखित अपने पितासे कहा—मैं क्या करूँ? हे नाथ! मेरा नामकरण कीजिये। हे सुव्रत! मुझे कार्य बताइये, आप चिन्तित क्यों हैं? मुझे अपने दुःखका कारण बताइये। मैं आज ही आपके शोकका नाश कर दूँगा—ऐसा मेरा दृढ़ संकल्प है। जिस पुत्रके रहते पिता दुःखी हो, उस पुत्रसे क्या लाभ! मैं शीघ्र ही समुद्रको पी जाऊँगा, पर्वतोंको चूर-चूर कर दूँगा और उगते हुए प्रचण्ड तेजस्वी सूर्यको रोक दूँगा। मैं देवताओंसहित इन्द्रको तथा यमको अथवा अन्य किसी भी देवताको मार डालूँगा। इन सबको तथा पृथिवीको भी उखाड़कर समुद्रमें फेंक दूँगा॥ ३८—४२॥ |
| कुरु मे नामकं नाथ कार्यं कथय सुव्रत।<br>चिन्तातुरोऽसि कस्मात्त्वं ब्रूहि मे शोककारणम्॥ ३९ | |
| नाशयाम्यद्य ते शोकमिति मे व्रतमाहितम्।<br>तेन जातेन किं भूयः पिता भवति दुःखितः॥ ४० | |
| पिबामि सागरं सद्यश्चूर्णयामि धराधरान्।<br>उद्यन्तं वारयाम्यद्य तरणिं तिग्मतेजसम्॥ ४१ | |
| हन्मीन्द्रं ससुरं सद्यो यमं वा देवतान्तरम्।<br>क्षिपामि सागरे सर्वान्समुत्पाट्य च मेदिनीम्॥ ४२ | |
| इत्याकर्ण्य वचस्तस्य त्वष्टा पुत्रस्य पेशलम्।<br>प्रत्युवाचातिमुदितस्तं सुतं पर्वतोपमम्॥ ४३ | उसका यह प्रिय वचन सुनकर त्वष्टाने प्रसन्न हो पर्वतके समान विशाल उस पुत्रसे कहा—॥ ४३॥ |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| वृजिनात्रातुमधुना यस्माच्छक्तोऽसि पुत्रक।<br>तस्माद् वृत्र इति ख्यातं तव नाम भविष्यति॥ ४४<br>भ्राता तव महाभाग त्रिशिरा नाम तापसः।<br>त्रीणि तस्य च शीर्षाणि ह्यभवन्वीर्यवन्ति च॥ ४५<br>वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः सर्वविद्याविशारदः।<br>संस्थितस्तपसि प्रायस्त्रिलोकीविस्मयप्रदे॥ ४६<br>शक्रेण तु हतः सोऽद्य वज्रघातेन साम्प्रतम्।<br>विनापराधं सहसा छिन्नानि मस्तकानि च॥ ४७<br>तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र जहि शक्रं कृतागसम्।<br>ब्रह्महत्यायुतं पापं निस्त्रपं दुर्मतिं शठम्॥ ४८ | हे पुत्र! तुम अभी वृजिन (कष्ट)-से त्राण दिलानेमें समर्थ हो, इसलिये तुम्हारा ‘वृत्र’—यह नाम प्रसिद्ध होगा। हे महाभाग! तुम्हारा त्रिशिरा नामका एक तपस्वी भाई था। उसके अत्यन्त शक्तिशाली तीन सिर थे। वह वेद-वेदांगोंके तत्त्वको जाननेवाला, सभी विद्याओंमें निपुण और तीनों लोकोंको आश्चर्यमें डाल देनेवाली तपस्यामें रत था। इन्द्रने वज्रका प्रहार करके उस निरपराधको मार डाला और उसके मस्तक काट डाले। इसलिये हे पुरुषसिंह! तुम उस ब्रह्म-हत्यारे, पापी, निर्लज्ज, दुष्टबुद्धि तथा मूर्ख इन्द्रको मार डालो॥ ४४-४८॥ |
| इत्युक्त्वा च तदा त्वष्टा पुत्रशोकसमाकुलः।<br>आयुधानि च दिव्यानि चकार विविधानि च॥ ४९<br>ददावस्मै सहस्राक्षवधाय प्रबलानि च।<br>खड्गशूलगदाशक्तितोमरप्रमुखानि वै॥ ५०<br>शार्ङ्गं धनुस्तथा बाणं परिघं पट्टिशं तथा।<br>चक्रं दिव्यं सहस्रारं सुदर्शनसमप्रभम्॥ ५१<br>तूणीरौ चाक्षयौ दिव्यौ कवचं चातिसुन्दरम्।<br>रथं मेघप्रतीकाशं दृढं भारसहं जवम्॥ ५२<br>युद्धोपकरणं सर्वं कृत्वा पुत्राय पार्थिव।<br>दत्त्वासौ प्रेरयामास त्वष्टा क्रोधसमन्वितः॥ ५३ | ऐसा कहकर पुत्रशोकसे व्याकुल त्वष्टाने विविध प्रकारके दिव्य तथा प्रबल आयुधोंका निर्माण किया और इन्द्रका वध करनेके लिये उस महाबली (वृत्र)-को दे दिया। उनमें खड्ग, शूल, गदा, शक्ति, तोमर, शार्ङ्गधनुष, बाण, परिघ, पट्टिश, सुदर्शन चक्रके समान कान्तिमान् हजार अरोंवाला दिव्य चक्र, दो दिव्य तथा अक्षय तरकस और अत्यन्त सुन्दर कवच एवं मेघके समान श्याम आभावाला, सुदृढ़, भार सहनेमें समर्थ और तीव्रगामी रथ था। इस प्रकार हे राजन्! समस्त युद्धसामग्री तैयार करके क्रोधसे व्याकुल त्वष्टाने अपने पुत्रको देकर उसे भेज दिया॥ ४९-५३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे त्रिशिरवधानन्तरं वृत्रोत्पत्तिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
वृत्रासुरका देवलोकपर आक्रमण, बृहस्पतिद्वारा इन्द्रकी भर्त्सना करना और वृत्रासुरको अजेय बतलाना, इन्द्रकी पराजय, त्वष्टाके निर्देशसे वृत्रासुरका ब्रह्माजीको प्रसन्न करनेके लिये तपस्यारत होना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| कृतस्वस्त्ययनो वृत्रो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।<br>निर्जगाम रथारूढो हन्तुं शक्रं महाबलः॥ १ | [हे राजन्!] वेदोंमें पारंगत ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर महाबली वृत्रासुर रथपर सवार हो इन्द्रको मारनेके लिये चला॥ १॥ |
| तदैव राक्षसाः क्रूराः पुरा देवपराजिताः।<br>समाजग्मुश्च सेवार्थं वृत्रं ज्ञात्वा महाबलम्॥ २ | उस समय बहुत-से क्रूर राक्षस जो पहले देवताओंसे पराजित हो गये थे, वृत्रासुरको महान् बलशाली जानकर उसकी सेवाके लिये आ गये॥ २॥ |
| अ० ३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन्द्रदूतास्तु तं दृष्ट्वा युद्धाय तु समागतम्।<br>वेगादागत्य वृत्तान्तं शशंसुस्तस्य चेष्टितम्॥ ३<br><br>दूता ऊचुः<br>स्वामिञ्छीघ्रमिहायाति वृत्रो नाम रिपुस्तव।<br>बलवान्स्यन्दने रूढस्त्वष्ट्रा चोत्पादितः किल॥ ४<br><br>अभिचारेण नाशार्थं तव क्रोधान्वितेन वै।<br>पुत्रघाताभितप्तेन दुःसहो राक्षसैर्युतः॥ ५ | इन्द्रके दूत उसे युद्धके लिये आया देखकर शीघ्रतापूर्वक [इन्द्रके पास] आकर सम्पूर्ण वृत्तान्त और उसकी गतिविधि बताने लगे॥ ३॥<br><br>दूत बोले— हे स्वामिन्! वृत्र नामका आपका बलवान् और दुर्धर्ष शत्रु रथपर आरूढ़ होकर राक्षसोंके साथ शीघ्र ही यहाँ आ रहा है; पुत्रशोकसे सन्तप्त और क्रोधाभिभूत त्वष्टाने आपके नाशके लिये अभिचारकर्मसे उसे उत्पन्न किया है॥ ४-५॥ |
| यतं कुरु महाभाग शीघ्रमायाति साम्प्रतम्।<br>मेरुमन्दरसंकाशो घोरशब्दोऽतिदारुणः॥ ६<br><br>एतस्मिन्नन्तरे तत्र भीता देवगणा भृशम्।<br>आगत्योचुः सुरपतिं शृण्वन्तं दूतभाषितम्॥ ७ | हे महाभाग! शीघ्र ही [रक्षाका] उपाय कीजिये। सुमेरु और मन्दराचलके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होनेवाला वह (वृत्रासुर) घोर गर्जन करता हुआ अब शीघ्र यहाँ आ रहा है॥ ६॥<br><br>इसी बीच अत्यन्त भयभीत देवगण वहाँ आ करके दूतोंकी बात सुन रहे देवराज इन्द्रसे इस प्रकार कहने लगे॥ ७॥ |
