देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| ७४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्वं सर्वविश्वजननी परिपालयास्मान्<br>पुत्रानिवातिपतितान् रिपुसङ्कटेऽस्मिन् ।<br>मातर्न तेऽस्त्यविदितं भुवनत्रयेऽपि<br>कस्मादुपेक्षसि सुरानसुरप्रतप्तान् ॥ ३५ | हे माता! आप समस्त विश्वकी जननी हैं, शत्रुद्वारा उपस्थित किये गये इस संकटमें पड़े हुए हम सबका आप पुत्रोंके समान परिपालन कीजिये। आपसे तीनों लोकोंमें कुछ भी अज्ञात नहीं है, तो आप असुरोंके द्वारा पीड़ित देवताओंकी उपेक्षा क्यों कर रही हैं?॥ ३५॥ |
| त्रैलोक्यमेतदखिलं विहितं त्वयैव<br>ब्रह्मा हरिः पशुपतिस्तव वासनोत्थाः।<br>कुर्वन्ति कार्यमखिलं स्ववशा न ते ते<br>भ्रूभङ्गचालनवशाद्विहरन्ति कामम् ॥ ३६ | आपने ही इस सम्पूर्ण त्रिलोकीकी रचना की है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आपके ही संकल्पसे उत्पन्न हुए हैं। आपके भृकुटि-विलासमात्रसे वे [सृजन, पालन तथा संहार] समस्त कार्य करते हैं और यथेच्छ विहार करते हैं; वे भी स्वतन्त्र नहीं हैं॥ ३६॥ |
| माता सुतान्यरिभवात्परिपाति दीनान्<br>रीतिस्त्वयैव रचिता प्रकटापराधान्।<br>कस्मान्न पालयसि देवि विनापराधा-<br>नस्मांस्त्वदङ्घ्रिशरणान्करुणारसाब्धे ॥ ३७ | हे देवि! माता प्रत्यक्ष अपराधवाले अपने दुःखी पुत्रोंकी भी कष्टसे सब प्रकारसे रक्षा करती है—यह रीति आपके ही द्वारा निर्मित है; तब हे करुणारसकी समुद्रस्वरूपिणि! आप अपने चरणोंकी शरणमें पड़े हुए हम निरपराध देवताओंका पालन क्यों नहीं कर रही हैं?॥ ३७॥ |
| नूनं मदङ्घ्रिभजनाप्तपदाः किलैते<br>भक्तिं विहाय विभवे सुखभोगलुब्धाः।<br>नेमे कटाक्षविषया इति चेन्न चैषा<br>रीतिः सुते जननकर्तरि चापि दृष्टा ॥ ३८ | हे जननि! यदि आप सोचती हों कि मेरे चरणकमलोंकी आराधनासे राज्य प्राप्त करके देवता मेरी भक्ति छोड़कर वैभव-सुखोंके भोगमें आसक्त हो जायेंगे और इन्हें मेरे कृपाकटाक्षकी आवश्यकता नहीं रह जायगी तो ऐसा सामान्यतः होता ही है, फिर भी जन्म देनेवाली माता अपने पुत्रके प्रति ऐसी भावना रखे—यह रीति कहीं देखी नहीं गयी॥ ३८॥ |
| दोषो न नोऽत्र जननि प्रतिभाति चित्ते<br>यत्ते विहाय भजनं विभवे निमग्नाः।<br>मोहस्त्वया विरचितः प्रभवत्यसौ न-<br>स्तस्मात्स्वभावकरुणे दयसे कथं न॥ ३९ | हे जननि! आपका भजन त्यागकर हमलोग जो भोगमें निमग्न हैं—इसमें हमारे चित्तमें अपना दोष नहीं प्रतीत होता; क्योंकि मोहकी रचना आपने ही की है और वह हमलोगोंको मोहित कर देता है। ऐसी परिस्थितिमें हे करुणामय स्वभाववाली! आप हमपर दया क्यों नहीं करतीं?॥ ३९॥ |
| पूर्वं त्वया जननि दैत्यपतिर्बलिष्ठो<br>व्यापादितो महिषरूपधरः किलाजौ।<br>अस्मत्कृते सकललोकभयावहोऽसौ<br>वृत्रं कथं न भयदं विधुनोषि मातः॥ ४० | हे जननि! पूर्वकालमें आपने हमलोगोंके कल्याणार्थ सभीके लिये भयकारी महिषरूप धारण करनेवाले बलवान् दैत्यराजका वध किया था। हे माता! भय प्रदान करनेवाले वृत्रासुरका भी वध आप क्यों नहीं करतीं?॥ ४०॥ |
| अ० ५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७४७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शुम्भस्तथातिबलवाननुजो निशुम्भ-<br>स्तौ भ्रातरौ तदनुगा निहता हतौ च।<br>वृत्रं तथा जहि खलं प्रबलं दयार्द्वे<br>मत्तं विमोहय तथा न भवेद्यथासौ॥ ४१<br><br>त्वं पालयाद्य विबुधानसुरेण मातः<br>सन्तापितानतितरां भयविह्वलांश्च।<br>नान्योऽस्ति कोऽपि भुवनेषु सुरार्तिहन्ता<br>यः क्लेशजालमखिलं निदहेत्स्वशक्त्या॥ ४२ | शुम्भ और उसके बलवान् भाई निशुम्भ—उन दोनों भाइयोंको आपने मार डाला था और उनके अनुचरोंका भी वध कर दिया था। उसी प्रकार हे दयासे आर्द्रहृदयवाली! अत्यन्त बलशाली, उन्मत्त तथा दुष्ट वृत्रासुरको भी मार डालिये। आप इसे विमोहित कर दें, जिससे यह भी उनकी तरह न हो सके। हे माता! असुरोंके द्वारा अत्यधिक पीड़ित किये गये तथा भयसे व्याकुल हम देवताओंका अब आप ही पालन कीजिये; क्योंकि तीनों लोकोंमें ऐसा कोई नहीं है जो देवताओंका दुःख दूर कर सके और अपनी शक्तिसे सम्पूर्ण कष्टके समूहको नष्ट कर सके॥ ४१-४२॥ |
| वृत्रे दया तव यदि प्रथिता तथापि<br>जह्येनमाशु जनदुःखकरं खलं च।<br>पापात्समुद्धर भवानि शरैः पुनाना<br>नोचेत्प्रयास्यति तमो ननु दुष्टबुद्धिः॥ ४३ | यदि वृत्रासुरपर आपकी अत्यधिक दया हो तो भी आप हमलोगोंके लिये संतापकारक इस दुष्टको शीघ्र ही मार डालिये। हे भवानि! अपने बाणोंसे इसको पवित्र करती हुई आप पापसे इसका उद्धार कर दीजिये, अन्यथा यह दुष्टबुद्धि वृत्रासुर नरक प्राप्त करेगा॥ ४३॥ |
| ते प्रापिताः सुरवनं विबुधारयो ये<br>हत्वा रणेऽपि विशिखैः किल पावितास्ते।<br>त्राता न किं निरयपातभयाद्दयार्दे<br>यच्छत्रवोऽपि न हि किं विनिहंसि वृत्रम्॥ ४४ | जिन दानवोंको युद्धमें आपने बाणोंद्वारा मारकर पवित्र बना दिया, वे नन्दनवनको प्राप्त हो गये। हे दयार्द्र स्वभाववाली! क्या आपने नरकमें गिरनेके भयसे उन शत्रुओंकी रक्षा नहीं की? तो फिर आप वृत्रासुरको क्यों नहीं मारती हैं॥ ४४॥ |
| जानीमहे रिपुरसौ तव सेवको न<br>प्रायेण पीडयति नः किल पापबुद्धिः।<br>यस्तावकस्त्विह भवेदमरानसौ किं<br>त्वत्पादपङ्कजरतान्ननु पीडयेद्वा॥ ४५ | हम यह जानते हैं कि वह आपका सेवक नहीं, शत्रु ही है; क्योंकि वह दुष्ट पापबुद्धि हम सबको सदैव सताया करता है। आपके चरणकमलोंकी भक्तिमें रत हम देवताओंको पीड़ित करनेवाला वह (वृत्रासुर) आपका भक्त कैसे हो सकता है?॥ ४५॥ |
| कुर्मः कथं जननि पूजनमद्य तेऽम्ब<br>पुष्पादिकं तव विनिर्मितमेव यस्मात्।<br>मन्त्रा वयं च सकलं परशक्तिरूपं<br>तस्माद्भवानि चरणे प्रणताः स्म नूनम्॥ ४६ | हे जननि! हे अम्ब! हम आज आपकी पूजा कैसे करें; क्योंकि पुष्पादि [पूजोपचार] तो आपके द्वारा ही बनाये गये हैं। मन्त्र, हमलोग तथा अन्य सब कुछ आपकी पराशक्तिके ही रूप हैं, अतः हे भवानि! हम केवल आपके चरणोंकी शरण ले सकते हैं॥ ४६॥ |
| धन्यास्त एव मनुजा हि भजन्ति भक्त्या<br>पादाम्बुजं तव भवाब्धिजलेषु पोतम्।<br>यं योगिनोऽपि मनसा सततं स्मरन्ति<br>मोक्षार्थिनो विगतरागविकारमोहाः॥ ४७ | वे ही मनुष्य धन्य हैं, जो भवसागरसे पार उतारनेवाले पोतसदृश आपके चरणकमलका निरन्तर भक्तिभावसे भजन करते हैं और राग, मोह आदि विकारोंसे रहित मोक्षकामी योगी भी मनसे जिसका निरन्तर स्मरण करते हैं॥ ४७॥ |
| ७४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ये याज्ञिकाः सकलवेदविदोऽपि नूनं<br>त्वां संस्मरन्ति सततं किल होमकाले।<br>स्वाहां तु तृप्तिजननीममरेश्वराणां<br>भूयः स्वधां पितृगणस्य च तृप्तिहेतुम्॥ ४८ | समस्त वेदोंमें पारंगत वे यज्ञकर्ता भी निश्चय ही धन्य हैं, जो हवनके समय देवताओंको तृप्ति देनेवाली स्वाहा और पितरोंको तृप्ति देनेवाली स्वधाके रूपमें आपका निरन्तर स्मरण करते हैं॥ ४८ ॥ |
| मेधासि कान्तिरसि शान्तिरपि प्रसिद्धा<br>बुद्धिस्त्वमेव विशदार्थकरी नराणाम्।<br>सर्वं त्वमेव विभवं भुवनत्रयेऽस्मिन्-<br>कृत्वा ददासि भजतां कृपया सदैव॥ ४९ | आप ही मेधा हैं, आप ही कान्ति हैं, आप ही शान्ति हैं और मनुष्योंका महान् मनोरथ पूर्ण करनेवाली प्रख्यात बुद्धि भी आप ही हैं। समस्त ऐश्वर्यकी रचना करके आप इस त्रिलोकीमें कृपा करके अपनी आराधना करनेवालेको वैभव प्रदान करती रहती हैं॥ ४९ ॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैर्देवी प्रत्यक्षा साभवत्तदा।<br>चारुरूपधरा तन्वी सर्वाभरणभूषिता॥ ५० | व्यासजी बोले— इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर वे भगवती प्रकट हो गयीं। उन्होंने सुन्दर रूप धारण कर रखा था, वे कोमल विग्रहवाली थीं और समस्त आभूषणोंसे सुसज्जित थीं॥ ५० ॥ |
| पाशांकुशवराभीतिलसद्बाहुचतुष्टया ।<br>रणत्किङ्किणिकाजालरसनाबद्धसत्कटिः ॥ ५१ | वे पाश, अंकुश, वर और अभयमुद्रासे सुशोभित चार भुजाओंसे युक्त थीं, उनकी कमरमें बँधी हुई करधनीके घुँघरू बज रहे थे॥ ५१ ॥ |
| कलकण्ठीरवा कान्ता क्वणत्कङ्कणनूपुरा।<br>चन्द्रखण्डसमाबद्धरत्नमौलिर्विराजिता ॥ ५२ | उन कान्तिमयी भगवतीकी ध्वनि कोयलके समान थी, उनके हाथोंके कंकण और चरणोंके नूपुर बज रहे थे। उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रसे मण्डित रत्नमुकुट सुशोभित हो रहा था॥ ५२ ॥ |
| मन्दस्मितारविन्दास्या नेत्रत्रयविभूषिता।<br>पारिजातप्रसूनाच्छनालवर्णसमप्रभा ॥ ५३ | वे मन्द-मन्द मुसकरा रही थीं, उनका मुख कमलके समान सुशोभित हो रहा था, वे तीन नेत्रोंसे विभूषित थीं तथा पारिजातके पुष्प-नालकी भाँति उनके शरीरकी कान्ति रक्तवर्ण थी॥ ५३ ॥ |
