देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 741, कुल 889 में से
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| वृजिनात्रातुमधुना यस्माच्छक्तोऽसि पुत्रक।<br>तस्माद् वृत्र इति ख्यातं तव नाम भविष्यति॥ ४४<br>भ्राता तव महाभाग त्रिशिरा नाम तापसः।<br>त्रीणि तस्य च शीर्षाणि ह्यभवन्वीर्यवन्ति च॥ ४५<br>वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः सर्वविद्याविशारदः।<br>संस्थितस्तपसि प्रायस्त्रिलोकीविस्मयप्रदे॥ ४६<br>शक्रेण तु हतः सोऽद्य वज्रघातेन साम्प्रतम्।<br>विनापराधं सहसा छिन्नानि मस्तकानि च॥ ४७<br>तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र जहि शक्रं कृतागसम्।<br>ब्रह्महत्यायुतं पापं निस्त्रपं दुर्मतिं शठम्॥ ४८ | हे पुत्र! तुम अभी वृजिन (कष्ट)-से त्राण दिलानेमें समर्थ हो, इसलिये तुम्हारा ‘वृत्र’—यह नाम प्रसिद्ध होगा। हे महाभाग! तुम्हारा त्रिशिरा नामका एक तपस्वी भाई था। उसके अत्यन्त शक्तिशाली तीन सिर थे। वह वेद-वेदांगोंके तत्त्वको जाननेवाला, सभी विद्याओंमें निपुण और तीनों लोकोंको आश्चर्यमें डाल देनेवाली तपस्यामें रत था। इन्द्रने वज्रका प्रहार करके उस निरपराधको मार डाला और उसके मस्तक काट डाले। इसलिये हे पुरुषसिंह! तुम उस ब्रह्म-हत्यारे, पापी, निर्लज्ज, दुष्टबुद्धि तथा मूर्ख इन्द्रको मार डालो॥ ४४-४८॥ |
| इत्युक्त्वा च तदा त्वष्टा पुत्रशोकसमाकुलः।<br>आयुधानि च दिव्यानि चकार विविधानि च॥ ४९<br>ददावस्मै सहस्राक्षवधाय प्रबलानि च।<br>खड्गशूलगदाशक्तितोमरप्रमुखानि वै॥ ५०<br>शार्ङ्गं धनुस्तथा बाणं परिघं पट्टिशं तथा।<br>चक्रं दिव्यं सहस्रारं सुदर्शनसमप्रभम्॥ ५१<br>तूणीरौ चाक्षयौ दिव्यौ कवचं चातिसुन्दरम्।<br>रथं मेघप्रतीकाशं दृढं भारसहं जवम्॥ ५२<br>युद्धोपकरणं सर्वं कृत्वा पुत्राय पार्थिव।<br>दत्त्वासौ प्रेरयामास त्वष्टा क्रोधसमन्वितः॥ ५३ | ऐसा कहकर पुत्रशोकसे व्याकुल त्वष्टाने विविध प्रकारके दिव्य तथा प्रबल आयुधोंका निर्माण किया और इन्द्रका वध करनेके लिये उस महाबली (वृत्र)-को दे दिया। उनमें खड्ग, शूल, गदा, शक्ति, तोमर, शार्ङ्गधनुष, बाण, परिघ, पट्टिश, सुदर्शन चक्रके समान कान्तिमान् हजार अरोंवाला दिव्य चक्र, दो दिव्य तथा अक्षय तरकस और अत्यन्त सुन्दर कवच एवं मेघके समान श्याम आभावाला, सुदृढ़, भार सहनेमें समर्थ और तीव्रगामी रथ था। इस प्रकार हे राजन्! समस्त युद्धसामग्री तैयार करके क्रोधसे व्याकुल त्वष्टाने अपने पुत्रको देकर उसे भेज दिया॥ ४९-५३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे त्रिशिरवधानन्तरं वृत्रोत्पत्तिवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः
वृत्रासुरका देवलोकपर आक्रमण, बृहस्पतिद्वारा इन्द्रकी भर्त्सना करना और वृत्रासुरको अजेय बतलाना, इन्द्रकी पराजय, त्वष्टाके निर्देशसे वृत्रासुरका ब्रह्माजीको प्रसन्न करनेके लिये तपस्यारत होना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| कृतस्वस्त्ययनो वृत्रो ब्राह्मणैर्वेदपारगैः।<br>निर्जगाम रथारूढो हन्तुं शक्रं महाबलः॥ १ | [हे राजन्!] वेदोंमें पारंगत ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर महाबली वृत्रासुर रथपर सवार हो इन्द्रको मारनेके लिये चला॥ १॥ |
| तदैव राक्षसाः क्रूराः पुरा देवपराजिताः।<br>समाजग्मुश्च सेवार्थं वृत्रं ज्ञात्वा महाबलम्॥ २ | उस समय बहुत-से क्रूर राक्षस जो पहले देवताओंसे पराजित हो गये थे, वृत्रासुरको महान् बलशाली जानकर उसकी सेवाके लिये आ गये॥ २॥ |