| गणा ऊचुः<br>मघवन् दुर्निमित्तानि भवन्ति त्रिदशालये।<br>बहूनि भयशंसीनि पक्षिणां विरुतानि च॥ ८<br><br>काकगृध्रास्तथा श्येनाः कङ्काद्या दारुणाः खगाः।<br>रुदन्ति विकृतैः शब्दैरुत्कोरैर्भवनेनोपरि॥ ९<br><br>चीचीकूचीति निनदान्कुर्वन्ति विहगा भृशम्।<br>वाहनानां च नेत्रेभ्यो जलधाराः पतन्त्यधः॥ १०<br><br>श्रूयतेऽतिमहाञ्छब्दो रुदतीनां निशासु च।<br>राक्षसीनां महाभाग भवनोपरि दारुणः॥ ११<br><br>प्रपतन्ति ध्वजास्तूर्णं विना वातेन मानद।<br>प्रभवन्ति महोत्पाता दिवि भूम्यन्तरिक्षजाः॥ १२<br><br>कृष्णाम्बरधरा नार्यो भ्रमन्ति च गृहे गृहे।<br>यान्तु यान्तु गृहात्तूर्णं कुर्वन्त्यो विकृताननाः॥ १३<br><br>रात्रौ स्वप्नेषु कान्तानां सुप्तानां निजमन्दिरे।<br>केशाँल्लुनन्ति राक्षस्यो भीषयन्त्यो भृशातुराः॥ १४ | गण बोले— हे इन्द्र! इस समय स्वर्गमें अनेक प्रकारके अपशकुन हो रहे हैं। पक्षियोंके बहुत ही डरावने शब्द हो रहे हैं। कौए, गिद्ध, बाज और चील आदि क्रूर पक्षी भवनोंके ऊपर बैठकर भयानक स्वरोंमें रोते हैं और अन्य पक्षी भी बार-बार चीची-कूची—ऐसे शब्द कर रहे हैं। [हाथी, घोड़े आदि] वाहनोंकी आँखोंसे लगातार जल (अश्रु)-की धाराएँ नीचे गिर रही हैं। हे महाभाग! भवनोंके ऊपरी भागमें रातमें रोती हुई राक्षसियोंका महाभयानक शब्द सुनायी देता है। हे मानद! हवाके बिना ही ध्वजाएँ टूट-टूटकर गिर पड़ती हैं। स्वर्ग, पृथ्वी और आकाशमें महान् उत्पात हो रहे हैं। काले वस्त्र धारण की हुई भयानक मुखवाली स्त्रियाँ ‘निकल जाओ; घरसे शीघ्र निकल जाओ’—ऐसा कहती हुई घर-घरमें घूमती हैं। रातमें अपने घरमें सोयी हुई स्त्रियोंको भयभीत करती हुई भयानक राक्षसियाँ स्वप्नोंमें उनके बाल नोचती हैं॥ ८—१४॥ |
| एवंविधानि देवेश भूकम्पोल्कादयस्तथा।<br>गोमायवो रुदन्ति स्म निशायां भवनाङ्गणे॥ १५<br><br>सरटानां च जालानि प्रभवन्ति गृहे गृहे।<br>अङ्गप्रस्फुरणादीनि दुर्निमित्तानि सर्वशः॥ १६ | हे देवेन्द्र! इसी प्रकार भूकम्प और उल्कापात आदि उपद्रव भी हो रहे हैं, रात्रिमें हमारे भवनोंके आँगनमें सियार रुदन करते हैं। गिरगिटोंके समूह घर-घरमें उत्पन्न हो रहे हैं, सर्वथा अनिष्टके सूचक अंग-प्रस्फुरण आदि भी होते हैं॥ १५-१६॥ |
| ७३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा चिन्तामाप सुरेश्वरः ।<br>बृहस्पतिं समाहूय पप्रच्छ च मनोगतम् ॥ १७ | व्यासजी बोले—उन लोगोंका यह वचन सुनकर इन्द्र चिन्तित हो उठे और बृहस्पतिको बुलाकर उन्होंने अपनी मनोगत बात पूछी॥ १७॥ |
| इन्द्र उवाच<br>ब्रह्मन् किमुत घोराणि निमित्तानि भवन्ति वै ।<br>वाताश्च दारुणा वान्ति प्रपतन्त्युल्काः खतः ॥ १८<br>सर्वज्ञोऽसि महाभाग समर्थो विघ्ननाशने ।<br>बुद्धिमाञ्छास्त्रतत्त्वज्ञो देवतानां गुरुस्तथा ॥ १९<br>कुरु शान्तिं विधानज्ञ शत्रुक्षयविधायिनीम् ।<br>यथा मे न भवेद्दुःखं तथा कार्यं विधीयताम् ॥ २० | इन्द्र बोले—हे ब्रह्मन्! ये भयानक अपशकुन क्यों हो रहे हैं? भयानक आँधियाँ चलती हैं और आकाशसे उल्कापात होते हैं। हे महाभाग! आप सर्वज्ञ, विघ्नका नाश करनेमें समर्थ, बुद्धिमान्, शास्त्रोंके तत्त्वोंको जाननेवाले और देवताओंके गुरु हैं। इसलिये हे विधानज्ञ! आप हमारी शान्तिके लिये शत्रुओंका नाश करनेवाला कोई शान्तिकर्म कीजिये। जिस प्रकार मुझे दुःख न हो, आप वैसा कार्य कीजिये॥ १८—२०॥ |
| बृहस्पतिरुवाच<br>किं करोमि सहस्राक्ष त्वयाद्य दुष्कृतं कृतम् ।<br>अनागसं मुनिं हत्वा किं फलं समुपार्जितम् ॥ २१ | बृहस्पति बोले—हे सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र! मैं क्या करूँ? तुमने बहुत बड़ा पाप कर डाला है। निरपराध मुनिको मारकर तुमने क्या लाभ प्राप्त कर लिया?॥ २१॥ |
| अत्युग्रं पुण्यपापानां फलं भवति सत्वरम् ।<br>विचार्य खलु कर्तव्यं कार्यं तद्भूतिमिच्छता ॥ २२<br>परोपतापनं कर्म न कर्तव्यं कदाचन ।<br>न सुखं विन्दते प्राणी परपीडापरायणः ॥ २३ | पुण्य और पापका अत्यन्त उग्र फल शीघ्र ही प्राप्त होता है, इसलिये ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवालोंको विचारपूर्वक कार्य करना चाहिये। दूसरेको कष्ट पहुँचानेका कृत्य कभी नहीं करना चाहिये। दूसरेको कष्ट देनेमें संलग्न प्राणी कभी सुख नहीं पाता॥ २२-२३॥ |
| मोहाल्लोभाद् ब्रह्महत्या कृता शक्र त्वयाधुना ।<br>तस्य पापस्य सहसा फलमेतदुपागतम् ॥ २४ | हे इन्द्र! तुमने मोह और लोभके वशीभूत होकर ब्रह्महत्या कर डाली, उसी पापका यह फल आज सहसा उपस्थित हो गया है॥ २४॥ |
| अवध्यः सर्वदेवानां जातोऽसौ वृत्रसंज्ञकः ।<br>हन्तुं त्वां स समायाति दानवैर्बहुभिर्वृतः ॥ २५ | वृत्र नामवाला यह असुर जन्मसे ही देवताओंसे अवध्य है; बहुत-से दानवोंसे घिरा हुआ वह तुम्हें मारनेके लिये चला आ रहा है॥ २५॥ |
| आयुधानि च सर्वाणि वज्रतुल्यानि वासव ।<br>त्वष्ट्रा दत्तानि दिव्यानि गृहीत्वा समुपस्थितः ॥ २६ | हे इन्द्र! त्वष्टाके द्वारा दिये हुए उन सभी वज्रतुल्य तथा दिव्य आयुधोंको लेकर वह उपस्थित हो रहा है॥ २६॥ |
| समागच्छति दुर्धर्षो रथारूढः प्रतापवान् ।<br>देवेन्द्र प्रलयं कुर्वन्नास्य मृत्युर्भविष्यति ॥ २७ | दुर्धर्ष तथा प्रतापी वह रथपर आरूढ़ होकर प्रलय मचाते हुए चला आ रहा है। हे देवेन्द्र! उसकी मृत्यु नहीं होगी॥ २७॥ |
| कोलाहलस्तदा जातस्तथा ब्रुवति वाक्पतौ ।<br>गन्धर्वाः किन्नरा यक्षा मुनयश्च तपोधनाः ॥ २८<br>सदनानि विहायैवामराः सर्वे पलायिताः ।<br>तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं शक्रश्चिन्तापरायणः ॥ २९ | बृहस्पति ऐसा कह ही रहे थे कि वहाँ कोलाहल मच गया। गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, मुनि, तपस्वी और सभी देवता अपने-अपने भवन छोड़कर भाग चले। उस महान् आश्चर्यको देखकर इन्द्र चिन्तित हो उठे॥ २८-२९॥ |