| रक्ताम्बरपरीधाना रक्तचन्दनचर्चिता।<br>प्रसादसुमुखी देवी करुणारससागरा॥ ५४<br><br>सर्वशृङ्गारवेषाढ्या सर्वद्वैतारणिः परा।<br>सर्वज्ञा सर्वकर्त्री च सर्वाधिष्ठानरूपिणी॥ ५५<br><br>सर्ववेदान्तसंसिद्धा सच्चिदानन्दरूपिणी।<br>प्रणेमुस्तां समालोक्य सुरा देवीं पुरःस्थिताम्॥ ५६<br>तानाह प्रणतानम्बा किं वः कार्यं ब्रुवन्तु माम्। | वे लाल रंगके वस्त्र धारण किये हुए थीं और उनके शरीरपर रक्त चन्दन अनुलिप्त था। करुणारसकी सागर वे भगवती प्रसन्न मुख-मण्डलसे शोभा पा रही थीं। वे समस्त शृंगार-वेषसे विभूषित थीं। वे देवी द्वैतभावके लिये अरणीस्वरूपा, परा, सब कुछ जाननेवाली, सबकी रचना करनेवाली, सबकी अधिष्ठानस्वरूपा, सभी वेदान्तोंद्वारा प्रतिपादित और सच्चिदानन्दरूपिणी हैं। उन देवीको अपने सम्मुख स्थित देखकर देवताओंने उन्हें प्रणाम किया। तब उन प्रणत देवताओंसे भगवती अम्बिकाने कहा—आपलोग मुझे अपना कार्य बतायें॥ ५४—५६ १/२ ॥ |
| अ० ६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७४९ |
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| देवा ऊचुः | देवता बोले— आप देवताओंके लिये अत्यन्त दुःखदायी इस शत्रु वृत्रासुरको विमोहित कर दीजिये। उसे आप ऐसा विमोहित कर दें, जिससे वह देवताओंपर विश्वास करने लगे और हमारे आयुधमें इतनी शक्ति भर दीजिये, जिससे यह शत्रु मारा जा सके॥ ५७-५८॥ | | मोहयैनं रिपुं वृत्रं देवानामतिदुःखदम्॥ ५७ | | | यथा विश्वसते देवांस्तथा कुरु विमोहितम्। | | | आयुधे च बलं देहि हतः स्याद्येन वा रिपुः॥ ५८ | | | व्यास उवाच | व्यासजी बोले— तब 'तथास्तु'—ऐसा कहकर भगवती वहीं अन्तर्धान हो गयीं और देवता भी प्रसन्न होकर अपने-अपने भवनोंको चले गये॥ ५९॥ | | तथेत्युक्त्वा भगवती तत्रैवान्तरधीयत। | | | स्वानि स्वानि निकेतानि जग्मुर्देवा मुदान्विताः॥ ५९ | |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे देवीसमाराधनाय देवकृतस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
भगवान् विष्णुका इन्द्रको वृत्रासुरसे सन्धिका परामर्श देना, ऋषियोंकी मध्यस्थतासे इन्द्र और वृत्रासुरमें सन्धि, इन्द्रद्वारा छलपूर्वक वृत्रासुरका वध
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— इस प्रकार वरप्राप्त उन देवता और तपस्वी ऋषिगणोंने (परस्पर मन्त्रणा करके वृत्रासुरके उत्तम आश्रमके लिये प्रस्थान किया) वहाँ तेजसे प्रकाशमान वृत्रासुरको देखा, जो तीनों लोकोंको भस्मसात् करने और देवताओंको निगल जानेके लिये उद्यत प्रतीत होता था। ऋषियोंने वृत्रासुरके समीप जाकर देवताओंकी कार्य-सिद्धिके लिये उससे सामनीतिपूर्ण तथा रसमय प्रिय वचन कहा॥ १-२ ½॥ |
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| एवं प्राप्तवरा देवा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>( जग्मुः सर्वे च सम्मन्त्र्य वृत्रस्याश्रममुत्तमम् ।)<br>ददृशुस्तत्र तं वृत्रं ज्वलन्तमिव तेजसा॥ १ | |
| धक्ष्यन्तमिव लोकांस्त्रीन्ग्रसन्तमिव चामरान्।<br>ऋषयोऽथ ततोऽभ्येत्य वृत्रमूचुः प्रियं वचः॥ २ | |
| देवकार्यार्थसिद्धयर्थं सामयुक्तं रसात्मकम्। | |
| ऋषय ऊचुः | ऋषि बोले— सब लोकोंके लिये भयंकर हे महाभाग वृत्रासुर! आपने इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको व्याप्त कर लिया है, परंतु इन्द्रके साथ आपका वैर आपके सुखको नष्ट करनेवाला है। यह आप दोनोंके लिये दुःखद और चिन्ता बढ़ानेका परम कारण है। न आप सुखसे सो पाते हैं, न ही इन्द्र सन्तुष्ट होकर सोते हैं; क्योंकि आप दोनोंको शत्रु-जन्य भय बना रहता है। आप दोनोंको युद्ध करते हुए भी बहुत समय व्यतीत हो गया है; इससे देवताओं, राक्षसों तथा मनुष्योंसहित समस्त प्रजाको कष्ट हो रहा है॥ ३-६ ½॥ |
| वृत्र वृत्र महाभाग सर्वलोकभयङ्कर॥ ३ | |
| व्याप्तं त्वयैतत्सकलं ब्रह्माण्डमखिलं किल।<br>शक्रेण तव वैरं यत्तत्तु सौख्यविघातकम्॥ ४ | |
| युवयोर्दुःखदं कामं चिन्तावृद्धिकरं परम्।<br>न त्वं स्वपिषि सन्तुष्टो न चापि मघवा तथा॥ ५ | |
| सुखं स्वपिति चिन्तार्तो द्वयोर्यद्वैरिजं भयम्।<br>युवयोर्युध्यतोः कालो व्यतीतस्तु महानिह॥ ६ | |
| पीड्यन्ते च प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानवाः। |
| ७५० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| संसारेऽत्र सुखं ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः॥ ७<br>न सुखं कृतवैरस्य भवतीति विनिर्णयः।<br>संग्रामरसिकाः शूराः प्रशंसन्ति न पण्डिताः॥ ८<br>युद्धं शृङ्गारचतुरा इन्द्रियार्थविघातकम्।<br>पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्निशितैः शरैः॥ ९ | इस संसारमें सुख ही ग्राह्य है और दुःख सर्वथा त्याज्य है—यही परम्परा है। वैर करनेवालेको सुख नहीं प्राप्त होता, यह निश्चित सिद्धान्त है। इसलिये युद्धप्रेमी वीर इन्द्रिय सुखको नष्ट करनेवाले युद्धकी प्रशंसा करते हैं, किंतु शृंगाररसके प्रेमी विद्वान् उसकी प्रशंसा नहीं करते। पुष्पोंसे भी युद्ध नहीं करना चाहिये, फिर तीक्ष्ण बाणोंकी तो बात ही क्या?॥ ७–९॥ |
| युद्धे विजयसन्देहो निश्चयं बाणताडनम्।<br>दैवाधीनमिदं विश्वं तथा जयपराजयौ॥ १०<br>दैवाधीनाविति ज्ञात्वा न योद्धव्यं कदाचन।<br>कालेऽथ भोजनं स्नानं शय्यायां शयनं तथा॥ ११<br>परिचर्यापरा भार्या संसारे सुखसाधनम्।<br>किं सुखं युध्यतः संख्ये बाणवृष्टिभयङ्करे॥ १२<br>खड्गपातातिरौद्रे च तथारातिसुखप्रदे।<br>संग्रामे मरणात्स्वर्गसुखप्राप्तिरिति स्फुटम्॥ १३ | युद्धमें विजय ही हो—यह सन्देहास्पद है, परंतु उसमें बाणोंसे शरीरको पीड़ा प्राप्त होना निश्चित है। यह समस्त विश्व दैवके अधीन है, उसी प्रकार जय-पराजय भी उसीके अधीन हैं। अतः इन्हें दैवाधीन जानकर युद्ध कभी नहीं करना चाहिये। समयपर स्नान, भोजन, शय्यापर शयन और सेवा-परायण पत्नी—ये ही संसारमें सुखके साधन हैं। बाणवर्षासे भयंकर, खड्ग-प्रहारसे अत्यन्त रौद्र तथा शत्रुको सुख प्रदान करनेवाले संग्राममें युद्ध करनेसे क्या सुख प्राप्त हो सकता है?॥ १०–१२½॥ |
| प्रलोभनपरं वाक्यं नोदनार्थं निरर्थकम्।<br>छित्त्वा देहं व्यथां प्राप्य शृगालकरटादिभिः॥ १४<br>पश्चात्स्वर्गसुखावाप्तिं को वा वाञ्छति मन्दधीः।<br>सख्यं भवतु ते वृत्र शक्रेण सह नित्यदा॥ १५ | ऐसा स्पष्ट कथन है कि युद्धमें मरनेसे स्वर्ग-सुखकी प्राप्ति होती है—यह तो प्रलोभन और प्रेरणा देनेवाला तथा निरर्थक वचन है। ऐसा कौन मन्दबुद्धि है जो शरीरको अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल कराकर सियार और कौओंसे नोचवाकर स्वर्गसुखकी प्राप्तिकी कामना करेगा!॥ १३-१४½॥ |
| अवाप्स्यसि सुखं त्वं च शक्रश्चापि निरन्तरम्।<br>वयं च तापसाः सर्वे गन्धर्वाश्च निजाश्रमे॥ १६<br>सुखवासं गमिष्यामः शान्ते वैरेऽधुनैव वाम्।<br>संग्रामे युवयोर्धीर वर्तमाने दिवानिशम्॥ १७<br>पीड्यन्ते मुनयः सर्वे गन्धर्वाः किन्नरा नराः।<br>सर्वेषां शान्तिकामनां सख्यमिच्छामहे वयम्॥ १८ | हे वृत्र! इन्द्रके साथ तुम्हारी स्थायी मैत्री हो जाय, जिससे तुम्हें और इन्द्र—दोनोंको निरन्तर सुखकी प्राप्ति हो। आप दोनोंका वैर शान्त हो जानेसे हम सब तपस्वी और गन्धर्वगण भी अपने-अपने आश्रमोंमें सुखपूर्वक रह सकेंगे। हे धीर! आप दोनोंके दिन-रातके युद्धमें हम सभी मुनियों, गन्धर्वों, किन्नरों और मनुष्योंको कष्ट प्राप्त होता है। सभी लोगोंको शान्ति प्राप्त हो सके—इस कामनासे हम सब आप दोनोंमें मैत्री कराना चाहते हैं॥ १५–१८॥ |
| मुनयस्त्वं च शक्रश्च प्राप्नुवन्तु सुखं किल।<br>मध्यस्थाश्च वयं वृत्र युवयोः सख्यकारणे॥ १९<br>शपथं कारयित्वात्र योजयामो मिथः प्रियम्।<br>शक्रस्तु शपथान्कृत्वा यथोक्तांश्च तवाग्रतः॥ २० | हे वृत्र! मुनिगण, तुम्हें और इन्द्रको सुख प्राप्त हो। हमलोग तुम दोनोंकी मित्रता करानेमें मध्यस्थ बनेंगे। हम शपथ कराकर आप दोनोंको एक-दूसरेका प्रिय मित्र बना देंगे। आप जैसा कहेंगे, वैसे ही इन्द्र भी आपके सम्मुख शपथ लेकर आपके मनको प्रेमसे |
