देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 740, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 740
अ० २ ] षष्ठ स्कन्ध ७३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं श्रुत्वा निहतं त्वष्टा पुत्रं परमधार्मिकम्।<br>चुकोपातीव मनसा वचनं चेदमब्रवीत्॥ ३० | उस परम धार्मिक पुत्रको मारा गया सुनकर त्वष्टाने मनमें अत्यन्त क्रोधित हो यह वचन कहा— |
| अनागसं मुनिं यस्मात्पुत्रं निहतवान्मम।<br>तस्मादुत्पादयिष्यामि तद्वधार्थं सुतं पुनः॥ ३१ | जिसने मेरे निरपराध मुनिवृत्तिवाले पुत्रको मार डाला है, उसके वधके लिये मैं पुनः पुत्र उत्पन्न करूँगा। देवतालोग मेरे पराक्रम और तपोबलको देख लें; वह पापात्मा भी अपनी करनीका महान् फल जान ले॥ ३०—३२॥ |
| सुराः पश्यन्तु मे वीर्यं तपसश्च बलं तथा।<br>जानातु सर्व पापात्मा स्वकृतस्य फलं महत्॥ ३२ | |
| इत्युक्त्वाग्निं जुहावाथ मन्त्रैराथर्वणोदितैः।<br>पुत्रस्योत्पादनार्थाय त्वष्टा क्रोधसमाकुलः॥ ३३ | ऐसा कहकर क्रोधसे अत्यन्त व्याकुल त्वष्टा पुत्रकी उत्पत्तिके लिये अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे अग्निमें हवन करने लगे॥ ३३॥ |
| कृते होमेऽष्टरात्रं तु सन्दीप्ताच्च विभावसौ।<br>प्रादुर्बभूव तरसा पुरुषः पावकोपमः॥ ३४ | आठ रात्रियोंतक प्रज्वलित अग्निमें हवन करनेपर सहसा अग्निसदृश एक पुरुष प्रकट हुआ॥ ३४॥ |
| तं दृष्ट्वाग्रे सुतं त्वष्टा तेजोबलसमन्वितम्।<br>वेगात्प्रकटितं वह्नेर्दीप्यमानमिवानलम्॥ ३५ | वेगपूर्वक अग्निसे प्रकट हुए और अग्निके सदृश प्रकाशमान तथा तेज-बलसे युक्त उस पुत्रको अपने सम्मुख देखकर त्वष्टाने कहा—हे इन्द्रशत्रु! मेरे तपोबलसे तुम शीघ्र बढ़ जाओ॥ ३५-३६॥ |
| उवाच वचनं त्वष्टा सुतं वीक्ष्य पुरःस्थितम्।<br>इन्द्रशत्रो विवर्धस्व प्रतापात्तपसो मम॥ ३६ | |
| इत्युक्ते वचने त्वष्ट्रा क्रोधप्रज्वलितेन च।<br>सोऽवर्धत दिवं स्तब्ध्वा वैश्वानरसमद्युतिः॥ ३७ | क्रोधसे जाज्वल्यमान त्वष्टाके ऐसा कहते ही अग्निके समान कान्तिवाला वह पुत्र द्युलोकको स्तब्ध करता हुआ बड़ा होने लगा॥ ३७॥ |
| जातः स पर्वताकारः कालमृत्युसमः स्वराट्।<br>किं करोमीति तं प्राह पितरं परमातुरम्॥ ३८ | बढ़ते-बढ़ते वह पर्वताकार विशाल और काल पुरुषके समान भयानक हो गया। उसने अत्यन्त दुःखित अपने पितासे कहा—मैं क्या करूँ? हे नाथ! मेरा नामकरण कीजिये। हे सुव्रत! मुझे कार्य बताइये, आप चिन्तित क्यों हैं? मुझे अपने दुःखका कारण बताइये। मैं आज ही आपके शोकका नाश कर दूँगा—ऐसा मेरा दृढ़ संकल्प है। जिस पुत्रके रहते पिता दुःखी हो, उस पुत्रसे क्या लाभ! मैं शीघ्र ही समुद्रको पी जाऊँगा, पर्वतोंको चूर-चूर कर दूँगा और उगते हुए प्रचण्ड तेजस्वी सूर्यको रोक दूँगा। मैं देवताओंसहित इन्द्रको तथा यमको अथवा अन्य किसी भी देवताको मार डालूँगा। इन सबको तथा पृथिवीको भी उखाड़कर समुद्रमें फेंक दूँगा॥ ३८—४२॥ |
| कुरु मे नामकं नाथ कार्यं कथय सुव्रत।<br>चिन्तातुरोऽसि कस्मात्त्वं ब्रूहि मे शोककारणम्॥ ३९ | |
| नाशयाम्यद्य ते शोकमिति मे व्रतमाहितम्।<br>तेन जातेन किं भूयः पिता भवति दुःखितः॥ ४० | |
| पिबामि सागरं सद्यश्चूर्णयामि धराधरान्।<br>उद्यन्तं वारयाम्यद्य तरणिं तिग्मतेजसम्॥ ४१ | |
| हन्मीन्द्रं ससुरं सद्यो यमं वा देवतान्तरम्।<br>क्षिपामि सागरे सर्वान्समुत्पाट्य च मेदिनीम्॥ ४२ | |
| इत्याकर्ण्य वचस्तस्य त्वष्टा पुत्रस्य पेशलम्।<br>प्रत्युवाचातिमुदितस्तं सुतं पर्वतोपमम्॥ ४३ | उसका यह प्रिय वचन सुनकर त्वष्टाने प्रसन्न हो पर्वतके समान विशाल उस पुत्रसे कहा—॥ ४३॥ |