| अ० ३ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७३५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आज्ञापयामास तदा सेनोद्योगाय सेवकान्।<br>आनयध्वं वसून् रुद्रानश्विनौ च दिवाकरान् ॥ ३०<br>पूषणं च भगं वायुं कुबेरं वरुणं यमम्।<br>विमानेषु समारुह्य सायुधाः सुरसत्तमाः ॥ ३१<br>समागच्छन्तु तरसा शत्रुरायाति साम्प्रतम्।<br>इत्याज्ञाप्य सुरपतिः समारुह्य गजोत्तमम् ॥ ३२ | तब उन्होंने सेवकोंको सेना तैयार करनेका आदेश दिया। 'वसुओं, रुद्रों, अश्विनीकुमारों, आदित्यों, पूषा, भग, वायु, कुबेर, वरुण और यमको बुलाओ। सभी श्रेष्ठ देवता आयुधोंके साथ विमानोंपर आरूढ़ होकर यहाँ शीघ्र आ जायें; क्योंकि अब शत्रु आने ही वाला है'—ऐसी आज्ञा देकर देवराज अपने श्रेष्ठ गजराज ऐरावतपर सवार होकर बृहस्पतिको आगे करके अपने भवनसे बाहर निकले ॥ ३०—३२ १/२ ॥ |
| बृहस्पतिं पुरोधाय निर्गतो निजमन्दिरात्।<br>तथैव त्रिदशाः सर्वे स्वं स्वं वाहनमास्थिताः॥ ३३<br>युद्धाय कृतसंकल्पा निर्ययुः शस्त्रपाणयः।<br>वृत्रोऽथ दानवैर्युक्तः सम्प्राप्तो मानसोत्तरम् ॥ ३४<br>पर्वतं देवतावासं रम्यं पादपशोभितम्।<br>इन्द्रोऽप्यागत्य संग्रामं चकार मानसोत्तरे ॥ ३५ | वैसे ही अन्य सभी देवता भी हाथोंमें शस्त्र लेकर अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर युद्धका संकल्प करके चल पड़े। उधर वृत्रासुर भी विशाल दानवी सेनाके साथ वृक्षोंसे सुशोभित, रमणीय तथा देवताओंसे सेवित मानसरोवरके उत्तरवर्ती पर्वतपर आ गया। बृहस्पतिको आगे करके सभी देवताओंके साथ इन्द्रने भी उस मानसोत्तर पर्वतपर आकर संग्राम किया ॥ ३३—३५ १/२ ॥ |
| पर्वते देवतायुक्तो वाचस्पतिपुरःसरः।<br>तत्राभूद्दारुणं युद्धं वृत्रवासवयोस्तदा ॥ ३६<br>गदास परिघैः पाशैर्बाणैः शक्तिपरश्वधैः।<br>मानुषेण प्रमाणेन संग्रामः शरदां शतम् ॥ ३७ | तब गदा, तलवार, परिघ, पाश, बाण, शक्ति और परशु आदि युद्धास्त्रोंके द्वारा वृत्रासुर और इन्द्रमें भयानक युद्ध हुआ। मनुष्यों और विशुद्ध हृदयवाले ऋषियोंके लिये अत्यन्त भयकारी वह युद्ध मानववर्षकी गणनासे सौ वर्षोंतक चला ॥ ३६—३७ १/२ ॥ |
| बभूव भयदो नृणामृषीणां भावितात्मनाम्।<br>वरुणः प्रथमं भग्नस्ततो वायुगणः किल ॥ ३८<br>यमो विभावसुः शक्रः सर्वे ते निर्गता रणात्।<br>पलायनपरान्दृष्ट्वा देवानिन्द्रपुरोगमान् ॥ ३९<br>वृत्रोऽपि पितरं प्रागादाश्रमस्थं मुदान्वितम्।<br>प्रणम्य प्राह त्वष्टारं पितः कार्यं मया कृतम् ॥ ४० | उस युद्धमें सबसे पहले वरुण और उसके बाद मरुद्गण पलायन कर गये। इसी प्रकार यम, अग्नि, इन्द्र—जो भी थे वे सभी युद्धसे निकल भागे। इन्द्र आदि प्रमुख देवताओंको भागकर जाते देखकर वृत्रासुर भी प्रसन्नतापूर्वक आश्रमस्थित अपने पिताके पास गया और उन्हें प्रणाम करके बोला—हे पिताजी! मैंने [आपका] कार्य कर दिया ॥ ३८—४० ॥ |
| देवा विनिर्जिताः सर्वे सेन्द्राः समरसंस्थिताः।<br>विद्रुतास्ते गताः स्थानं यथा सिंहान्मृगा गजाः ॥ ४१<br>इन्द्रः पदातिरगमन्मयानीतो गजोत्तमः।<br>ऐरावतोऽयं भगवन् गृहाण द्विरदोत्तमम् ॥ ४२ | युद्धभूमिमें आये हुए इन्द्रसहित सभी देवता मुझसे पराजित हो गये। वे सब उसी प्रकार भयभीत होकर अपने स्थानोंको भाग गये, जैसे सिंहसे डरकर हाथी और मृग भाग जाते हैं। इन्द्र तो पैदल ही भाग गये; मैं हाथियोंमें श्रेष्ठ इस ऐरावतको ले आया हूँ। हे भगवन्! आप इस गजश्रेष्ठको ग्रहण करें ॥ ४१-४२ ॥ |
| न हतास्ते मया यस्मादयुक्तं भीतमारणम्।<br>आज्ञापय पुनस्तात किं करोमि तवेप्सितम् ॥ ४३ | मैंने उन सबको इसलिये नहीं मारा; क्योंकि डरे हुएको मारना अनुचित होता है। हे तात! आप पुनः आज्ञा कीजिये कि मैं आपका कौन-सा इच्छित कार्य करूँ? ॥ ४३ ॥ |
| ७३६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ | | :--- | :--- |
| निर्जरा निर्गताः सर्वे भयभीताः श्रमातुराः।<br>इन्द्रोऽप्यैरावतं त्यक्त्वा भयभीतः पलायितः॥ ४४ | सभी देवता भयभीत और युद्धश्रमसे क्लान्त होकर भाग गये; भयभीत इन्द्र भी ऐरावत छोड़कर भाग गया॥ ४४॥ | | व्यास उवाच<br>इति पुत्रवचः श्रुत्वा त्वष्टा प्राह मुदान्वितः।<br>पुत्रवानद्य जातोऽस्मि सफलं मम जीवितम्॥ ४५ | व्यासजी बोले— पुत्रका यह वचन सुनकर त्वष्टाने प्रसन्न होकर कहा—आज मैं पुत्रवान् हो गया हूँ; मेरा जीवन सफल हो गया॥ ४५॥ | | त्वयाहं पावितः पुत्र गतो मे मानसो ज्वरः।<br>निश्चलं मे मनो जातं दृष्ट्वा वीर्यं तवाद्भुतम्॥ ४६ | हे पुत्र! तुमने आज मुझे पवित्र कर दिया; मेरा मानसिक सन्ताप चला गया। तुम्हारे अद्भुत पराक्रमको देखकर मेरा मन शान्त हो गया॥ ४६॥ | | शृणु वक्ष्याम्यहं पुत्र हितं तेऽद्य निशामय।<br>तपः कुरु महाभाग सावधानः स्थिरासनः॥ ४७ | हे पुत्र! सुनो, अब मैं तुम्हारे हितकी बात कह रहा हूँ। हे महाभाग! अब तुम दृढ़तापूर्वक आसनपर बैठकर सावधान होकर तपस्या करो॥ ४७॥ | | विश्वासो नैव कर्तव्यः केषाञ्चित्पाकशासनः।<br>शत्रुस्ते छलकर्तास्ति नानाभेदविशारदः॥ ४८ | किसीका भी विश्वास मत करना। वह तुम्हारा शत्रु इन्द्र छल करनेवाला तथा अनेक प्रकारकी भेदनीतिमें निपुण है॥ ४८॥ | | तपसा प्राप्यते लक्ष्मीस्तपसा राज्यमुत्तमम्।<br>तपसा बलवृद्धिः स्यात्संग्रामे विजयस्तथा॥ ४९ | तपसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है, तपसे उत्तम राज्यकी प्राप्ति होती है। तपसे बलकी वृद्धि होती है और संग्राममें विजयकी प्राप्ति होती है॥ ४९॥ | | आराध्य द्रुहिणं देवं लब्ध्वा वरमनुत्तमम्।<br>जहि शक्रं दुराचारं ब्रह्महत्यासमावृतम्॥ ५० | भगवान् ब्रह्माकी आराधना करके उनसे उत्तम वर प्राप्तकर तुम उस दुराचारी और ब्राह्मणके हत्यारे इन्द्रको मार डालो॥ ५०॥ | | सावधानः स्थिरो भूत्वा दातारं भज शङ्करम्।<br>वाञ्छितं स वरं दद्यात्सन्तुष्टश्चतुराननः॥ ५१ | तुम सावधान और स्थिर होकर कल्याणकारी तथा वरदाता ब्रह्माजीकी आराधना करो। प्रसन्न होनेपर चार मुखवाले वे ब्रह्माजी तुम्हें अभीष्ट वरदान देंगे॥ ५१॥ | | तोषयित्वा विश्वयोनिं ब्रह्माणममितौजसम्।<br>अविनाशित्वमासाद्य जहि शक्रं कृतागसम्॥ ५२ | विश्वकी सृष्टि करनेवाले अमिततेजस्वी ब्रह्माजीको प्रसन्न करके अमरत्व प्राप्तकर तुम अपराधी इन्द्रको मार डालो॥ ५२॥ | | वैरं मनसि मे पुत्र वर्तते सुतघातजम्।<br>न शान्तिमनुगच्छामि न स्वपामि सुखेन ह॥ ५३ | हे पुत्र! मेरे मनमें उस पुत्रघातीके प्रति वैर बना हुआ है, न मुझे शान्ति प्राप्त होती है और न ही मैं सुखसे सो पाता हूँ॥ ५३॥ | | तापसो मे हतः पुत्रो निरागाः पाप्मना यतः।<br>न विन्दामि सुखं वृत्र त्वं मामुद्धर दुःखितम्॥ ५४ | उस पापीने मेरे निर्दोष तपस्वी पुत्रको मार डाला है, इसलिये मुझे शान्ति नहीं मिलती। हे वृत्र! तुम मुझ दुःखीका उद्धार करो॥ ५४॥ | | व्यास उवाच<br>तदाकर्ण्य पितुर्वाक्यं वृत्रः क्रोधयुतस्तदा।<br>आज्ञामादाय च पितुर्जगाम तपसे मुदा॥ ५५ | व्यासजी बोले— तब पिताका वचन सुनकर वृत्रासुर कुपित हो उठा। पितासे आज्ञा लेकर वह प्रसन्नतापूर्वक तपस्या करनेके लिये चला गया॥ ५५॥ |