| अ० ६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७५१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| चित्तं ते प्रीतिसंयुक्तं करिष्यति तु साम्प्रतम्।<br>सत्याधारा धरा नूनं सत्येन च दिवाकरः॥ २१<br>तपत्ययं यथाकालं वायुः सत्येन वात्यथ।<br>उदन्वानपि मर्यादां सत्येनैव न मुञ्चति॥ २२<br>तस्मात्सत्येन सख्यं वा भवत्वद्य यथासुखम्।<br>एकत्र शयनं क्रीडा जलकेलिः सुखासनम्॥ २३<br>युवाभ्यां सर्वथा कार्यं कर्तव्यं सख्यमेत्य च। | परिपूर्ण कर देंगे। सत्यके आधारपर ही यह पृथ्वी स्थित है, सत्यसे ही भगवान् सूर्य नित्य तपते हैं, सत्यसे ही समयके अनुसार वायु बहती है और सत्यके कारण ही समुद्र भी अपनी मर्यादाका परित्याग नहीं करता। इसलिये सत्यके आधारपर ही आज आप दोनोंमें मित्रता हो जाय, जिससे आपलोग सुखपूर्वक साथ-साथ शयन, क्रीडा, जलकेलि कर सकें और बैठ सकें। इसलिये आप दोनोंको एकत्रित होकर अवश्य ही मित्रता कर लेनी चाहिये॥ १९—२३ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>महर्षिवचनं श्रुत्वा तानुवाच महामतिः॥ २४<br>अवश्यं भगवन्तो मे माननीयास्तपस्विनः।<br>भवन्तो मुनयः क्वापि न मिथ्यावादिनो भृशम्॥ २५<br>सदाचाराः सुशान्ताश्च न विदुश्छलकारणम्।<br>कृतवैरे शठे स्तब्धे कामुके च गतत्विषि॥ २६<br>निर्लज्जे नैव कर्तव्यं सख्यं मतिमता सदा।<br>निर्लज्जोऽयं दुराचारो ब्रह्महा लम्पटः शठः॥ २७<br>न विश्वासस्तु कर्तव्यः सर्वथैवेदृशे जने।<br>भवन्तो निपुणाः सर्वे न द्रोहमतयः सदा॥ २८<br>अनभिज्ञास्तु शान्तत्वाच्चित्तानामतिवादिनाम्। | व्यासजी बोले—उन महर्षियोंका वचन सुनकर अत्यन्त बुद्धिमान् वृत्रासुरने कहा—हे भगवन्! आप सभी तपस्वीगण मेरे मान्य हैं। आप मुनिगण कभी असत्य भाषण नहीं करते। आपलोग सदाचारी तथा अति शान्त स्वभाववाले हैं और छल करना नहीं जानते। किंतु वैरी, मूर्ख, जड़, कामी, कलंकित और निर्लज्जसे बुद्धिमान्को मित्रता नहीं करनी चाहिये। यह (इन्द्र) निर्लज्ज, दुराचारी, ब्राह्मणघाती, लम्पट और मूर्ख है—इस प्रकारके व्यक्तिका विश्वास नहीं करना चाहिये। आप सभी लोग कुशल हैं, किंतु द्रोह-बुद्धिवाले कभी नहीं हैं। आप सब शान्तचित्त होनेके कारण अतिवादियोंके मनकी बात नहीं जानते॥ २४—२८ १/२ ॥ |
| मुनय ऊचुः<br>जन्तुः कृतस्य भोक्ता वै शुभस्य त्वशुभस्य च॥ २९<br>द्रोहं कृत्वा कुतः शान्तिमाप्नुयान्नष्टचेतनः।<br>विश्वासघातकर्तारो नरकं यान्ति निश्चयम्॥ ३०<br>दुःखं च समवाप्नोति नूनं विश्वासघातकः।<br>निष्कृतिर्ब्रह्महन्तॄणां सुरापानां च निष्कृतिः॥ ३१<br>विश्वासघातिनां नैव मित्रद्रोहकृतामपि।<br>समयं ब्रूहि सर्वज्ञ यथा ते चेतसि ध्रुवम्॥ ३२<br>तेनैव समयेनाद्य सन्धिः स्यादुभयोः किल। | मुनि बोले—प्रत्येक प्राणी अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका फल भोगता है। जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी हो, वह द्रोह करके भी क्या शान्ति प्राप्त कर सकता है? विश्वासघात करनेवाले निश्चय ही नरकमें जाते हैं। विश्वासघाती निश्चितरूपसे दुःख प्राप्त करता है। ब्राह्मणकी हत्या करनेवालों और मद्यपान करनेवालोंके लिये तो प्रायश्चित्त है, परंतु विश्वासघातियों और मित्रद्रोहियोंके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है। अतः हे सर्वज्ञ! आपने मनमें जो शर्त निश्चय कर रखी हो, उसे बताइये; जिससे उस शर्तके अनुसार आज ही आप दोनोंमें सन्धि हो जाय॥ २९—३२ १/२ ॥ |
| वृत्र उवाच<br>न शुष्केण न चार्द्रेण नाश्मना न च दारुणा॥ ३३<br>न वज्रेण महाभाग न दिवा निशि नैव च।<br>वध्यो भवेयं विप्रेन्द्राः शक्रस्य सह दैवतैः॥ ३४<br>एवं मे रोचते सन्धिः शक्रेण सह नान्यथा। | वृत्रासुर बोला—हे महाभाग! सभी देवताओंसहित इन्द्र न शुष्क या गीली वस्तुसे, न पत्थरसे, न काष्ठसे, न वज्रसे, न दिनमें और न रातमें मेरा वध कर सकें। हे विप्रेन्द्रो! इसी शर्तपर मैं इन्द्रसे सन्धि करना चाहता हूँ, अन्यथा नहीं॥ ३३—३४ १/२ ॥ |
| ७५२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| व्यास उवाच | **व्यासजी बोले—**ऋषियोंने उससे आदरपूर्वक कहा—'ठीक है' और तत्पश्चात् देवराज इन्द्रको वहाँ बुलाकर उन्हें वह शर्त सुना दी। इन्द्रने भी मुनियोंकी उपस्थितिमें अग्निको साक्षी करके शपथें लीं और वे सन्तापसे मुक्त हो गये। वृत्रासुर भी उनकी बातोंसे विश्वासमें आ गया और इन्द्रके साथ मित्रकी भाँति व्यवहारपरायण हो गया॥ ३५—३७\frac{१}{२}॥ | | ऋषयस्तं तदा प्राहुर्बाढमित्येव चादृताः ॥ ३५<br>समयं श्रावयामासुस्तत्रानीय सुरेश्वरम् ।<br>इन्द्रोऽपि शपथांस्तत्र चकार विगतज्वरः ॥ ३६<br>साक्षिणं पावकं कृत्वा मुनीनां सन्निधौ किल ।<br>वृत्रस्तु वचनैस्तस्य विश्वासमगमत्तदा ॥ ३७ | | | बभूव मित्रवच्चक्रे सहचर्यापरायणः ।<br>कदाचिन्नन्दने चोभौ कदाचिद् गन्धमादने ॥ ३८<br>कदाचिदुदधेस्तीरे मोदमानौ विचेरतुः ।<br>एवं कृते च सन्धाने वृत्रः प्रमुदितोऽभवत् ॥ ३९<br>शक्रोऽपि वधकामस्तु तदुपायमचिन्तयत् ।<br>रन्ध्रान्वेषी समुद्विग्नस्तदासीन्मघवा भृशम् ॥ ४० | वे दोनों कभी नन्दनवनमें, कभी गन्धमादनपर्वतपर और कभी समुद्रके तटपर आनन्दपूर्वक विचरण करते थे। इस प्रकार सन्धि हो जानेपर वृत्रासुर बहुत प्रसन्न रहता था। लेकिन वधकी इच्छावाले इन्द्र उसके वधके उपाय सोचा करते थे। इन्द्र उसकी कमजोरी ढूँढ़नेके लिये सदा उद्विग्न रहते थे॥ ३८—४०॥ | | एवं चिन्तयतस्तस्य कालः समभवर्तत ।<br>विश्वासं परमं प्राप वृत्रः शक्रेऽतिदारुणे ॥ ४१<br>एवं कतिचिदब्दानि गतानि समये कृते ।<br>वृत्रस्य मरणोपायान्मनसीन्द्रोऽप्यचिन्तयत् ॥ ४२ | इन्द्रके इस प्रकार विचार करते हुए कुछ समय बीत गया। वृत्रासुरको अत्यन्त क्रूर इन्द्रपर अत्यधिक विश्वास हो गया। इस प्रकार सन्धिके कुछ वर्ष बीत जानेपर इन्द्रने मन-ही-मन वृत्रासुरके मरणका उपाय सोच लिया॥ ४१—४२॥ | | त्वष्टैकदा सुतं प्राह विश्वस्तं पाकशासने ।<br>पुत्र वृत्र महाभाग शृणु मे वचनं हितम् ॥ ४३<br>न विश्वासस्तु कर्तव्यः कृतवैरे कथञ्चन ।<br>मघवा कृतवैरस्ते सदासूयापरः परैः ॥ ४४ | एक बार त्वष्टाने इन्द्रपर बहुत अधिक विश्वास करनेवाले पुत्रसे कहा—हे पुत्र वृत्रासुर! हे महाभाग! मेरी हितकर बात सुनो, जिसके साथ शत्रुता हो चुकी हो, उसका विश्वास कभी नहीं करना चाहिये। इन्द्र तुम्हारा शत्रु है, वह दूसरोंके द्वारा तुम्हारे गुणोंमें सदा दोष ढूँढ़ा करता है॥ ४३-४४॥ | | लोभान्मत्तो द्वेषरतः परदुःखोत्सवान्वितः ।<br>परदारलम्पटः स पापबुद्धिः प्रतारकः ॥ ४५<br>रन्ध्रान्वेषी द्रोहपरो मायावी मदगर्वितः ।<br>यः प्रविश्योदरे मातर्गर्भच्छेदं चकार ह ॥ ४६<br>सप्तकृत्वः सप्तकृत्वः क्रन्दमानमनातुरः ।<br>तस्मात्पुत्र न कर्तव्यो विश्वासस्तु कथञ्चन ॥ ४७<br>कृतपापस्य का लज्जा पुनः पुत्र प्रकुर्वतः । | वह सदा लोभसे उन्मत्त रहनेवाला, सबसे द्वेष रखनेवाला, दूसरोंका दुःख देखकर सुखी रहनेवाला, परस्त्रीगामी, पापबुद्धि, कपटी, छिद्रान्वेषी, दूसरोंसे द्रोह करनेवाला, मायावी और अहंकारी है, जिसने कि एक बार माताके उदरमें प्रवेश करके उसके गर्भको सात भागोंमें काट डाला। तब उन्हें रोते देखकर उस निर्दयीने उनके भी पृथक्-पृथक् सात भाग कर दिये।* इसलिये हे पुत्र! उसपर किसी प्रकार भी विश्वास नहीं करना चाहिये। हे पुत्र! पाप करनेवालेको दोबारा पाप करनेमें क्या लज्जा!॥ ४५—४७\frac{१}{२}॥ |
* वे ही उनचास मरुद्गण बने।
अ० ६ ] षष्ठ स्कन्ध ७५३
अ० ६ ] षष्ठ स्कन्ध ७५३
| व्यास उवाच<br>एवं प्रबोधितः पित्रा वचनैर्हेतुसंयुतैः ॥ ४८<br>न बुबोध तदा वृत्र आसन्नमरणः किल। | व्यासजी बोले— इस प्रकार पिताद्वारा कल्याणकारी वचनोंसे समझाये जानेपर भी आसन्न-मृत्यु वृत्रासुरको कुछ भी चेत नहीं हुआ॥ ४८ १/२ ॥ | | स कदाचित्समुद्रान्ते तमपश्यन्महासुरम्॥ ४९<br>सन्ध्याकाल उपावृत्ते मुहूर्तेऽतीव दारुणे।<br>ततः सञ्चिन्त्य मघवा वरदानं महात्मनाम्॥ ५०<br>सन्ध्येयं वर्तते रौद्रा न रात्रिर्दिवसो न च।<br>हन्तव्योऽयं मया चाद्य बलेनैव न संशयः॥ ५१ | एक दिन उन्होंने (इन्द्रने) उस महान् दैत्यको समुद्रके तटपर देखा। उस समय संध्याकालका अत्यन्त भयंकर मुहूर्त उपस्थित था। तब इन्द्रने महात्मा मुनियोंद्वारा निर्धारित शर्त—वरदानपर यह विचार करके कि यह भयंकर संध्याकाल है, इस समय न दिन है, न रात है, अतः मुझे आज ही इसे अपनी शक्तिसे मार डालना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४९—५१॥ | | एकाकी विजने चात्र सम्प्राप्तः समयोचितः।<br>एवं विचार्य मनसा सस्मार हरिमव्ययम्॥ ५२<br>तत्राजगाम भगवानदृश्यः पुरुषोत्तमः।<br>वज्रमध्ये प्रविश्यासौ संस्थितो भगवान्हरिः॥ ५३ | यहाँ एकान्त है और यह अकेला है तथा समय भी अनुकूल है—ऐसा विचारकर उन्होंने अपने मनमें अविनाशी भगवान् श्रीहरिका स्मरण किया। [स्मरण करते ही] पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु वहाँ अदृश्यरूपसे आ गये और वे प्रभु श्रीहरि इन्द्रके वज्रमें प्रविष्ट होकर विराजमान हो गये॥ ५२-५३॥ | | इन्द्रो बुद्धिं चकाराशु तदा वृत्रवधं प्रति।<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा कथं हन्यां रिपुं रणे॥ ५४<br>अजेयं सर्वथा सर्वदेवैश्च दानवैस्तथा।<br>यदि वृत्रं न हन्यद्य वञ्चयित्वा महाबलम्॥ ५५<br>न श्रेयो मम नूनं स्यात्सर्वथा रिपुरक्षणात्।<br>अपां फेनं तदापश्यत्समुद्रे पर्वतोपमम्॥ ५६ | तब इन्द्र वृत्रासुरको मारनेकी युक्ति सोचने लगे कि सभी देवताओं तथा दानवोंसे सर्वथा अजेय इस शत्रुको युद्धमें कैसे मारूँ? यदि छल करके इस महाबलीको आज नहीं मारता तो इस शत्रुके जीवित रहते किसी भी प्रकार कल्याण नहीं है। इन्द्र ऐसा विचार कर ही रहे थे तभी उन्होंने समुद्रमें पर्वतके समान जलफेनको देखा॥ ५४—५६॥ | | नायं शुष्को न चार्द्रोऽयं न च शस्त्रमिदं तथा।<br>अपां फेनं तदा शक्रो जग्राह किल लीलया॥ ५७ | यह न सूखा है, न गीला है और यह न तो कोई शस्त्र है, [ऐसा विचारकर] इन्द्रने उस समुद्रफेनको लीलापूर्वक उठा लिया॥ ५७॥ | | परां शक्तिं च सस्मार भक्त्या परमया युतः।<br>स्मृतमात्रा तदा देवी स्वांशं फेने न्यधापयत्॥ ५८ | तदनन्तर उन्होंने परम भक्तिपूर्वक, पराशक्ति जगदम्बाका स्मरण किया, तब स्मरण करते ही देवीने अपना अंश उस फेनमें स्थापित कर दिया॥ ५८॥ | | वज्रं तदावृतं तत्र चकार हरिसंयुतम्।<br>फेनावृतं पविं तत्र शक्रश्चिक्षेप तं प्रति॥ ५९ | इन्द्रने भगवान् श्रीहरिसे युक्त वज्रको उस फेनसे आवृत कर दिया और उस फेनसे आवृत वज्रको वृत्रासुरके ऊपर फेंका॥ ५९॥ | | सहसा निपपाताशु वज्राहत इवाचलः।<br>वासवस्तु प्रहृष्टात्मा बभूव निहते तदा॥ ६० | उस वज्रके अचानक प्रहारसे वह पर्वतकी भाँति गिर पड़ा। तब उसके मर जानेपर इन्द्र अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो उठे | | ऋषयश्च महेन्द्रं तमस्तुवन्विविधैः स्तवैः।<br>हतशत्रुः प्रहृष्टात्मा वासवः सह दैवतैः॥ ६१ | और ऋषिगण विविध स्तोत्रोंसे देवराज इन्द्रकी स्तुति करने लगे। उस शत्रुके मारे जानेसे प्रसन्नचित्त इन्द्रने देवताओंके साथ उन भगवतीकी |
| ७५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
|---|
| देवीं सम्पूजयामास यत्प्रसादाद्धतो रिपुः।<br>प्रसादयामास तदा स्तोत्रैर्नानाविधैरपि॥ ६२ | पूजा की तथा विविध स्तोत्रोंसे उन्हें प्रसन्न किया, जिनकी कृपासे शत्रु मारा गया॥ ६०–६२॥ | | देवोद्याने पराशक्तेः प्रासादमकरोद्धरिः।<br>पद्मरागमयीं मूर्तिं स्थापयामास वासवः॥ ६३<br><br>त्रिकालं महतीं पूजां चक्रुः सर्वेऽपि निर्जराः।<br>तदाप्रभृति देवानां श्रीदेवी कुलदैवतम्॥ ६४ | तत्पश्चात् इन्द्रने देवोद्यान नन्दनवनमें पराशक्ति भगवतीका मन्दिर बनवाया और उसमें पद्मराग मणियोंसे निर्मित मूर्तिकी स्थापना की और सभी देवता भी तीनों समय उनकी महती पूजा करने लगे; तभीसे श्रीदेवी ही उन देवताओंकी कुलदेवी हो गयीं॥ ६३-६४॥ | | विष्णुं त्रिभुवनश्रेष्ठं पूजयामास वासवः।<br>ततो हते महावीर्ये वृत्रे देवभयङ्करे॥ ६५<br><br>प्रववौ च शिवो वायुर्जहृषुर्दैवतास्तथा।<br>हते तस्मिन्सगन्धर्वा यक्षराक्षसकिन्नराः॥ ६६ | तब महापराक्रमी और देवताओंके लिये भयंकर वृत्रके मारे जानेपर इन्द्रने तीनों लोकोंमें श्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी पूजा की। उस वृत्रासुरके मर जानेपर कल्याणकारी वायु बहने लगी तथा देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नरगण हर्षित हो उठे॥ ६५-६६॥ | | इत्थं वृत्रः पराशक्तिप्रवेशयुतफेनतः।<br>तया कृतविमोहाच्च शक्रेण सहसा हतः॥ ६७<br><br>ततो वृत्रनिहन्त्रीति देवी लोकेषु गीयते।<br>शक्रेण निहतत्वाच्च शक्रेण हत उच्यते॥ ६८ | इस प्रकार भगवती पराशक्तिके समुद्रफेनसे संयुक्त होने और उनके द्वारा ही विमोहित किये जानेके कारण वृत्रासुर सहसा इन्द्रके द्वारा मारा गया। इसलिये वे भगवती देवी संसारमें 'वृत्रनिहन्त्री' इस नामसे विख्यात हुईं और वह वृत्रासुर चूँकि प्रकटरूपसे इन्द्रके द्वारा मारा गया था, इसलिये उसे इन्द्रके द्वारा मारा गया, ऐसा कहा जाता है॥ ६७-६८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे छद्मनेन्द्रेण फेनद्वारा पराशक्तिस्मरणपूर्वकं वृत्रहननवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
अथ सप्तमोऽध्यायः
त्वष्टाका वृत्रासुरकी पारलौकिक क्रिया करके इन्द्रको शाप देना, इन्द्रको ब्रह्महत्या लगना, नहुषका स्वर्गाधिपति बनना और इन्द्राणीपर आसक्त होना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| अथ तं पतितं दृष्ट्वा विष्णुर्विष्णुपुरीं ययौ।<br>मनसा शङ्कमानस्तु तस्य हत्याकृतं भयम्॥ १ | इस प्रकार उसे गिरा हुआ देखकर मन-ही-मन हत्याके भयसे सशंकित भगवान् विष्णु वैकुण्ठलोकको चले गये॥ १॥ |
| इन्द्रोऽपि भयसंत्रस्तो ययाविन्द्रपुरीं ततः।<br>मुनयो भयसंविग्ना ह्यभवन्निहते रिपौ॥ २<br><br>किमस्माभिः कृतं पापं यदसौ वञ्चितः किल।<br>मुनिशब्दो वृथा जातः सुरेशस्य च सङ्गमात्॥ ३ | तत्पश्चात् इन्द्र भी भयभीत होकर इन्द्रपुरीको चल दिये। उस शत्रु (वृत्रासुर)-के मारे जानेपर मुनिगण भी भयग्रस्त हो गये कि हमने छलपूर्ण यह कैसा पापकृत्य कर डाला। इन्द्रका साथ देनेसे हमारा 'मुनि' नाम व्यर्थ हो गया॥ २-३॥ |
| अस्माकं वचनाद् वृत्रो विश्वासमगमत्किल।<br>विश्वासघातिनः सङ्गाद्वयं विश्वासघातकाः॥ ४ | हमारी ही बातोंसे वृत्रासुरको विश्वास आया; विश्वासघातीके संगसे हम सब भी विश्वासघाती हो गये॥ ४॥ |
अ० ७ ] षष्ठ स्कन्ध [ ७५५
अ० ७ ] षष्ठ स्कन्ध [ ७५५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| धिगियं ममता पापमूलमेवमनर्थकृत्।<br>यदस्माभिश्चलं कृत्वा शपथैर्वञ्चितोऽसुरः॥ ५ | पापकी जड़ और अनर्थकारी इस ममताको धिक्कार है, जिसके कारण हमलोगोंने छलपूर्वक शपथ ली और उस असुर (वृत्रासुर)-को धोखा दिया॥ ५॥ |
| मन्त्रकृद् बुद्धिदाता च प्रेरकः पापकारिणाम्।<br>पापभाक्स भवेन्नूनं पक्षकर्ता तथैव च॥ ६ | पाप करनेका परामर्श देनेवाला, पाप करनेके लिये बुद्धि देनेवाला, पापकी प्रेरणा देनेवाला तथा पाप करनेवालोंका पक्ष लेनेवाला भी निश्चय ही पापकर्ताके समान पापभाजन होता है॥ ६॥ |
| विष्णुनापि कृतं पापं यत्साहाय्यमवाप्तवान्।<br>वज्रं प्रविश्य येनासौ पातितः सत्त्वमूर्त्तिना॥ ७ | वज्रमें प्रविष्ट होकर वृत्रकी हत्या करनेमें सत्त्वगुणके मूर्तरूप भगवान् विष्णुने इन्द्रकी सहायता की और उसे मारा, अतः उन्होंने भी पाप किया॥ ७॥ |
| नूनं स्वार्थपरः प्राणी न पापात् त्रासमश्नुते।<br>हरिणा हरिसङ्गेन सर्वथा दुष्कृतं कृतम्॥ ८ | स्वार्थपरायण प्राणी पापसे भयभीत नहीं होता। विष्णुने इन्द्रका साथ देकर सर्वथा दुष्कृत कर्म किया॥ ८॥ |
| द्वावेव स्तः पदार्थानां द्वावेव निधनं गतौ।<br>प्रथमश्च तुरीयश्च यौ त्रिलोक्यां तु दुर्लभौ॥ ९ | चार पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष)-मेंसे दो ही रह गये हैं और दो समाप्त हो गये हैं। उनमें भी प्रथम पदार्थ धर्म और चतुर्थ पदार्थ मोक्ष दोनों त्रिलोकमें दुर्लभ ही हो गये हैं॥ ९॥ |
| अर्थकामौ प्रशस्तौ द्वौ सर्वेषां सम्मतौ प्रियौ।<br>धर्माधर्मेति वाग्वादो दम्भोऽयं महतामपि॥ १० | अर्थ और काम ही सबके प्रिय और प्रशस्त माने गये हैं। धर्म और अधर्मकी विवेचना—यह बड़े लोगोंका वाचिक दम्भमात्र ही रह गया है॥ १०॥ |
| मुनयोऽपि मनस्तापमेवं कृत्वा पुनः पुनः।<br>जग्मुः स्वानाश्रमानेव विमनस्का हतोद्यमाः॥ ११ | इस प्रकार मुनिगण भी बार-बार मनमें सन्ताप करके उदासमनसे हतोत्साह होकर अपने-अपने आश्रमोंको चले गये॥ ११॥ |
| त्वष्टा तु निहतं श्रुत्वा पुत्रमिन्द्रेण भारत।<br>रुरोद दुःखसन्तप्तो निर्वेदमगमत्पुनः॥ १२ | हे भारत! उधर अपने पुत्रको इन्द्रद्वारा मारा गया सुनकर त्वष्टा दुःखसे सन्तप्त होकर अत्यन्त दुःखित हो रोने लगे; उन्हें इससे बहुत वेदना हुई॥ १२॥ |
| यत्रासौ पतितस्तत्र गत्वा वीक्ष्य तथागतम्।<br>संस्कारं कारयामास विधिवत्पारलौकिकम्॥ १३ | तदनन्तर जहाँ वह (वृत्र) गिरा पड़ा था, वहाँ जाकर उसे उस स्थितिमें देखकर त्वष्टाने विधिपूर्वक उसका पारलौकिक संस्कार कराया॥ १३॥ |
| स्नात्वास्य सलिलं दत्त्वा कृत्वा चैवौर्ध्वदैहिकम्।<br>शशापेन्द्रं स शोकार्तः पापिष्ठं मित्रघातकम्॥ १४<br><br>यथा मे निहतः पुत्रः प्रलोभ्य शपथैर्भृशम्।<br>तथेन्द्रोऽपि महद्दुःखं प्राप्नोतु विधिनिर्मितम्॥ १५ | तत्पश्चात् स्नान करके, जलाञ्जलि देकर उसका और्ध्वदैहिक कर्म सम्पन्न करनेके पश्चात् उन शोकसन्तप्त त्वष्टाने पापी और मित्रघाती इन्द्रको इस प्रकार शाप दे दिया कि जिस प्रकार शपथोंसे प्रलोभितकर इन्द्रने मेरे पुत्रको मार डाला है, उसी प्रकार वह भी विधाताद्वारा दिये हुए महान् दुःख प्राप्त करे॥ १४–१५॥ |
| ७५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इति शप्त्वा सुरेशानं त्वष्टा तापसमन्वितः।<br>मेरोः शिखरमास्थाय तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ १६ | इस प्रकार देवराज इन्द्रको शाप देकर सन्तप्त त्वष्टा सुमेरुपर्वतके शिखरका आश्रय लेकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥ १६॥ |
| जनमेजय उवाच<br>हत्वा त्वाष्ट्रं सुरेशोऽथ कामवस्थामवाप्तवान्।<br>सुखं वा दुःखमेवाग्रे तन्मे ब्रूहि पितामह॥ १७ | जनमेजय बोले— हे पितामह ! वृत्रासुरको मारनेके बाद इन्द्रकी क्या दशा हुई ? उन्हें बादमें सुख मिला या दुःख, इसे मुझे बताइये॥ १७॥ |
| व्यास उवाच<br>किं पृच्छसि महाभाग सन्देहः कीदृशस्तव।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ १८<br><br>बलिष्ठैर्दुर्बलैर्वापि स्वल्पं वा बहु वा कृतम्।<br>सर्वथैव हि भोक्तव्यं सदेवासुरमानुषैः॥ १९ | व्यासजी बोले— हे महाभाग ! तुम क्या पूछ रहे हो, [इस विषयमें] तुम्हें क्या सन्देह है ? किये गये शुभ-अशुभ कर्मका फल तो अवश्य ही भोगना पड़ता है। देवता, राक्षस और मनुष्यसहित बलवान् या दुर्बल कोई भी हो—सभीको अपने द्वारा किये गये अत्यन्त अल्प या अधिक कर्मका फल सर्वथा भोगना ही पड़ता है॥ १८-१९॥ |
| शक्रायेत्थं मतिर्दत्ता हरिणा वृत्रघातिने।<br>प्रविष्टोऽथ पविं विष्णुः सहायः प्रत्यपद्यत॥ २०<br><br>न चापदि सहायोऽभूद्वासुदेवः कथञ्चन।<br>समये स्वजनः सर्वः संसारेऽस्मिन्नराधिप॥ २१<br><br>दैवे विमुखतां प्राप्ते न कोऽप्यस्ति सहायवान्।<br>पिता माता तथा भार्या भ्राता वाथ सहोदरः॥ २२<br><br>सेवको वापि मित्रं वा पुत्रश्चैव तथौरसः।<br>प्रतिकूले गते दैवे न कोऽप्येति सहायताम्॥ २३ | भगवान् विष्णुने वृत्रघाती इन्द्रको इस प्रकारकी मति प्रदान की थी। वे विष्णु उनके वज्रमें प्रविष्ट हुए थे तथा उनके सहायक बने थे; परंतु विपत्तिमें उन्होंने किसी भी तरह सहायता नहीं की। हे राजन् ! इस संसारमें अच्छे समयमें सभी लोग अपने बन जाते हैं, किंतु दैवके प्रतिकूल होनेपर कोई भी सहायक नहीं होता। पिता, माता, पत्नी, सहोदर भाई, सेवक, मित्र एवं औरस पुत्र—कोई भी दैवके प्रतिकूल हो जानेपर सहायता नहीं करता। पाप या पुण्य करनेवाला ही उसका भागी होता है॥ २०–२३ १/२॥ |
| भोक्ता पापस्य पुण्यस्य कर्ता भवति सर्वथा।<br>वृत्रं हत्वा गताः सर्वे निस्तेजस्कः शचीपतिः॥ २४<br><br>शेपुस्तं त्रिदशाः सर्वे ब्रह्महत्येत्यब्रुवञ्छनैः।<br>को नाम शपथान्कृत्वा सत्यं दत्त्वा वचः पुनः॥ २५<br><br>जिघांसति सुविश्वस्तं मुनिं मित्रत्वमागतम्।<br>देवगोष्ठ्यां सुरोद्याने गन्धर्वाणां समागमे॥ २६<br><br>सर्वत्रैव कथा तस्य विस्तारमगमत्किल।<br>किं कृतं दुष्कृतं कर्म शक्रेणाद्य जिघांसता॥ २७<br><br>वृत्रं छलेन विश्वस्तं मुनिभिश्च प्रतारितम्।<br>वेदप्रमाणमुत्सृज्य स्वीकृतं सौगतं मतम्॥ २८ | वृत्रके मारे जानेपर अन्य सभी लोग चले गये; इन्द्र तेजहीन हो गये। सभी देवता उसकी निन्दा करने लगे और ‘यह ब्रह्महत्या है’—ऐसा मन्द स्वरमें कहने लगे। कौन ऐसा होगा जो शपथ खाकर और वचन देकर अत्यन्त विश्वासमें आये हुए तथा मित्रताको प्राप्त मुनिको मारनेकी इच्छा करेगा ! उसकी यह बात देवताओंकी सभामें, देवोद्यानमें तथा गन्धर्वोंके समाजमें सर्वत्र फैल गयी। हत्या करनेकी इच्छावाले इन्द्रने आज यह कैसा दुष्कृत कर्म कर डाला ! मुनियोंके द्वारा विश्वास दिलाये गये वृत्रासुरको छलपूर्वक मार करके (मानो) इन्द्रने वेदोंकी प्रामाणिकताका त्यागकर सौगतोंका मत स्वीकार कर लिया। इन्द्रने छल करके अत्यन्त साहससे शत्रुको |
| अ० ७ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७५७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यदयं निहतः शत्रुर्वञ्चयित्वातिसाहसात् ।<br>को नाम वचनं दत्त्वा विपरीतमथाचरेत् ॥ २९<br>विना शक्रं हरिं वापि यथायं विनिपातितः ।<br>एवंविधाः कथाश्चान्याः समाजेष्वभवन्भृशम् ॥ ३० | मार डाला। वचन देकर भी जिस प्रकार [छलपूर्वक] यह वृत्रासुर मारा गया, वैसा विपरीत आचरण इन्द्र और विष्णुके अतिरिक्त कौन होगा, जो कर सकता है ! इस प्रकारकी कथाएँ तथा और भी बातें लोगोंमें व्यापक रूपसे होने लगीं ॥ २८–३० ॥ |
| शुश्रावेन्द्रोऽपि विविधाः स्वकीर्तेर्हानिकारकाः ।<br>यस्य कीर्तिर्हृता लोके धिक्कस्यैव कुजीवितम् ॥ ३१<br>यं दृष्ट्वा पथि गच्छन्तं शत्रुः स्मेरमुखो भवेत् ।<br>इन्द्रद्युम्नोऽपि राजर्षिः पतितः कीर्तिसंक्षयात् ॥ ३२<br>स्वर्गादकृतपापोऽसौ पापकृत्किं न पात्यते ।<br>स्वल्पेऽपराधेऽपि नृपो ययातिः पतितः किल ॥ ३३<br>नृपः कर्कटतां प्राप्तो युगानष्टादशैव तु ।<br>भृगुपत्नीशिरश्छेदाद्भगवान्हरिरच्युतः ॥ ३४<br>ब्रह्मशापात्पशोर्योनौ सञ्जातो मकरादिषु ।<br>विष्णुश्च वामनो भूत्वा याचनार्थं बलेर्गृहे ॥ ३५<br>गतः किमपरं दुःखं प्राप्नोति दुष्कृती नरः ।<br>रामोऽपि वनवासेषु सीताविरहजं बहु ॥ ३६<br>दुःखं च प्राप्तवान्घोरं भृगुशापेन भारत ।<br>तथेन्द्रोऽपि ब्रह्महत्याकृतं प्राप्य महद्भयम् ॥ ३७<br>न स्वास्थ्यं प्राप गेहेऽसौ सर्वसिद्धिसमन्विते ।<br>पौलोमी तं सभाहीनं दृष्ट्वा प्रोवाच वासवम् ॥ ३८<br>निःश्वसन्तं भयत्रस्तं नष्टसंज्ञं विचेतसम् ।<br>किं प्रभोऽद्य भयार्तोऽसि मृतस्ते दारुणो रिपुः ॥ ३९<br>का चिन्ता वर्तते कान्त तव शत्रुनिषूदन ।<br>कस्माच्छोचसि लोकेश निःश्वसन्नाकृतो यथा ॥ ४०<br>नान्योऽस्ति बलवाञ्छत्रुर्यैन चिन्तापरो भवान् । | इन्द्र भी अपनी कीर्ति नष्ट करनेवाली तरह-तरहकी बातें सुनते रहे। संसारमें जिसकी कीर्ति नष्ट हो गयी, उसके कलुषित जीवनको धिक्कार है। रास्तेमें जाते हुए ऐसे व्यक्तिको देखकर शत्रु हँस पड़ता है। राजर्षि इन्द्रद्युम्नने कोई पाप नहीं किया था फिर भी कीर्ति नष्ट हो जानेसे वे स्वर्गसे गिर गये थे; तब पाप करनेवाला कैसे नहीं गिरेगा ? राजा ययातिका बहुत थोड़ेसे अपराधपर पतन हो गया था। इसी प्रकार एक राजाको अठारह युगोंतक केकड़ेकी योनिमें रहना पड़ा था। भृगुकी पत्नीका मस्तक काटनेके कारण अच्युत भगवान् श्रीहरिको ब्रह्मशापसे मकर आदि रूपोंमें पशुयोनिमें जन्म लेना पड़ा। विष्णुको भी वामन होकर याचनाके लिये बलिके घर जाना पड़ा; तब यदि कुकर्मी मनुष्य दुःख पाये तो क्या आश्चर्य है ! हे भारत! श्रीरामचन्द्रजीको भी भृगुके शापसे वनवासकालमें सीतासे वियोगका महान् कष्ट उठाना पड़ा। उसी प्रकार इन्द्रको भी ब्रह्महत्याजनित महान् भय प्राप्त करके समस्त सिद्धियोंसे युक्त भवनमें भी सुख नहीं प्राप्त होता था। उन्हें दीर्घ श्वास लेते, भयग्रस्त, चेतनारहित, खिन्नमनस्क और सभामें न जाते देखकर शचीने पूछा—हे प्रभो! आजकल आप भयभीत क्यों रहते हैं, आपका भयंकर शत्रु तो मर गया है। हे कान्त! हे शत्रुहन्ता! आपको क्या चिन्ता है? हे लोकेश! साधारण मनुष्यकी भाँति लम्बी-लम्बी साँसें लेते हुए आप शोक क्यों करते हैं? आपका कोई बलवान् शत्रु भी तो नहीं है, जिससे आप चिन्ताकुल हों ॥ ३१–४० ½ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>नारातिर्बलवान्मेऽस्ति न शान्तिर्न सुखं तथा ॥ ४१<br>ब्रह्महत्याभयाद्राज्ञि बिभेमि सततं गृहे ।<br>न नन्दनं सुखकरं नामृतं न गृहं वनम् ॥ ४२ | **इन्द्र बोले—**हे राज्ञि! यद्यपि अब मेरा कोई बलवान् शत्रु नहीं है तथापि ब्रह्महत्याके भयसे मैं निरन्तर डरता रहता हूँ। घरमें रहते हुए भी मुझे न सुख है और न शान्ति। नन्दनवन, अमृत, घर तथा वन—कुछ भी मुझे सुखकर नहीं लगता। गन्धर्वोंका |
| ७५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गन्धर्वाणां तथा गेयं नृत्यमप्सरसां पुनः ।<br>न त्वं सुखकरा नारी नाना च सुरयोषितः ॥ ४३<br>न तथा कामधेनुश्च देववृक्षः सुखप्रदः ।<br>किं करोमि क्व गच्छामि क्व शर्म मम जायते ॥ ४४<br>इति चिन्तापरः कान्ते न लभे सुखमात्मनि । | गान और अप्सराओंका नृत्य तथा यहाँतक कि तुम और अन्य देवांगनाएँ भी मुझे सुखकर नहीं लगतीं। न कामधेनु और न ही कल्पवृक्ष मुझे सुख प्रदान करते हैं। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मुझे शान्ति कहाँ मिलेगी? हे प्रिये! इसी चिन्तामें पड़ा हुआ मैं अपने मनमें शान्ति नहीं प्राप्त कर पा रहा हूँ॥ ४१–४४ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा वचनं शक्रः प्रियां परमकातराम् ॥ ४५<br>निर्जगाम गृहान्मन्दो मानसं सर उत्तमम् ।<br>पद्मनाले प्रविष्टोऽसौ भयार्तः शोककर्षितः ॥ ४६<br>न प्राज्ञायत देवेन्द्रस्त्वभिभूतश्च कल्मषैः ।<br>प्रतिच्छन्नो वसत्यप्सु चेष्टमान इवोरगः ॥ ४७<br>असहायस्तुराषाडैच्चिन्तार्तो विकलेन्द्रियः । | व्यासजी बोले— अत्यन्त घबरायी हुई अपनी प्रिय पत्नीसे ऐसा कहकर मूढ़ इन्द्र घरसे निकल पड़े और उत्तम मानसरोवरको चले गये। भयसे पीडित और शोककन्तप्त होकर वे एक कमलनालमें प्रविष्ट हो गये। पापकर्मोंसे पराभूत हुए देवराज इन्द्रको कोई जान नहीं सका। वे सर्पके समान चेष्टा करते हुए जलमें छिपकर रह रहे थे। उस समय वे इन्द्र असहाय, चिन्तित और व्याकुल इन्द्रियोंवाले हो गये॥ ४५–४७ १/२॥ |
| ततः प्रनष्टे देवेन्द्रे ब्रह्महत्याभयार्दिते ॥ ४८<br>सुराश्चिन्तातुराश्चासन्नुत्पाताश्चाभवन्नथ ।<br>ऋषयः सिद्धगन्धर्वा भयार्ताश्चाभवन्भृशम् ॥ ४९<br>अराजकं जगत्सर्वमभिभूतमुपद्रवैः ।<br>अवर्षणं तदा जातं पृथिवी क्षीणवैभवा ॥ ५०<br>विच्छिन्नस्रोतसो नद्यः सरांस्यनुदकानि वै ।<br>एवं त्वराजके जाते देवता मुनयस्तथा ॥ ५१<br>विचार्य नहुषं चक्रुः शक्रं सर्वे दिवौकसः । | ब्रह्महत्याके भयसे दुःखी होकर देवराज इन्द्रके अदृश्य हो जानेपर देवगण चिन्तातुर हो उठे तथा अनेक प्रकारके उत्पात होने लगे। ऋषि, सिद्ध और गन्धर्वगण भी अत्यन्त भयभीत हो गये। उपद्रवोंके होनेसे सम्पूर्ण जगत् अराजकतासे ग्रस्त हो गया। उस समय अनावृष्टि उपस्थित हो गयी और पृथिवी वैभवशून्य हो गयी, नदियोंके स्रोत सूख गये और तालाब बिना जलके हो गये—इस प्रकारकी अराजकताको देखकर स्वर्गके देवताओं और मुनियोंने विचार करके नहुषको इन्द्र बना दिया॥ ४८–५१ १/२॥ |