| अ० ४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७३७ |
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| गन्धमादनमासाद्य पुण्यां देवधुनीं शुभाम्।<br>स्नात्वा कुशासनं कृत्वा संस्थितश्च स्थिरासनः॥ ५६ | गन्धमादनपर्वतपर पहुँचकर पवित्र और मंगलकारिणी देवनदी गंगाजीमें स्नान करके कुशका आसन बिछाकर वह दृढ़तापूर्वक बैठ गया॥ ५६॥ | | त्यक्त्वाऽन्नं वारिपानं च योगाभ्यासपरायणः।<br>ध्यायन्विश्वसृजं चित्ते सोपविष्टः स्थिरासने॥ ५७ | अन्न और जलका त्याग करके योगाभ्यासमें तत्पर होकर मनमें विश्वस्रष्टा ब्रह्माजीका ध्यान करता हुआ वह दृढ़भावसे आसनपर बैठा रहा॥ ५७॥ | | मघवा तं तपस्यन्तं ज्ञात्वा चिन्तातुरो ह्यभूत्।<br>गन्धर्वान्प्रेषयामास विघ्नार्थं पाकशासनः॥ ५८<br>यक्षांश्च पन्नगान्सर्पान्किन्नरानमितौजसः।<br>विद्याधरानप्सरसो देवदूताननेकणः॥ ५९<br>उपायैस्तैः कृताः सम्यक् तपोविघ्नाय मायिभिः।<br>न चचाल ततो ध्यानात्त्वाष्ट्रः परमतापसः॥ ६० | उसे तपस्या करता हुआ जानकर इन्द्र चिन्तासे व्यग्र हो उठे। तब [उसके तपमें] विघ्न डालनेके लिये इन्द्रने गन्धर्वों, अत्यन्त ओजस्वी यक्षों, नागों, सर्पों, किन्नरों, विद्याधरों, अप्सराओं और अनेक देवदूतोंको भेजा। उन मायावियोंद्वारा तपमें विघ्नके लिये भलीभाँति उपाय किये गये, किंतु परम तपस्वी त्वष्टापुत्र वृत्र ध्यानसे विचलित नहीं हुआ॥ ५८-६०॥ |
<div align="center">इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां षष्ठस्कन्धे ब्रह्मणः<br>समाराधनाय त्वष्ट्रा वृत्रोपदेशवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
o
अथ चतुर्थोऽध्यायः
तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीका वृत्रासुरको वरदान देना, त्वष्टाकी प्रेरणासे वृत्रासुरका स्वर्गपर आक्रमण करके अपने अधिकारमें कर लेना, इन्द्रका पितामह ब्रह्मा और भगवान् शंकरके साथ वैकुण्ठधाम जाना
</div>| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| निर्गतास्ते परावृत्तास्तपोविघ्नकराः सुराः।<br>निराशाः कार्यसंसिद्धौ तं दृष्ट्वा दृढचेतसम्॥ १ | उस वृत्रासुरको दृढ़प्रतिज्ञ देखकर तपमें विघ्न डालनेके लिये गये हुए देवगण अपने कार्यकी सिद्धिसे निराश होकर वापस लौट आये॥ १॥ |
| जाते वर्षशते पूर्णे ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>तत्राजगाम तरसा हंसारूढश्चतुर्मुखः॥ २ | सौ वर्ष पूर्ण होनेपर लोकपितामह चतुर्मुख ब्रह्मा हंसपर आरूढ़ हो शीघ्रतापूर्वक उसके पास आये॥ २॥ |
| आगत्य तमुवाचेदं त्वष्टृपुत्र सुखी भव।<br>त्यक्त्वा ध्यानं वरं ब्रूहि ददामि तव वाञ्छितम्॥ ३ | आकर उन्होंने उससे यह कहा—हे त्वष्टाके पुत्र! तुम सुखी होओ, ध्यानका त्यागकर वरदान माँगो, मैं तुम्हारा इच्छित वर दूँगा॥ ३॥ |
| तपसा तेऽद्य तुष्टोऽस्मि त्वां दृष्ट्वा चातिकर्शितम्।<br>वरं वरय भद्रं ते मनोऽभिलषितं तव॥ ४ | तुम्हें तपस्यासे अत्यन्त कृशकाय देखकर मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम अपना मनोभिलषित वर माँग लो॥ ४॥ |
| व्यास उवाच<br>वृत्रस्तदातिविशदां पुरतो निशम्य<br>वाचं सुधासमरसां जगदेककर्तुः।<br>सन्त्यज्य योगकलनां सहसोदतिष्ठ-<br>त्तज्जातहर्षणयनाश्रुकलाकलापः ॥ ५ | **व्यासजी बोले—**अपने समक्ष खड़े जगत्के एकमात्र स्रष्टा [ब्रह्माजी]-की अत्यन्त गम्भीर और अमृतरसतुल्य वाणी सुनकर वह वृत्रासुर योग-ध्यान त्यागकर सहसा उठ खड़ा हुआ। हर्षातिरेकसे उसके नेत्रोंसे अश्रुधारा बहने लगी॥ ५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 A
| ७३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पादौ प्रणम्य शिरसा प्रणयाद्विधातु-<br>र्बद्धाञ्जलिः पुरत एव समाससाद।<br>प्रोवाच तं सुवरदं तपसा प्रसन्नं<br>प्रेम्णातिगद्गदगिरा विनयेन नम्रः॥ ६ | प्रेमपूर्वक विधाता ब्रह्माजीके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर वह उनके समक्ष स्थित हो गया और तपस्यासे प्रसन्न तथा उत्तम वर देनेवाले ब्रह्माजीसे विनयावनत होकर प्रेमपूर्ण गद्गद वाणीमें कहने लगा— ॥ ६॥ |
| प्राप्तं मया सकलदेवपदं प्रभोऽद्य<br>यद्दर्शनं तव सुदुर्लभमाशु जातम्।<br>वाञ्छास्ति नाथ मनसि प्रवणे दुरापा<br>तां ब्रब्रवीमि कमलासन वेत्सि भावम्॥ ७ | हे प्रभो! मैंने आज समस्त देवताओंका पद प्राप्त कर लिया जो कि मुझे शीघ्र ही आपका अत्यन्त दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो गया। हे नाथ! हे कमलासन! आप सबके मनके भाव जानते हैं, फिर भी मेरे भक्तिपूर्ण मनमें एक दुर्लभ अभिलाषा है, उसे मैं आपसे कह रहा हूँ॥ ७॥ |
| मृत्युश्च मा भवतु मे किल लोहकाष्ठ-<br>शुष्कार्द्रवंशनिचयैरपरैश्च शस्त्रैः।<br>वृद्धिं प्रयातु मम वीर्यमतीव युद्धे<br>यस्माद्द्भवामि सबलैर्म्मरैरजेयः॥ ८ | लोहे, काष्ठ, सूखे या गीले बाँसद्वारा निर्मित तथा अन्य किसी शस्त्रसे मेरी कभी मृत्यु न हो। मेरा पराक्रम अत्यन्त बढ़ जाय, जिससे युद्धमें मैं उन बलवान् देवताओंसे अजेय हो जाऊँ॥ ८॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्थं सम्प्रार्थितो ब्रह्मा तमाह प्रहसन्निव।<br>उत्तिष्ठ गच्छ भद्रं ते वाञ्छितं सफलं सदा॥ ९ | व्यासजी बोले— उसके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर ब्रह्माजी उससे हँसते हुए बोले—[हे वत्स!] उठो और [घर] जाओ, तुम्हारा मनोरथ निश्चय ही पूर्ण होगा। तुम्हारा कल्याण हो॥ ९॥ |
| न शुष्केण न चार्द्रेण न पाषाणेन दारुणा।<br>भविष्यति च ते मृत्युरिति सत्यं ब्रवीम्यहम्॥ १० | न सूखी, न गीली वस्तुसे, न तो पत्थर या लकड़ीद्वारा निर्मित शस्त्रसे ही तुम्हारी मृत्यु होगी—यह मैं सत्य कह रहा हूँ॥ १०॥ |
| इति दत्त्वा वरं ब्रह्मा जगाम भुवनं परम्।<br>वृत्रस्तु तं वरं लब्ध्वा मुदितः स्वगृहं ययौ॥ ११ | ऐसा वरदान देकर ब्रह्माजी अपने दिव्य लोकको चले गये और वृत्रासुर भी वरदान प्राप्तकर प्रसन्नतापूर्वक अपने घर चला गया॥ ११॥ |