| सम्प्राप्य नहुषो राजा धर्मिष्ठोऽपि रजोबलात् ॥ ५२<br>बभूव विषयासक्तः पञ्चबाणशराहतः ।<br>अप्सरोभिर्वृतः क्रीडन्देवोद्यानेषु भारत ॥ ५३ | राज्य प्राप्त करनेपर राजा नहुष धर्मात्मा होते हुए भी राजसी वृत्तिके कारण कामबाणसे आहत हो विषयासक्त हो गये। हे भारत! देवोद्यानोंमें क्रीडारत रहते हुए वे सदा अप्सराओंसे घिरे रहते थे॥ ५२-५३॥ |
| शक्रपत्नीगुणाञ्छ्रुत्वा चकमे तां स पार्थिवः ।<br>ऋषीनाह किमिन्द्राणी नोपगच्छति मां किल ॥ ५४<br>भवद्भिश्चामरैः सर्वैः कृतोऽहं वासवस्त्विह ।<br>प्रेषयध्वं सुराः कामं सेवार्थं मम वै शचीम् ॥ ५५<br>प्रियं चेन्मम कर्तव्यं सर्वथा मुनयोऽमराः ।<br>अहमिन्द्रोऽद्य देवानां लोकानां च तथेश्वरः ॥ ५६<br>आगच्छतु शची मह्यं क्षिप्रमद्य निवेशनम् । | उस राजा नहुषके मनमें इन्द्राणी शचीके गुणोंको सुनकर उन्हें प्राप्त करनेकी इच्छा हुई। उसने ऋषियोंसे कहा—मेरे पास इन्द्राणी क्यों नहीं आती? आपलोग और देवताओंने मुझे इन्द्र बनाया, इसलिये हे देवताओ! शचीको मेरी सेवाके लिये भेजिये। हे मुनियो तथा देवताओ! आपलोगोंको मेरा प्रिय कार्य अवश्य करना चाहिये। इस समय मैं देवताओंका इन्द्र और समस्त लोकोंका स्वामी हूँ; शची शीघ्र ही आज मेरे भवनमें आ जायँ॥ ५४—५६ १/२॥ |
अ० ८ ] षष्ठ स्कन्ध ७५१
अ० ८ ] षष्ठ स्कन्ध ७५१
इति तस्य वचः श्रुत्वा देवा देवर्षयस्तथा ॥ ५७
गत्वा चिन्तातुराः प्रोचुः पौलोमीं प्रणतास्ततः।
इन्द्रपत्नि दुराचारो नहुषस्त्वामिहेच्छति ॥ ५८
कुपितोऽस्मानुवाचेदं प्रेषयध्वं शचीमिह।
किं कुर्मस्तदधीनाः स्मो येनेन्द्रोऽयं कृतः किल ॥ ५९
तच्छ्रुत्वा दुर्मना देवी बृहस्पतिमुवाच ह।
रक्ष मां नहुषाद् ब्रह्मंस्तवास्मि शरणं गता ॥ ६०
बृहस्पतिरुवाच
न भेतव्यं त्वया देवि नहुषात्पापमोहितात्।
न त्वां दास्याम्यहं वत्से त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् ॥ ६१
शरणागतमार्तं च यो ददाति नराधमः।
स एव नरकं याति यावदाभूतसंप्लवम्।
स्वस्था भव पृथुश्रोणि न त्यक्ष्ये त्वां कदाचन ॥ ६२
उसकी यह बात सुनकर चिन्तासे व्याकुल देवता तथा ऋषिगण शचीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके कहने लगे—हे इन्द्रपत्नि ! दुराचारी नहुष इस समय आपकी कामना करता है। उसने क्रुद्ध होकर हमसे यह बात कही है ‘शचीको यहाँ भेज दीजिये।’ हम उसके अधीन हैं, अतः कर ही क्या सकते हैं; क्योंकि उसे इन्द्र बना दिया गया है ॥ ५७–५९॥
यह सुनकर दुःखितमन शचीने बृहस्पतिसे कहा—‘हे ब्रह्मन्! नहुषसे मेरी रक्षा कीजिये; मैं आपकी शरणमें हूँ’ ॥ ६० ॥
बृहस्पति बोले—हे देवि ! पापसे मोहित नहुषसे तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। हे पुत्रि ! मैं सनातनधर्मका त्यागकर तुम्हें उसको नहीं दूँगा ॥ ६१ ॥
जो अधम मनुष्य शरणमें आये हुए तथा दुःखी प्राणीको दूसरोंको सौंप देता है वह प्रलयपर्यन्त नरकमें वास करता है। अतः हे पृथुश्रोणि ! तुम निश्चिन्त रहो, मैं तुम्हारा त्याग कभी नहीं करूँगा॥ ६२॥
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे इन्द्रस्य पद्मनालप्रवेशानन्तरं नहुषस्य देवेन्द्रपदेऽभिषेकवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः
इन्द्राणीको बृहस्पतिकी शरणमें जानकर नहुषका क्रुद्ध होना, देवताओंका नहुषको समझाना, बृहस्पतिके परामर्शसे इन्द्राणीका नहुषसे समय माँगना, देवताओंका भगवान् विष्णुके पास जाना और विष्णुका उन्हें देवीको प्रसन्न करनेके लिये अश्वमेधयज्ञ करनेको कहना, बृहस्पतिको शचीको भगवतीकी आराधना करनेको कहना, शचीकी आराधनासे प्रसन्न होकर देवीका प्रकट होना और शचीको इन्द्रका दर्शन होना
व्यास उवाच
नहुषस्त्वथ तां श्रुत्वा गुरोस्तु शरणं गताम्।
चुक्रोध स्मरबाणार्तस्तमाङ्गिरसमाशु वै ॥ १
देवावाहाङ्गिरससूनुर्हन्तव्योऽयं मया किल।
इतीन्द्राणीं गृहे मूढो रक्षतीति मया श्रुतम् ॥ २
इति तं कुपितं दृष्ट्वा देवाः सर्षपुरोगमाः।
अब्रुवन्नहुषं घोरं सामपूर्वं वचस्तदा ॥ ३
व्यासजी बोले—वे शची देवगुरुकी शरणमें चली गयी हैं—ऐसा सुनकर कामबाणसे आहत नहुष अंगिरापुत्र बृहस्पतिपर बहुत कुपित हुआ और उसने देवताओंसे कहा—यह अंगिरापुत्र बृहस्पति आज मेरेद्वारा निश्चय ही मारा जायगा; क्योंकि मैंने ऐसा सुना है कि उस मूर्खने इन्द्राणीको अपने घरमें रखा है॥ १-२॥
इस प्रकार नहुषको क्रुद्ध देखकर प्रधान ऋषियोंसहित देवतागण उस दुष्टसे सामनीतियुक्त वचन बोले—॥ ३॥
| ७६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| क्रोधं संहर राजेन्द्र त्यज पापमतिं प्रभो।<br>निन्दन्ति धर्मशास्त्रेषु परदाराभिमर्शनम्॥ ४ | हे राजेन्द्र! क्रोध दूर करो और पापकारिणी बुद्धिका त्याग करो। हे प्रभो! [मनीषियोंने] धर्मशास्त्रोंमें परस्त्रीगमनकी निन्दा की है॥ ४॥ |
| शक्रपत्नी सदा साध्वी जीवमाने पतौ पुनः।<br>कथमन्यं पतिं कुर्यात्सुभगातिपतिव्रता॥ ५ | इन्द्रकी पत्नी शची सदासे अत्यन्त साध्वी, सौभाग्यवती और पतिव्रता हैं; फिर अपने पतिके जीवित रहते वे कैसे दूसरेको पति बना सकती हैं?॥ ५॥ |
| त्रिलोकीशस्त्वमधुना शास्ता धर्मस्य वै विभो।<br>त्वादृशोऽधर्ममातिष्ठेत्तदा नश्येत्प्रजा ध्रुवम्॥ ६ | हे विभो! आज इस समय आप तीनों लोकोंके स्वामी तथा धर्मके रक्षक हैं। आप-जैसा राजा अधर्ममें स्थित हो जाय तब तो निश्चितरूपसे प्रजाका नाश हो जायगा॥ ६॥ |
| सर्वथा प्रभुणा कार्यं शिष्टाचारस्य रक्षणम्।<br>वारमुख्याश्च शतशो वर्तन्तेऽत्र शचीसमाः॥ ७ | राजाको सब प्रकारसे सदाचारकी रक्षा करनी चाहिये। यहाँ स्वर्गमें तो शचीके सदृश सैकड़ों प्रमुख अप्सराएँ हैं॥ ७॥ |
| रतिस्तु कारणं प्रोक्तं शृङ्गारस्य महात्मभिः।<br>रसहानिर्बलात्कारे कृते सति तु जायते॥ ८ | महात्माओंने रतिको ही शृंगारका कारण बताया है, बलप्रयोग किये जानेपर तो रसकी हानि ही होती है॥ ८॥ |
| उभयोः सदृशं प्रेम यदि पार्थिवसत्तम।<br>तदा वै सुखसम्पत्तिरुभयोरुपजायते॥ ९ | हे नृपश्रेष्ठ! जब [स्त्री-पुरुष] दोनोंमें एक समान प्रेम रहता है, तभी उन दोनोंको अधिक सुख प्राप्त होता है॥ ९॥ |
| तस्माद्भावमिमं मुञ्च परदाराभिमर्शने।<br>सद्भावं कुरु देवेन्द्र पदं प्राप्तोऽस्यनुत्तमम्॥ १० | अतः हे देवेन्द्र! परस्त्रीगमनकी यह भावना छोड़ दीजिये और श्रेष्ठ आचरण कीजिये; क्योंकि आपको इन्द्र-जैसा अतिश्रेष्ठ पद प्राप्त है॥ १०॥ |
| ऋद्धिक्षयस्तु पापेन पुण्यैनातिविवर्धनम्।<br>तस्मात्पापं परित्यज्य सन्मतिं कुरु पार्थिव॥ ११ | हे राजन्! पापसे सम्पत्तिका क्षय होता है और पुण्यसे महान् वृद्धि होती है, इसलिये पापकर्म छोड़कर सात्त्विक बुद्धिका आश्रय लीजिये॥ ११॥ |
| नहुष उवाच<br>गौतमस्य यदा भुक्ता दाराः शक्रेण देवताः।<br>वाचस्पतेस्तु सोमेन क्व यूयं संस्थितास्तदा॥ १२ | नहुषने कहा—हे देवताओ! जब देवराज इन्द्रने गौतमकी पत्नीके साथ और चन्द्रमाने बृहस्पतिकी पत्नीके साथ अनाचार किया था, तब तुमलोग कहाँ थे?॥ १२॥ |
| परोपदेशे कुशला प्रभवन्ति नराः किल।<br>कर्ता चैवोपदेष्टा च दुर्लभः पुरुषो भवेत्॥ १३ | लोग दूसरोंको उपदेश देनेमें बहुत कुशल होते हैं, परंतु उपदेश देनेवाला तथा उसका पालन करनेवाला पुरुष दुर्लभ होता है॥ १३॥ |
| मामागच्छतु सा देवी हितं स्यादद्भुतं हि वः।<br>एतस्याः परमं देवाः सुखमेवं भविष्यति॥ १४ | हे देवताओ! वह शची मेरे पास आ जाय, इसीमें आप सबका परम कल्याण है; इससे उसको भी अत्यन्त सुख मिलेगा॥ १४॥ |
| अन्यथा न हि तुष्येऽहं सत्यमेतद् ब्रवीमि वः।<br>विनयाद्वा बलाद्वापि तामाशु प्रापयन्त्विह॥ १५ | अन्य किसी भी प्रकारसे मैं सन्तुष्ट नहीं होऊँगा, यह मैं तुमलोगोंसे कह रहा हूँ। इसलिये विनयसे या बलपूर्वक तुमलोग उसे शीघ्र ही मुझे प्राप्त कराओ॥ १५॥ |
| अ० ८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७६१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इति तस्य वचः श्रुत्वा देवाश्च मुनयस्तथा।<br>तमूचुश्चातिसन्त्रस्ता नहुषं मदनातुरम्॥ १६<br>इन्द्राणीमानयिष्यामः सामपूर्वं तवान्तिकम्।<br>इत्युक्त्वा ते तदा जग्मुर्बृहस्पतिनिकेतनम्॥ १७ | उसकी यह बात सुनकर भयभीत देवताओं और मुनियोंने उस कामातुर नहुषसे कहा—हमलोग सामनीतिसे इन्द्राणीको आपके पास लायेंगे—ऐसा कहकर वे लोग बृहस्पतिके निवासपर चले गये॥ १६-१७॥ |
| व्यास उवाच<br>ते गत्वाङ्गिरसः पुत्रं प्रोचुः प्राञ्जलयः सुराः।<br>जानीमः शरणं प्राप्तामिन्द्राणीं तव वेश्मनि॥ १८<br>सा देया नहुषायाद्य वासवेऽसौ कृतो यतः।<br>वृणोत्वियं वरारोहा पतित्वे वरवर्णिनी॥ १९ | व्यासजी बोले—तदनन्तर वे देवगण अंगिराके पुत्र बृहस्पतिके पास जाकर हाथ जोड़कर उनसे बोले—हमें ज्ञात हुआ है कि इन्द्राणीको आपके घरमें शरण प्राप्त है, उन्हें आज ही नहुषको देना है; क्योंकि वह इन्द्र बना दिया गया है। यह सुलक्षणा सुन्दरी उन्हें पतिके रूपमें वरण कर ले॥ १८-१९॥ |
| बृहस्पतिः सुरानाह तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः।<br>नाहं त्यक्ष्ये तु पौलोमीं सतीं च शरणागताम्॥ २० | यह दारुण वचन सुनकर बृहस्पतीने देवताओंसे कहा—मैं शरणमें आयी हुई इस पतिव्रता शचीका त्याग नहीं करूँगा॥ २०॥ |
| देवा ऊचुः<br>उपायोऽन्यः प्रकर्तव्यो येन सोऽद्य प्रसीदति।<br>अन्यथा कोपसंयुक्तो दुराराध्यो भविष्यति॥ २१ | देवगण बोले—तब दूसरा कोई उपाय करना चाहिये, जिससे वह आज प्रसन्न हो जाय, अन्यथा क्रुद्ध होनेपर वह दुराराध्य हो जायगा॥ २१॥ |
| गुरुरुवाच<br>तत्र गत्वा शची भूपं प्रलोभ्य वचसा भृशम्।<br>करोतु समयं बाला पतिं ज्ञात्वा मृतं भजे॥ २२<br>इन्द्रे जीवति मे कान्ते कथमम्यं करोम्यहम्।<br>अन्वेषणार्थं गन्तव्यं मया तस्य महात्मनः॥ २३<br>इति सा समयं कृत्वा वञ्चयित्वा च भूपतिम्।<br>भर्तुरानयने यत्नं करोतु मम वाक्यतः॥ २४ | देवगुरु बोले—सुन्दरी शची वहाँ जाकर राजाको अपनी बातसे अत्यन्त मोहित करके यह शपथ ले कि ‘अपने पतिको मृत जाननेके बाद ही मैं आपको अंगीकार करूँगी। अपने पति इन्द्रके जीवित रहते मैं किसी दूसरेको पति कैसे बना लूँ? इसलिये उन महाभागकी खोजके लिये मुझे जाना पड़ेगा।’ इस प्रकार वह मेरे कथनके अनुसार शपथ लेकर और राजाको छलकर अपने पतिको लानेका प्रयत्न करे॥ २२—२४॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मे सर्वे बृहस्पतिपुरोगमाः।<br>नहुषं सहिता जग्मुरिन्द्रपत्न्या दिवौकसः॥ २५ | ऐसा विचार करके सभी देवता बृहस्पतिको आगे करके इन्द्रपत्नी शचीके साथ नहुषके पास गये॥ २५॥ |
| तानागतान्समीक्ष्याह तदा कृत्रिमवासवः।<br>जहर्ष च मुदायुक्तस्तां वीक्ष्य मुदितोऽब्रवीत्॥ २६<br>अद्यास्मि वासवः कान्ते भज मां चारुलोचने।<br>पतित्वे सर्वलोकस्य पूज्योऽहं विहितः सुरैः॥ २७ | उन सभीको आया हुआ देखकर वह कृत्रिम इन्द्र नहुष हर्षित हुआ। उस शचीको देखकर वह आनन्दित हो गया और प्रसन्नतापूर्वक बोला—हे प्रिये! आज मैं इन्द्र हूँ, हे सुन्दर नेत्रोंवाली! मुझे पतिरूपमें अंगीकार करो। मैं देवताओंके द्वारा सम्पूर्ण लोकका पूज्य बना दिया गया हूँ॥ २६-२७॥ |
| इत्युक्ता सा नृपं प्राह वेपमाना त्रपायुता।<br>वरमिच्छाम्यहं राजंस्त्वत्तः प्राप्तं सुरेश्वर॥ २८ | नहुषके ऐसा कहनेपर शचीने लज्जित होकर काँपते हुए कहा—हे राजन्! हे सुरेश्वर! मैं आपसे एक वरप्राप्तिकी इच्छा करती हूँ। आप कुछ समयतक |
७६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ८
७६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ८
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| किञ्चित्कालं प्रतीक्षस्व यावत्कुर्वे विनिर्णयम्।<br>इन्द्रोऽस्तीति न वास्तीति सन्देहो मे हृदि स्थितः॥ २९<br>ततस्त्वां समुपस्थास्ये कृत्वा निश्चयमात्मनि।<br>तावत्क्षमस्व राजेन्द्र सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ३०<br>न हि विज्ञायते शक्रो नष्टः किं वा क्व वा गतः।<br>एवमुक्तः स चेन्द्राण्या नहुषः प्रीतिमानभूत्॥ ३१ | प्रतीक्षा करें, जबतक मैं यह निर्णय कर लूँ कि मेरे पति इन्द्र जीवित हैं या नहीं; क्योंकि इस बातका मेरे मनमें सन्देह है। मनमें इसका निश्चय करनेके अनन्तर मैं आपकी सेवामें उपस्थित होऊँगी। हे राजेन्द्र! तबतकके लिये क्षमा कीजिये; यह मैं सत्य कह रही हूँ। अभी यह ज्ञात नहीं है कि इन्द्र नष्ट हो गये हैं या कहीं चले गये हैं॥ २८-३० १/२ ॥ |
| व्यसर्जयत्स तां देवीं तथेत्युक्त्वा मुदान्वितः।<br>सा विसृष्टा नृपेणाशु गत्वा प्राह सुरान्सती॥ ३२<br>इन्द्रस्यागमने यत्नं कुरुताद्य कृतोद्यमाः।<br>श्रुत्वा तद्वचनं देवा इन्द्राण्या रसवच्छुचि॥ ३३ | इन्द्राणीके ऐसा कहनेपर नहुष प्रसन्न हो गया और 'ऐसा ही हो'—यह कहकर उसने उन देवी शचीको प्रसन्नतापूर्वक विदा किया। राजासे मुक्ति पाकर वह पतिव्रता शची शीघ्रतापूर्वक देवताओंके पास जाकर बोली—आपलोग उद्यमशील होकर इन्द्रको ले आनेका प्रयास करें॥ ३१-३२ १/२ ॥ |
| मन्त्रयामासुरेकाग्राः शक्रार्थं नृपसत्तम।<br>ते गत्वा वैष्णवं धाम तुष्टुवुः परमेश्वरम्॥ ३४<br>आदिदेवं जगन्नाथं शरणागतवत्सलम्।<br>ऊचुश्चैनं समुद्विग्ना वाक्यं वाक्यविशारदाः॥ ३५ | हे नृपश्रेष्ठ! इन्द्राणीका पवित्र और मधुर वचन सुनकर सभी देवताओंने एकाग्र होकर इन्द्रके विषयमें विचार-विमर्श किया। तदनन्तर वे वैकुण्ठलोक जाकर शरणागतवत्सल आदिदेव भगवान् जगन्नाथकी स्तुति करने लगे। उन वाक्पटुविशारद देवताओंने उद्विग्न होकर इस प्रकार कहा— ॥ ३३-३५ ॥ |
| देवदेव सुरपतिर्ब्रह्महत्याप्रपीडितः।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां क्वापि तिष्ठति वासवः॥ ३६<br>त्वद्धिया निहते विप्रे ब्रह्महत्या कुतः प्रभो।<br>त्वं गतिस्तस्य भगवन्नस्माकं च तथैव हि॥ ३७<br>त्राहि नः परमापन्नान्मोक्षं तस्य विनिर्देश।<br>देवानां वचनं श्रुत्वा कातरं विष्णुरब्रवीत्॥ ३८ | हे देवाधिदेव! ब्रह्महत्यासे पीड़ित देवराज इन्द्र सभी प्राणियोंसे अदृश्य होकर कहीं रह रहे हैं। हे प्रभो! आपके परामर्शसे ही उन्होंने ब्राह्मण वृत्रासुरका वध किया था। तब ब्रह्महत्या कहाँ हुई? हे भगवन्! आप ही उनकी और हम सबकी एकमात्र गति हैं। इस महान् कष्टमें पड़े हुए हम सबकी रक्षा कीजिये और उन इन्द्रके ब्रह्महत्यासे छूटनेका उपाय बताइये॥ ३६-३७ १/२ ॥ |
| यजतामश्वमेधेन शक्रपापनिवृत्तये।<br>पुण्येन हयमेधेन पावितः पाकशासनः॥ ३९<br>पुनरेष्यति देवानामिन्द्रत्वमकुतोभयः।<br>हयमेधेन सन्तुष्टा देवी श्रीजगदम्बिका॥ ४०<br>ब्रह्महत्यादिपापानि नाशयिष्यत्यसंशयम्।<br>यस्याः स्मरणमात्रेण पापजालं विनश्यति॥ ४१<br>किं पुनर्वाजिमेधेन तत्प्रीत्यर्थं कृतेन च।<br>इन्द्राणी कुरुतान्नित्यं भगवत्याः प्रपूजनम्॥ ४२ | देवताओंका करुण वचन सुनकर भगवान् विष्णु बोले—इन्द्रके पापकी निवृत्तिके लिये अश्वमेधयज्ञ कीजिये; अश्वमेध करनेसे प्राप्त पुण्यसे इन्द्र पवित्र हो जायेंगे। इससे वे पुनः देवताओंके इन्द्रत्वको पा जायेंगे, फिर कोई भय नहीं रहेगा। अश्वमेधयज्ञसे भगवती श्रीजगदम्बिका प्रसन्न होकर ब्रह्महत्या आदि पाप निश्चितरूपसे नष्ट कर देंगी। जिनके स्मरणमात्रसे पापोंका समूह नष्ट हो जाता है, उन जगदम्बाकी प्रसन्नताके लिये किये गये अश्वमेधयज्ञका क्या कहना! इन्द्राणी भी नित्य भगवती जगदम्बाकी पूजा |
| अ० ८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७६३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आराधनं शिवायास्तु सुखकारि भविष्यति।<br>नहुषोऽपि जगन्मातुर्मायया मोहितः किल॥ ४३<br><br>विनाशं स्वकृतेनाशु गमिष्यत्येनसा सुराः।<br>पावितश्चाश्वमेधेन तुराषाडपि वैभवम्॥ ४४ | करें; भगवती शिवाकी आराधना सुखकारी होगी। हे देवताओ! नहुष भी जगदम्बिकाकी मायासे मोहित होकर शीघ्र ही अपने किये हुए पापसे अवश्य विनष्ट हो जायगा। अश्वमेधयज्ञसे पवित्र होकर इन्द्र भी शीघ्र ही अपने उत्तम इन्द्रपद और वैभवको प्राप्त करेंगे॥ ३८–४४ १/२॥ |
| प्राप्स्यत्यचिरकालेन स्वमासनमनुत्तमम्।<br>ते तु श्रुत्वा शुभां वाणीं विष्णोरमिततेजसः॥ ४५<br><br>जग्मुस्तं देशमनिशं यत्रास्ते पाकशासनः।<br>तमाश्वास्य सुराः शक्रं बृहस्पतिपुरोगमाः॥ ४६ | अमित तेजवाले भगवान् विष्णुकी इस शुभ वाणीको सुनकर वे देवगण उस स्थानको चल दिये जहाँ इन्द्र रह रहे थे। बृहस्पतिके नेतृत्वमें देवताओंने इन्द्रको आश्वासन देकर सम्पूर्ण अश्वमेध महायज्ञ सम्पन्न कराया॥ ४५–४६ १/२॥ |
| कारयामासुरखिलं हयमेधं महाक्रतुम्।<br>विभज्य ब्रह्महत्यां तु वृक्षेषु च नदीषु च॥ ४७<br><br>पर्वतेषु पृथिव्यां च स्त्रीषु चैवाक्षिपद्विभुः।<br>तां विसृज्य च भूतेषु विपापः पाकशासनः॥ ४८<br><br>विज्वरः समभूद् भूयः कालाकाङ्क्षी स्थितो जले।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां पद्मनाले व्यतिष्ठत॥ ४९ | तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने ब्रह्महत्याको विभाजितकर वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्रियोंपर फेंक दिया। इस प्रकार उसको प्राणि-पदार्थोंमें विसर्जित करके इन्द्र पापरहित हो गये। सन्तापरहित होनेपर भी इन्द्र अच्छे समयकी प्रतीक्षा करते हुए जलमें ही ठहरे रहे। वहाँ सभी प्राणियोंसे अदृश्य रहते हुए जलमें वे एक कमलनालमें स्थित रहे॥ ४७–४९॥ |