| शशंस पितुरग्रे तद्वरदानं महामतिः।<br>त्वष्टा तु मुदितः प्राप्तं पुत्रं प्राप्तवरं तदा॥ १२ | महाबुद्धिमान् वृत्रासुरने पिताके सम्मुख उस वरदानको सुनाया, तब त्वष्टा भी पुत्रके वरदान प्राप्त करनेसे अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ १२॥ |
| स्वस्ति तेऽस्तु महाभाग जहि शक्रं रिपुं मम।<br>हत्वागच्छ त्रिशिरसो हन्तारं पापसंयुक्तम्॥ १३ | उन्होंने कहा—हे महाभाग! तुम्हारा कल्याण हो, मेरे शत्रु और त्रिशिराके हत्यारे पापी इन्द्रको मार डालो; उसे मारकर आ जाओ॥ १३॥ |
| भव त्वं त्रिदशाधीशः सम्प्राप्य विजयं रणे।<br>ममाधिं छिन्धि विपुलं पुत्रनाशसमुद्भवम्॥ १४ | युद्धमें विजय प्राप्तकर तुम देवताओंके अधिपति बनो। पुत्रहत्यासे उत्पन्न मेरे महान् मानसिक सन्तापको तुम दूर करो॥ १४॥ |
| जीवतो वाक्यकरणात्क्षयाहे भूरिभोजनात्।<br>गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता॥ १५ | जीवित [अवस्थामें] पिताकी आज्ञाका पालन करने, मृत्युकतिथिपर पर्याप्त भोजन कराने तथा गयामें पिण्डदान करने—इन तीनोंसे ही पुत्रका पुत्रत्व सार्थक होता है॥ १५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 B
अ० ४] षष्ठ स्कन्ध ७३९
अ० ४] षष्ठ स्कन्ध ७३९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मात्पुत्र ममात्यर्थं दुःखं नाशितुमर्हसि।<br>त्रिशिरा मम चित्तात्तु नापसर्पति कर्हिचित् ॥ १६ | अतः हे पुत्र! तुम मेरे बहुत बड़े दुःखको दूर करनेमें समर्थ हो; त्रिशिरा मेरे चित्तसे कभी हटता नहीं है॥ १६॥ |
| सुशीलः सत्यवादी च तापसो वेदवित्तमः।<br>अपराधं विना तेन निहतः पापबुद्धिना ॥ १७ | उस सुशील, सत्यवादी, तपस्वी और वेदवेत्ताको बिना किसी अपराधके ही पापबुद्धिवाले उस इन्द्रने मार डाला॥ १७॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा वृत्रः परमदुर्जयः।<br>रथमारुह्य तरसा निर्जगाम पितुर्गृहात् ॥ १८<br><br>रणदुन्दुभिनिर्घोषं शङ्खनादं महाबलम्।<br>कारयित्वा प्रयाणं स चकार मदगर्वितः ॥ १९ | व्यासजी बोले— उनकी ऐसी बात सुनकर परम दुर्जय वृत्रासुर रथपर सवार हो शीघ्र ही [अपने] पिताके घरसे निकल पड़ा। रणभेरियोंकी ध्वनि तथा महान् शंखनाद कराकर उस मदोन्मत्तने प्रस्थान किया॥ १८-१९॥ |
| निर्ययौ नयसंयुक्तः सेवकानिति संवदन्।<br>हत्वा शक्रं ग्रहीष्यामि सुरराज्यमकण्टकम् ॥ २० | ‘इन्द्रको मारकर निष्कण्टक देव-राज्य अधिकृत कर लूँगा’—ऐसा सेवकोंसे कहते हुए वह नीतिवान् वृत्र निकल पड़ा॥ २०॥ |
| इत्युक्त्वा निर्जगामाशु स्वसैन्यपरिवारितः।<br>महता सैन्यनादेन भीषयन्नमरावतीम् ॥ २१ | ऐसा कहकर सैनिकोंके महान् घोषसे अमरावती (इन्द्रपुरी)-को भयभीत करता हुआ वह अपनी सेनाके साथ शीघ्रतापूर्वक निकला॥ २१॥ |
| तमागच्छन्तमाज्ञाय तुराषाडपि सत्वरः।<br>सेनोद्योगं भयत्रस्तः कारयामास भारत ॥ २२ | हे भारत! उसे आता हुआ जानकर भयभीत इन्द्र भी शीघ्रतापूर्वक सेनाकी तैयारी कराने लगे॥ २२॥ |
| सर्वानाहूय तरसा लोकपालानरिन्दमः।<br>युद्धार्थं प्रेरयन्सर्वान्व्यरोचत महाद्युतिः ॥ २३ | उन शत्रुदमन इन्द्रने शीघ्र ही सभी लोकपालोंको बुलाकर उन्हें युद्धकी तैयारी करनेके लिये प्रेरित किया, उस समय वे अत्यन्त कान्तिमान् लग रहे थे॥ २३॥ |
| गृध्रव्यूहं ततः कृत्वा संस्थितः पाकशासनः।<br>तत्राजगाम वेगात्तु वृत्रः परबलार्दनः ॥ २४ | तत्पश्चात् गृध्रव्यूहका निर्माण करके इन्द्र युद्धके लिये डट गये; उसी समय शत्रुसेनाका विध्वंस कर डालनेवाला वृत्रासुर भी वहाँ वेगपूर्वक आ पहुँचा॥ २४॥ |
| देवदानवयोस्तावत्संग्रामस्तुमुलोऽभवत् ।<br>वृत्रवासवयोः संख्ये मनसा विजयैषिणोः ॥ २५ | तब युद्धक्षेत्रमें अपने-अपने मनमें विजयकी इच्छा रखनेवाले इन्द्र तथा वृत्रासुरकी देव-दानव सेनाओंमें भीषण संग्राम होने लगा॥ २५॥ |
| एवं परस्परं युद्धे सन्दीप्ते भयदे भृशम्।<br>आकूतं देवताः प्रापुर्दैत्याश्च परमां मुदम् ॥ २६ | इस प्रकार परस्पर युद्धके उग्र और भयंकर हो जानेपर देवगण व्याकुल और दानव अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ २६॥ |
| तोमरैर्भिन्दिपालैश्च खड्गैः परशुपट्टिशैः।<br>जघ्नुः परस्परं देवदैत्याः स्वस्ववरायुधैः ॥ २७ | उस युद्धमें तोमर, भिन्दिपाल, तलवार, परशु और पट्टिश—इन अपने-अपने श्रेष्ठ आयुधोंसे देवता और दैत्य एक-दूसरेपर प्रहार कर रहे थे॥ २७॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 C
| ७४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं युद्धे वर्तमाने दारुणे लोमहर्षणे।<br>शक्रं जग्राह सहसा वृत्रः क्रोधसमन्वितः॥ २८ | इस प्रकारके हो रहे रोमांचकारी और भयंकर संग्राममें क्रोधाभिभूत वृत्रासुरने अचानक इन्द्रको पकड़ लिया॥ २८॥ |
| अपावृत्य मुखे क्षिप्त्वा स्थितो वृत्रः शतक्रतुम्।<br>मुदितोऽभून्महाराज पूर्ववैरमनुस्मरन्॥ २९ | हे महाराज! वृत्रासुर इन्द्रको कवच-वस्त्र आदिसे रहित करके अपने मुखमें डालकर स्थित हो गया और पूर्ववैरका स्मरण करते हुए वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ॥ २९॥ |
| शक्रे ग्रस्तेऽथ वृत्रेण संभ्रान्ता निर्जरास्तदा।<br>चुक्रुशुः परमार्तास्ते हा शक्रेति मुहुर्मुहुः॥ ३० | वृत्रासुरके द्वारा इन्द्रको निगला गया देखकर देवता विस्मित हो गये और अत्यन्त दुःखी होकर 'हा इन्द्र! हा इन्द्र!' कहकर चिल्लाने लगे॥ ३०॥ |
| अपावृतं मुखे शक्रं ज्ञात्वा सर्वे दिवौकसः।<br>बृहस्पतिं प्रणम्योचुर्दीना व्यथितचेतसः॥ ३१ | जब देवताओंको यह ज्ञात हुआ कि इन्द्रको वृत्रने मुखमें रखकर छिपा लिया है तो वे अत्यन्त दुःखित होकर बृहस्पतिके पास गये और उनसे दीन वाणीमें बोले—॥ ३१॥ |
| किं कर्तव्यं द्विजश्रेष्ठ त्वमस्माकं गुरुः परः।<br>शक्रो ग्रस्तस्तु वृत्रेण रक्षितो देवतान्तरैः॥ ३२ | हे द्विजश्रेष्ठ! देवसेनासे सुरक्षित इन्द्रको वृत्रासुरने अपने मुखमें रख लिया है। अब हम क्या करें? आप हमारे परम गुरु हैं॥ ३२॥ |
| विना शक्रेण किं कुर्मः सर्वे हीनपराक्रमाः।<br>अभिचारं कुरु विभो सत्वरः शक्रमुक्तये॥ ३३ | इन्द्रके बिना हमलोग क्या करें, हम सब पराक्रमहीन हो गये हैं। हे विभो! इन्द्रकी मुक्तिके लिये आप शीघ्र ही अभिचार-क्रिया कीजिये॥ ३३॥ |