| देवास्तु निर्गताः स्थाने कृत्वा कार्यं तदद्भुतम्।<br>पौलोमी तु गुरुं प्राह दुःखिता विरहाकुला॥ ५०<br><br>कृतयज्ञोऽपि मे भर्ता किमदृश्यः पुरन्दरः।<br>कथं द्रक्ष्ये प्रियं स्वामिंस्तमुपायं वदस्व मे॥ ५१ | देवगण उस अद्भुत कार्यको करके अपने स्थानको चले गये। तब शचीने दुःख और वियोगसे व्याकुल होकर देवगुरु बृहस्पतिसे कहा—यज्ञ करनेपर भी मेरे स्वामी इन्द्र क्यों अदृश्य हैं? हे स्वामिन्! मैं अपने प्रियको कैसे देख सकूँगी; आप मुझे उस उपायको बतायें॥ ५०–५१॥ |
| बृहस्पतिरुवाच<br>त्वमाराधय पौलोमि देवीं भगवतीं शिवाम्।<br>दर्शयिष्यति ते नाथं देवी विगतकल्मषम्॥ ५२<br><br>आराधिता जगद्धात्री नहुषं वारयिष्यति।<br>मोहयित्वा नृपं स्थानात्यातयिष्यति चाम्बिका॥ ५३ | बृहस्पति बोले—हे पौलोमि! तुम देवी भगवती शिवाकी आराधना करो। वे देवी तुम्हारे पापरहित पतिका तुम्हें दर्शन करायेंगी। आराधना करनेपर जगत्का पालन करनेवाली वे भगवती नहुषको शक्तिहीन कर देंगी। वे अम्बिका राजाको मोहित करके उसे उसके स्थानसे गिरा देंगी॥ ५२–५३॥ |
| इत्युक्ता सा तदा तेन पुलोमतनया नृप।<br>जग्राह मन्त्रं विधिवद् गुरोर्देव्याः ससाधनम्॥ ५४ | हे राजन्! बृहस्पतिजीके ऐसा कहनेपर पुलोमापुत्री शचीने देवगुरुसे पूजाविधिसहित देवीका मन्त्र विधिवत् प्राप्त कर लिया॥ ५४॥ |
| विद्यां प्राप्य गुरोर्देवी देवीं श्रीभुवनेश्वरीम्।<br>सम्यगाराधयामास बलिपुष्पार्चनैः शुभैः॥ ५५ | गुरुसे मन्त्रविद्या प्राप्त करके देवी शचीने बलि, पुष्प आदि शुभ अर्चनोंसे भगवती श्रीभुवनेश्वरीकी सम्यक् आराधना की॥ ५५॥ |
| ७६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| त्यक्तान्यभोगसम्भारा तापसीवेषधारिणी।<br>चकार पूजनं देव्याः प्रियदर्शनलालसा॥ ५६ | अपने प्रिय पतिके दर्शनकी लालसासे युक्त शची समस्त भोगोंका त्यागकर तपस्विनीका वेश धारणकर देवीका पूजन करने लगीं॥ ५६॥ |
| कालेन कियता तुष्टा प्रत्यक्षं दर्शनं ददौ।<br>सौम्यरूपधरा देवी वरदा हंसवाहिनी॥ ५७<br><br>सूर्यकोटिप्रतीकाशा चन्द्रकोटिसुशीतला।<br>विद्युत्कोटिसमानाभा चतुर्वेदसमन्विता॥ ५८<br><br>पाशांकुशाभयवरान्दधती निजबाहुभिः।<br>आपादलम्बिनीं स्वच्छां मुक्तामालां च बिभ्रती॥ ५९<br><br>प्रसन्नस्मेरवदना लोचनत्रयभूषिता।<br>आब्रह्मकीटजननी करुणामृतसागरा॥ ६०<br><br>अनन्तकोटिब्रह्माण्डनायिका परमेश्वरी।<br>सौम्यानन्तरसैर्युक्तस्तनद्वयविराजिता ॥ ६१<br><br>सर्वेश्वरी च सर्वज्ञा कूटस्थाक्षररूपिणी।<br>तामुवाच प्रसन्ना सा शक्रपत्नीं कृतोद्यमाम्॥ ६२<br><br>मेघगम्भीरशब्देन मुदमाददती भृशम्। | [ आराधना करनेपर] कुछ समय बाद प्रसन्न होकर भगवतीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। वे वरदायिनी देवी सौम्य रूप धारण किये हुए हंसपर सवार थीं। वे करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, करोड़ों चन्द्रमाओंके समान शीतल, करोड़ों विद्युत्के समान प्रभासे युक्त और चारों वेदोंसे समन्वित थीं। उन्होंने अपनी भुजाओंमें पाश, अंकुश, अभय तथा वर-मुद्राएँ धारण कर रखी थीं, वे चरणोंतक लटकती हुई स्वच्छ मोतियोंकी माला पहने हुए थीं। उनके मुखपर मधुर मुसकान थी और वे तीन नेत्रोंसे सुशोभित थीं। ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सभी प्राणियोंकी जननी, करुणारूपी अमृतकी सागरस्वरूपा तथा अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी अधीश्वरी वे परमेश्वरी सौम्य थीं तथा अनन्त रसोंसे आपूरित स्तनयुगलसे सुशोभित हो रही थीं। सबकी अधीश्वरी, सब कुछ जाननेवाली, कूटस्थ और बीजाक्षरस्वरूपिणी वे भगवती उद्यमशील इन्द्रपत्नी शचीसे प्रसन्न होकर मेघके समान अत्यन्त गम्भीर वाणीके द्वारा उन्हें परम हर्षित करती हुई कहने लगीं॥ ५७—६२ १/२॥ |
| देव्युवाच<br>वरं वरय सुश्रोणि वाञ्छितं शक्रवल्लभे॥ ६३<br><br>ददाम्यद्य प्रसन्नास्मि पूजिता सुभृशं त्वया।<br>वरदाहं समायाता दर्शनं सहजं न मे॥ ६४<br><br>अनेककोटिजन्मोत्थपुण्यपुञ्जैर्र्हि लभ्यते। | देवी बोलीं— हे सुन्दर कटिप्रदेशवाली इन्द्रप्रिये! अपना अभिलषित वर माँगो, तुम्हारे द्वारा सम्यक् प्रकारसे पूजित मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ, मैं तुम्हें आज वरदान दूँगी। मैं वर प्रदान करनेके लिये आयी हूँ; मेरा दर्शन सहज सुलभ नहीं है। करोड़ों जन्मोंकी संचित पुण्यराशिसे ही यह प्राप्त होता है॥ ६३-६४ १/२॥ |
| इत्युक्ता सा तदा देवी तामाह प्रणता पुरः॥ ६५<br><br>शक्रपत्नी भगवतीं प्रसन्नां परमेश्वरीम्।<br>वाञ्छामि दर्शनं मातः पत्युः परमदुर्लभम्॥ ६६<br><br>नहुषाद्भयनाशं च स्वपदप्रापणं तथा। | उनके ऐसा कहनेपर इन्द्रपत्नी देवी शचीने सम्मुख स्थित होकर उन प्रसन्न भगवती परमेश्वरीसे विनतभावसे कहा—हे माता! मैं अपने पतिका अत्यन्त दुर्लभ दर्शन, नहुषसे उत्पन्न भयका नाश और अपने पदकी पुनः प्राप्ति चाहती हूँ॥ ६५-६६ १/२॥ |
| देव्युवाच<br>गच्छ त्वमनया दूत्या सार्धं श्रीमानसं सरः॥ ६७<br><br>यत्र मे मूर्तिरचला विश्वकामाभिधा मता।<br>तत्र पश्यसि शक्रं त्वं दुःखितं भयविह्वलम्॥ ६८<br><br>मोहयिष्यामि राजानं कालेन कियता पुनः। | देवी बोलीं— तुम [मेरी] इस दूतीके साथ मानसरोवर चली जाओ, जहाँ मेरी विश्वकामा नामक अचल मूर्ति प्रतिष्ठित है, वहीं तुम्हें भयभीत और दुःखी इन्द्रके दर्शन हो जायेंगे। कुछ समय बाद मैं पुनः राजाको मोहित करूँगी। हे विशालाक्षि! तुम |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
| अ० ९ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७६५ |
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| स्वस्था भव विशालाक्षि करोमि तव चेप्सितम्॥ ६९ <br><br> भ्रंशयिष्यामि भूपालं मोहितं त्रिदशासनात्। | शान्तचित्त हो जाओ, मैं तुम्हारा अभिलषित कार्य करूँगी। मैं मोहग्रस्त राजा [नहुष]-को इन्द्रपदसे गिरा दूँगी॥ ६७—६९ १/२॥ | | व्यास उवाच <br> देवीदूती तां गृहीत्वा शक्रपत्नीं त्वरान्विता॥ ७० <br><br> प्रापयामास सान्निध्यं स्वपत्युः परमेश्वरीम्। <br> सा दृष्ट्वा तं पतिं बाला सुरेशं गुप्तसंस्थितम्। <br> मुदिताभूद्वरं वीक्ष्य बहुकालाभिवाञ्छितम्॥ ७१ | व्यासजी बोले—तदनन्तर परमेश्वरी इन्द्रपत्नीको ले जाकर देवीकी दूतीने शीघ्रतापूर्वक उनके पति इन्द्रके पास पहुँचा दिया। गुप्तरूपसे रहते हुए अपने पति उन देवराज इन्द्रको देखकर और इस प्रकार चिरकालसे वांछित अपने वरकी प्राप्ति करके वे शची अत्यन्त प्रसन्न हुई॥ ७०-७१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
इन्द्राण्या शक्रदर्शनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
अथ नवमोऽध्यायः
शचीका इन्द्रसे अपना दुःख कहना, इन्द्रका शचीको सलाह देना कि वह नहुषसे ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें आनेको कहे, नहुषका ऋषियोंद्वारा वहन की जा रही पालकीमें सवार होना और शापित होकर सर्प होना तथा इन्द्रका पुनः स्वर्गाधिपति बनना
| व्यास उवाच <br> तां वीक्ष्य विपुलापाङ्गीं रहः शोकसमान्विताम्। <br> आखण्डलः प्रियां भार्यां विस्मितश्चाब्रवीत्तदा॥ १ | व्यासजी बोले—विशाल नेत्रोंवाली अपनी शोकाकुल प्रिय पत्नीको वहाँ एकान्तमें देखकर इन्द्र आश्चर्यचकित हो गये और बोले—॥ १॥ |
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| कथमत्रागता कान्ते कथं ज्ञातस्त्वया ह्यहम्। <br> दुर्ज्ञेयः सर्वभूतानां संस्थितोऽस्मि शुभानने॥ २ | हे प्रिये! तुम यहाँ कैसे आयी? तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ कि मैं यहाँ हूँ? हे शुभानने! मैं सभी प्राणियोंसे अज्ञात रहते हुए यहाँ निवास कर रहा हूँ॥ २॥ |
| शच्युवाच <br> देव देव्याः प्रसादेन ज्ञातोऽस्यद्य भवानिह। <br> पुनस्तस्याः प्रसादेन प्राप्तास्मि त्वां दिवस्पते॥ ३ | शची बोली—हे देव! देवी भगवतीकी कृपासे आप आज मुझे यहाँ ज्ञात हुए हैं। हे देवेन्द्र! उन्हींकी कृपासे मैं आपको पुनः प्राप्त कर सकी हूँ॥ ३॥ |
| नहुषो नाम राजर्षिः स्थापितो भवदासने। <br> त्रिदशैर्मुनिभिश्चैव स मां बाधति नित्यशः॥ ४ <br><br> पतिं मां कुरु चार्वङ्गि तुरासाहं सुराधिपम्। <br> एवं वदति मां पाप्मा किं करोमि बलार्दन॥ ५ | देवताओं और मुनियोंने नहुष नामक राजर्षिको आपके आसनपर बैठा दिया है; वह मुझे नित्य कष्ट देता है। वह पापी मुझसे इस प्रकार कहता है—हे सुन्दरि! मुझ देवराज इन्द्रको अपना पति बना लो। हे बलार्दन! अब मैं क्या करूँ?॥ ४-५॥ |
| इन्द्र उवाच <br> कालाकाङ्क्षी वरारोहे संस्थितोऽस्मि यदृच्छया। <br> तथा त्वमपि कल्याणि सुस्थिरं स्वमनः कुरु॥ ६ | इन्द्र बोले—हे वरारोहे! हे कल्याणि! जिस प्रकार मैं [अनुकूल] समयकी प्रतीक्षा करते हुए प्रारब्धवश यहाँ रह रहा हूँ, वैसे ही तुम भी अपने मनको पूर्णरूपसे स्थिर करो॥ ६॥ |