| बृहस्पतिरुवाच<br>किं कर्तव्यं सुराः क्षिप्तो मुखमध्येऽस्ति वासवः।<br>वृत्रेणोत्सादितो जीवन्नस्ति कोष्ठान्तरे रिपोः॥ ३४ | बृहस्पति बोले—हे देवताओ! क्या किया जाय? उसने इन्द्रको मुखमें रख लिया है, वृत्रासुरके द्वारा पीड़ित वे इन्द्र उस शत्रुके मुखमें भी जीवित हैं॥ ३४॥ |
| व्यास उवाच<br>देवाश्चिन्तातुराः सर्वे तुरासाहं तथाकृतम्।<br>दृष्ट्वा विमृश्य तरसा चक्रुर्यत्नं विमुक्तये॥ ३५ | व्यासजी बोले—इन्द्रको उस स्थितिमें प्राप्त देखकर चिन्तित देवताओंने भलीभाँति सोचकर उनकी मुक्तिके लिये शीघ्र ही एक उपाय किया॥ ३५॥ |
| असृजन्त महासत्त्वां जृम्भिकां रिपुनाशिनीम्।<br>ततो विजृम्भमाणः स व्यावृतास्यो बभूव ह॥ ३६ | उन्होंने अत्यन्त शक्तिशाली और शत्रुनाशिनी जम्हाईका सृजन किया; इससे उसे जम्हाई आते ही उस वृत्रासुरका मुख खुल गया॥ ३६॥ |
| विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्यादवापतत्।<br>स्वान्यङ्गान्यपि संक्षिप्य निष्क्रान्तो बलसूदनः॥ ३७ | तत्पश्चात् जम्हाई लेते हुए वृत्रासुरके मुखसे बल नामक दैत्यका नाश करनेवाले इन्द्र अपने अंगोंको संकुचित करके बाहर निकल आये॥ ३७॥ |
| ततः प्रभृति लोकेषु जृम्भिका प्राणिसंस्थिता।<br>जहृषुश्च सुराः सर्वे शक्रं दृष्ट्वा विनिर्गतम्॥ ३८ | उसी समयसे संसारके सभी प्राणियोंके शरीरमें जम्हाई विद्यमान रहने लगी। इन्द्रको बाहर निकला हुआ देखकर सभी देवता हर्षित हो उठे॥ ३८॥ |
| ततः प्रवृत्ते युद्धं तयोर्लोकभयप्रदम्।<br>वर्षाणामयुतं यावद्दारुणं लोमहर्षणम्॥ ३९ | तब उन दोनोंमें तीनों लोकोंके लिये भयदायक, रोमांचकारी और भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया, जो दस हजार वर्षोंतक चला॥ ३९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 D
अ० ४ ] षष्ठ स्कन्ध ७४१
अ० ४ ] षष्ठ स्कन्ध ७४१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एकतश्च सुराः सर्वे युद्धाय समुपस्थिताः ।<br>एकतो बलवांस्त्वाष्ट्रः संग्रामे समवर्तत ॥ ४० | युद्ध करनेके लिये संग्राममें एक ओर सभी देवता उपस्थित थे तो दूसरी ओर त्वष्टाका बलशाली पुत्र वृत्रासुर डटा हुआ था ॥ ४० ॥ |
| यदा व्यवर्धत रणे वृत्रो वरमदावृतः ।<br>पराजितस्तदा शक्रस्तेजसा तस्य धर्षितः ॥ ४१ | वरदानके अहंकारसे उन्मत्त वृत्रासुरका उत्कर्ष जब रणमें प्रबल हो गया, तब उसके तेजसे पराक्रमहीन इन्द्र पराजित हो गये ॥ ४१ ॥ |
| विव्यथे मघवा युद्धे ततः प्राप्य पराजयम् ।<br>विषादमगमन्देवा दृष्ट्वा शक्रं पराजितम् ॥ ४२ | उससे युद्धमें पराजय प्राप्त करके इन्द्रको बहुत व्यथा हुई और उन्हें पराजित देखकर देवगण भी विषादग्रस्त हो गये ॥ ४२ ॥ |
| जग्मुस्त्यक्त्वा रणं सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः ।<br>गृहीतं देवसदनं वृत्रेणागत्य रंहसा ॥ ४३ | तब इन्द्र आदि समस्त देवता युद्ध छोड़कर भाग गये और वृत्रासुरने शीघ्रतापूर्वक आकर अमरावतीपर अधिकार कर लिया ॥ ४३ ॥ |
| देवोद्यानानि सर्वाणि भुङ्क्तेऽसौ दानवो बलात् ।<br>ऐरावतोऽपि दैत्येन गृहीतोऽसौ गजोत्तमः ॥ ४४ | अब वह दानव समस्त देवोद्यानोंका बलपूर्वक उपभोग करने लगा। उस दैत्य वृत्रासुरके द्वारा गजश्रेष्ठ ऐरावत भी अधिकारमें कर लिया गया ॥ ४४ ॥ |
| विमानानि च सर्वाणि गृहीतानि विशाम्पते ।<br>उच्चैःश्रवा हयवरो जातस्तस्य वशे तदा ॥ ४५ | हे राजन्! तत्पश्चात् उसने समस्त विमानोंको ग्रहण कर लिया और अश्वश्रेष्ठ उच्चैःश्रवाको भी अपने अधीन कर लिया ॥ ४५ ॥ |
| कामधेनुः पारिजातो गणश्चाप्सरसां तथा ।<br>गृहीतं रत्नमात्रं तु तेन त्वष्टृसुतेन ह ॥ ४६ | उसी प्रकार कामधेनु, कल्पवृक्ष, अप्सराओंका समूह तथा रत्न आदि जो कुछ था; वह सब उस त्वष्टापुत्र वृत्रने अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ४६ ॥ |
| स्थानभ्रष्टाः सुराः सर्वे गिरिदुर्गेषु संस्थिताः ।<br>दुःखमापुः परिभ्रष्टा यज्ञभागात्सुरालयात् ॥ ४७ | अब राज्यच्युत होकर सभी देवता पर्वतोंकी कन्दराओंमें रहकर अत्यन्त दुःख प्राप्त करने लगे। वे यज्ञभाग और देवसदन—दोनोंसे वंचित हो गये ॥ ४७ ॥ |
| वृत्रः सुरपदं प्राप्य बभूव मदगर्वितः ।<br>त्वष्टातीव सुखं प्राप्य मुमोद सुतसंयुतः ॥ ४८ | वृत्रासुर देव-राज्य पाकर मदोन्मत्त हो गया। त्वष्टा भी अत्यन्त सुख प्राप्तकर पुत्रके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ४८ ॥ |
| अमन्त्रयन्हितं देवा मुनिभिः सह भारत ।<br>किं कर्तव्यमिति प्राप्ते विचिन्त्य भयमोहिताः ॥ ४९<br><br>जग्मुः कैलासमचलं सुराः शक्रसमन्विताः ।<br>महादेवं प्रणम्योचुः प्रह्वाः प्राञ्जलयो भृशम् ॥ ५० | हे भारत! देवगण अपने कल्याणके लिये मुनियोंके साथ विचार-विमर्श करने लगे कि इस स्थितिके प्राप्त होनेपर अब हमें क्या करना चाहिये—ऐसा विचार करके भयमोहित वे देवगण इन्द्रके साथ कैलासपर्वतपर गये और वहाँ देवाधिदेव भगवान् शंकरको प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर कहने लगे— ॥ ४९-५० ॥ |
| देवदेव महादेव कृपासिन्धो महेश्वर ।<br>रक्षास्मान्भयभीतांस्तु वृत्रेणातिपराजितान् ॥ ५१ | हे देव! हे महादेव! हे कृपासागर! हे महेश्वर! वृत्रासुरसे पूर्णतः पराजित हम भयभीत देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ ५१ ॥ |
| ७४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
|---|
| गृहीतं देवसदनं तेन देव बलीयसा।<br>किं कर्तव्यमतः शम्भो ब्रूहि सत्यं शिवाद्य नः॥ ५२ | हे देव! उस महाबलीने देवलोकपर अधिकार कर लिया है। हे शम्भो! हे शिव! अब हमें क्या करना चाहिये, आप हमें सही-सही बताइये॥ ५२॥ | | किं कुर्मः क्व च गच्छामः स्थानभ्रष्टा महेश्वर।<br>दुःखस्य नाधिगच्छामो विनाशोपायमीश्वर॥ ५३ | हे महेश्वर! हम राज्यभ्रष्ट क्या करें और कहाँ जायँ? हे ईश्वर! हम इस दुःखके विनाशके लिये कोई भी उपाय नहीं जान पा रहे हैं॥ ५३॥ | | साहाय्यं कुरु भूतेश व्यथिताः स्म कृपानिधे।<br>वृत्रं जहि मदोत्सिक्तं वरदानबलाद्विभो॥ ५४ | हे भूतेश! हमारी सहायता कीजिये। हे कृपानिधान! हम सब बहुत दुःखी हैं। हे विभो! वरदानके प्रभावसे मदोन्मत्त वृत्रासुरका वध कीजिये॥ ५४॥ | | शिव उवाच<br>ब्रह्माणं पुरतः कृत्वा वयं सर्वे हरेः क्षयम्।<br>गत्वा समेत्य तं विष्णुं चिन्तयामो वधोद्यमम्॥ ५५ | शिवजी बोले—ब्रह्माजीको आगे करके हमलोग विष्णुलोक चल करके वहाँ उन श्रीहरिके पास जाकर उस वृत्रासुरके वधके उपायपर विचार करेंगे॥ ५५॥ | | स शक्तश्च छलज्ञश्च बलवान्बुद्धिमत्तरः।<br>शरण्यश्च दयाब्धिश्च वासुदेवो जनार्दनः॥ ५६ | वे जनार्दन भगवान् विष्णु शक्तिशाली, छलकार्यमें निपुण, बलवान्, सबसे बुद्धिमान्, शरणदाता और दयाके सागर हैं॥ ५६॥ | | विना तं देवदेवेशं नार्थसिद्धिर्भविष्यति।<br>तस्मात्तत्र च गन्तव्यं सर्वकार्यार्थसिद्धये॥ ५७ | उन देवदेवेशके बिना हमारा प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा, इसलिये सभी कार्योंकी सिद्धिके लिये हमें वहीं चलना चाहिये॥ ५७॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य ते सर्वे ब्रह्मा शक्रः सशङ्करः।<br>जग्मुर्विष्णोः क्षयं देवाः शरण्यं भक्तवत्सलम्॥ ५८ | व्यासजी बोले—ऐसा विचारकर ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता शरणदाता और भक्तवत्सल भगवान् विष्णुके लोक गये॥ ५८॥ | | गत्वा विष्णुपदं देवास्तुष्टुवुः परमेश्वरम्।<br>हरिं पुरुषसूक्तेन वेदोक्तेन जगद्गुरुम्॥ ५९ | वैकुण्ठधाममें पहुँचकर वे देवता वेदोक्त पुरुषसूक्तसे उन परमेश्वर जगद्गुरु श्रीहरिकी स्तुति करने लगे॥ ५९॥ | | प्रत्यक्षोऽभूज्जगन्नाथस्तेषां स कमलापतिः।<br>सम्मान्य च सुरान्सर्वानित्युवाच पुरःस्थितः॥ ६० | तब भगवान् जगन्नाथ कमलापति विष्णु उनके सम्मुख उपस्थित हो गये और सभी देवताओंका सम्मान करके उनसे बोले—॥ ६०॥ | | किमागताः स्म लोकेशा हरब्रह्मसमन्विताः।<br>कारणं कथयध्वं वः सर्वेषां सुरसत्तमाः॥ ६१ | हे लोकपालगण! आपलोग ब्रह्मा और शिवजीके साथ यहाँ क्यों आये हैं? हे श्रेष्ठ देवताओ! आप सभी अपने आगमनका कारण बतायें॥ ६१॥ | | व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं नोचुर्देवा रमापतिम्।<br>चिन्ताविष्टाः स्थिताः प्रायः सर्वे प्राञ्जलयस्तथा॥ ६२ | व्यासजी बोले—भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर भी देवगण उन रमापतिसे कुछ बोल न सके और वे चिन्तातुर होकर हाथ जोड़े खड़े ही रहे॥ ६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे ब्रह्मनेतृत्वे सेन्द्रैः सुरैर्विष्णोः शरणगमनवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अ० ५ ] षष्ठ स्कन्ध ७४३
अ० ५ ] षष्ठ स्कन्ध ७४३
अथ पञ्चमोऽध्यायः
भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे देवताओंका भगवतीकी स्तुति करना और प्रसन्न होकर भगवतीका वरदान देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— हे राजन्! तब सभी तत्त्वोंके ज्ञाता माधव भगवान् विष्णु समस्त देवताओंको चिन्तासे व्याकुल तथा अत्यन्त प्रेमविह्वल देखकर कहने लगे ॥ १ ॥ | | तथा चिन्तातुरान्वीक्ष्य सर्वान्सर्वार्थतत्त्ववित् ।<br>प्राह प्रेमभरोद्भ्रान्तान्माधवो मेदिनीपते ॥ १ | | | विष्णुरुवाच<br>किं मौनमाश्रिता यूयं ब्रुवन्तु कारणं सुराः ।<br>सदसद्वापि यच्छ्रुत्वा यतिष्ये तन्निवारणे ॥ २ | विष्णु बोले— हे देवगण! आप सबने मौन धारण क्यों कर रखा है ? आप सब अपने दुःखका सत्-असत् जो भी कारण हो बतायें, जिसे सुनकर मैं उसे दूर करनेका उपाय करूँगा ॥ २ ॥ | | देवा ऊचुः<br>किमज्ञातं तव विभो त्रिषु लोकेषु वर्तते ।<br>सर्वं वेद भवान्कार्यं किं पृच्छसि पुनः पुनः ॥ ३ | देवता बोले— हे विभो! तीनों लोकोंमें कौन-सी वस्तु आपसे अज्ञात है, आप हमारा सारा कार्य [ भली प्रकारसे ] जानते हैं; तो क्यों बार-बार पूछ रहे हैं ? ॥ ३ ॥ | | त्वया पूर्वं बलिर्बद्धः शक्रो देवाधिपः कृतः ।<br>वामनं वपुरास्थाय क्रान्तं त्रिभुवनं पदैः ॥ ४ | पूर्वकालमें आपने बलिको बाँध लिया था और इन्द्रको देवताओंका राजा बनाया था; आपने वामन-शरीर धारणकर तीनों लोकोंको अपने चरणोंसे नाप लिया था ॥ ४ ॥ | | अमृतं त्वाहृतं विष्णो दैत्याश्च विनिपातिताः ।<br>त्वं प्रभुः सर्वदेवानां सर्वापद्विनिवारणे ॥ ५ | हे विष्णो ! आपने ही अमृत छीनकर दैत्योंका नाश किया था; आप सभी देवताओंकी समस्त विपत्तियोंको दूर करनेमें समर्थ हैं ॥ ५ ॥ | | विष्णुरुवाच<br>न भेतव्यं सुरवरा वेद्युपायं सुसम्मतम् ।<br>तद्वधाय प्रवक्ष्यामि येन सौख्यं भविष्यति ॥ ६ | विष्णु बोले— हे श्रेष्ठ देवताओ! आपलोग भयभीत न हों। मैं उस वृत्रासुरके वधका सुसंगत उपाय जानता हूँ, उसे मैं बताऊँगा, जिससे आपलोगोंको सुख होगा ॥ ६ ॥ | | अवश्यं करणीयं मे भवतां हितमात्मना ।<br>बुद्ध्या बलेन चार्थेन येन केनच्छलेन वा ॥ ७ | अपनी बुद्धिसे, बलसे, धनसे या जिस किसी भी उपायसे मुझे आपलोगोंका हित अवश्य करना है ॥ ७ ॥ | | उपायाः खलु चत्वारः कथितास्तत्त्वदर्शिभिः ।<br>सामादयः सुहृत्स्वेव दुर्हृत्सु विशेषतः ॥ ८ | मित्रों और विशेषरूपसे शत्रुओंके प्रति [प्रयोगहेतु] तत्त्वदर्शियोंने साम, दान, दण्ड, भेद—ये चार उपाय बताये हैं ॥ ८ ॥ | | ब्रह्मणास्य वरो दत्तस्तपसाराधितेन च ।<br>दुर्जयत्वं च सम्प्राप्तं वरदानप्रभावतः ॥ ९ | वृत्रासुरकी तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने इसे वरदान दिया है और उस वरदानके प्रभावसे यह दुर्जय हो गया है ॥ ९ ॥ |
| ७४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
|---|
| अजेयः सर्वभूतानां त्वष्ट्रा समुपपादितः।<br>ततो बलेन वृद्धिं स प्राप्तः परपुरञ्जयः ॥ १० | त्वष्टाके द्वारा उत्पन्न किया गया यह वृत्रासुर समस्त प्राणियोंके लिये अजेय हो गया है। शत्रुओंके राज्यको जीत लेनेवाला वह अपनी शक्तिसे अधिक प्रबल हो गया है ॥ १० ॥ |
| दुःसाध्योऽसौ सुराः शत्रुर्विना सामप्रतारणम्।<br>प्रलोभ्य वशमानेयो हन्तव्यस्तु ततः परम् ॥ ११ | हे देवताओ! बिना सामनीतिके प्रयोगके वह वृत्रासुर देवताओंके लिये दुःसाध्य है, अतः पहले इसे प्रलोभन देकर वशमें करना चाहिये, तत्पश्चात् मार डालना चाहिये ॥ ११ ॥ |
| गच्छध्वं सर्वगन्धर्वा यत्रास्ति बलवत्तरः।<br>साम तस्य प्रयुञ्जध्वं तत एनं विजेष्यथ ॥ १२ | हे गन्धर्वगण! जहाँ वह बलवान् वृत्रासुर रहता है, वहाँ तुमलोग जाओ और उसपर सामनीतिका प्रयोग करो; तभी उसपर विजय प्राप्त कर सकोगे ॥ १२ ॥ |
| सङ्गम्य शपथान्कृत्वा विश्वास्य समयेन हि।<br>मित्रत्वं च समाधाय हन्तव्यः प्रबलो रिपुः ॥ १३ | वहाँ जाकर अनेक शपथें खाकर सन्धिके द्वारा उसे विश्वासमें ले करके और पुनः मित्रताकर बादमें उस प्रबल शत्रुको मार डालना चाहिये ॥ १३ ॥ |
| अदृश्यः सम्प्रवेक्ष्यामि वज्रमस्य वरायुधम्।<br>साहाय्यं च करिष्यामि शक्रस्याहं सुरोत्तमाः ॥ १४ | हे श्रेष्ठ देवगण! मैं अदृश्य रूपमें इन्द्रके श्रेष्ठ आयुध वज्रमें प्रवेश कर जाऊँगा और उनकी सहायता करूँगा ॥ १४ ॥ |
| समयं च प्रतीक्षध्वं सर्वथैवायुषः क्षये।<br>मरणं विबुधास्तस्य नान्यथा सम्भविष्यति ॥ १५ | हे देवताओ! अब आपलोग समयकी प्रतीक्षा करें, वृत्रासुरकी आयुके क्षीण होनेपर ही उसकी मृत्यु होगी, अन्य किसी भी प्रकारसे नहीं ॥ १५ ॥ |
| गच्छध्वमृषिभिः सार्धं गन्धर्वाः कपटावृताः।<br>इन्द्रेण सह मित्रत्वं कुरुध्वं वाक्यदानतः ॥ १६ | हे गन्धर्वगण! तुमलोग वेष बदलकर ऋषियोंके साथ उसके पास जाओ और वचनबद्धतापूर्वक इन्द्रके साथ उसकी मित्रता करा दो ॥ १६ ॥ |
| यथा स याति विश्वासं तथा कार्यं प्रतारणम्।<br>गुप्तोऽहं सम्प्रवेक्ष्यामि पविं सञ्छादितं दृढम् ॥ १७ | जिस प्रकारसे उसका विश्वास दृढ़ हो जाय, वैसा ही आप सबको करना चाहिये। मैं सुदृढ़ तथा आवरणयुक्त वज्रमें गुप्तरूपसे प्रवेश कर जाऊँगा ॥ १७ ॥ |
| विश्वस्तं मघवा शत्रुं हनिष्यति न चान्यथा।<br>विश्वासस्य कृते पापं कृत्वा शक्रस्तु पृष्ठतः ॥ १८<br><br>मत्सहायोऽथ वज्रेण शातयिष्यति पापिनम्।<br>न दोषोऽत्र शठे शत्रौ शाठ्यमेव प्रकुर्वतः ॥ १९<br><br>नान्यथा बलवान्वध्यः शूरधर्मेण जायते।<br>वामनं रूपमाधाय माययं वञ्चितो बलिः ॥ २० | जब वृत्रासुरको पूर्ण विश्वास हो जाय तभी इन्द्र उस शत्रु का वध करेंगे। उसके वधका अन्य कोई उपाय नहीं है। वे इन्द्र विश्वासघात करके मेरी सहायतासे वज्रद्वारा पीछेसे उस पापीको मार डालेंगे। इस दुष्ट शत्रुके साथ शठता करनेमें दोष नहीं है। अन्यथा वह बलवान् वीरधर्मसे नहीं मारा जा सकेगा। पूर्वकालमें मैंने भी वामनरूप धारणकर बलिको वंचित किया था और मोहिनीरूप धारणकर सभी दैत्योंको छला था ॥ १८–२० १/२ ॥ |
| कृत्वा च मोहिनीवेषं दैत्याः सर्वेऽपि वञ्चिताः।<br>भवन्तः सहिताः सर्वे देवीं भगवतीं शिवाम् ॥ २१ | हे देवताओ! अब आप सब लोग एक साथ देवी भगवती शिवाकी शरणमें जायँ और भावपूर्वक |
| अ० ५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७४५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गच्छध्वं शरणं भावैः स्तोत्रमन्त्रैः सुरोत्तमाः।<br>साहाय्यं सा योगमाया भवतां संविधास्यति॥ २२ | स्तोत्रों और मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करें। वे भगवती योगमाया आपलोगोंकी सहायता करेंगी॥ २१-२२॥ |
| वन्दामहे सदा देवीं सात्त्विकीं प्रकृतिं पराम्।<br>सिद्धिदां कामदां कामां दुरापामकृतात्मभिः॥ २३ | हम सभी उन सात्त्विकी, परा प्रकृति, सिद्धिदात्री, कामनास्वरूपिणी, भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाली और दुराचारियोंके लिये दुर्लभ देवीकी सदा वन्दना करते हैं॥ २३॥ |
| इन्द्रोऽपि तां समाराध्य हनिष्यति रिपुं रणे।<br>मोहिनी सा महामाया मोहयिष्यति दानवम्॥ २४<br><br>मोहितो मायया वृत्रः सुखसाध्यो भविष्यति।<br>प्रसन्नायां पराम्बायां सर्वं साध्यं भविष्यति॥ २५<br><br>नोचेन्मनोरथावाप्तिर्न कस्यापि भविष्यति।<br>अन्तर्यामिस्वरूपा सा सर्वकारणकारणा॥ २६<br><br>तस्मात्तां विश्वजननीं प्रकृतिं परमादृताः।<br>भजध्वं सात्त्विकैर्भावैः शत्रुनाशाय सत्तमाः॥ २७ | इन्द्र भी उनकी आराधना करके युद्धमें शत्रुको मार डालेंगे। वे मोहिनी महामाया उस दानव वृत्रासुरको मोहित कर देंगी। तब मायासे मोहित वृत्रासुर सुगमतापूर्वक मारा जा सकेगा। उन पराम्बाके प्रसन्न होनेपर सब कुछ साध्य हो जायगा। अन्यथा किसीकी भी कामनाकी पूर्ति नहीं होगी। वे भगवती सबकी अन्तर्यामिस्वरूपिणी और सभी कारणोंकी भी कारण हैं। इसलिये हे श्रेष्ठ देवगण! शत्रुके विनाशके लिये सात्त्विक भावोंसे युक्त होकर उन प्रकृतिस्वरूपा जगज्जननीका परम आदरपूर्वक भजन कीजिये॥ २४-२७॥ |
| पुरा मयापि संग्रामं कृत्वा परमदारुणम्।<br>पञ्चवर्षसहस्राणि निहतौ मधुकैटभौ॥ २८<br><br>स्तुता मया तदात्यर्थं प्रसन्ना प्रकृतिः परा।<br>मोहितौ तौ तदा दैत्यौ छलेन च मया हतौ॥ २९<br><br>विप्रलब्धौ महाबाहू दानवौ मदगर्वितौ।<br>तथा कुरुध्वं प्रकृतेर्भजनं भावसंयुताः॥ ३०<br><br>सर्वथा कार्यसिद्धिं सा करिष्यति सुरोत्तमाः।<br>एवं ते दत्तमतयो विष्णुना प्रभविष्णुना॥ ३१ | पूर्वकालमें मैंने भी पाँच हजार वर्षोंतक अत्यन्त भीषण युद्ध करके मधु-कैटभका वध किया था। उस समय मैंने उन पराप्रकृतिकी स्तुति की थी, तब वे अत्यन्त प्रसन्न हो गयी थीं। तत्पश्चात् उनके द्वारा मोहित दोनों दैत्योंको मैंने छलपूर्वक मार डाला था। मोहित किये गये विशाल भुजाओंवाले वे दोनों दानव अत्यन्त मदोन्मत्त थे। इसलिये आपलोग भी उसी प्रकार भावपूर्वक उन पराप्रकृतिका भजन कीजिये। हे देवगण! वे सब प्रकारसे कार्यकी सिद्धि करेंगी॥ २८-३० १/२॥ |
| जग्मुस्ते मेरुशिखरं मन्दारद्रुममण्डितम्।<br>एकान्ते संस्थिता देवाः कृत्वा ध्यानं जपं तपः॥ ३२<br><br>तुष्टुवुर्जगतां धात्रीं सृष्टिसंहारकारिणीम्।<br>भक्तकामदुघामम्बां संसारक्लेशनाशिनीम्॥ ३३ | इस प्रकार भगवान् विष्णुसे परामर्श प्राप्त करके वे मन्दार वृक्षोंसे सुशोभित सुमेरुपर्वतके शिखरपर चले गये। वे देवता वहाँ एकान्तमें बैठकर ध्यान, जप और तप करके जगत्का सृजन-पालन-संहार करनेवाली, भक्तोंके लिये कामधेनुस्वरूपा एवं संसारके क्लेशोंका नाश करनेवाली पराम्बा भगवतीकी इस प्रकार स्तुति करने लगे॥ ३१-३३॥ |
| देवा ऊचुः<br>देवि प्रसीद परिपाहि सुरान्प्रतप्तान्<br>वृत्रासुरेण समरे परिपीडितांश्च।<br>दीनार्तिनाशनपरे परमार्थतत्त्वे<br>प्राप्तांस्त्वदङ्घ्रिकमलं शरणं सदैव॥ ३४ | **देवता बोले—**हे देवि! हे दीनोंके कष्ट दूर करनेवाली! हे परमार्थतत्त्वस्वरूपिणि! हमपर प्रसन्न हों, वृत्रासुरके द्वारा सताये गये, युद्धमें अत्यन्त पीड़ित किये गये तथा आपके चरणकमलकी शरणमें सदासे पड़े हुए हम देवताओंकी रक्षा कीजिये॥ ३४॥ |