देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 770, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 770
| अ० ८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७६१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इति तस्य वचः श्रुत्वा देवाश्च मुनयस्तथा।<br>तमूचुश्चातिसन्त्रस्ता नहुषं मदनातुरम्॥ १६<br>इन्द्राणीमानयिष्यामः सामपूर्वं तवान्तिकम्।<br>इत्युक्त्वा ते तदा जग्मुर्बृहस्पतिनिकेतनम्॥ १७ | उसकी यह बात सुनकर भयभीत देवताओं और मुनियोंने उस कामातुर नहुषसे कहा—हमलोग सामनीतिसे इन्द्राणीको आपके पास लायेंगे—ऐसा कहकर वे लोग बृहस्पतिके निवासपर चले गये॥ १६-१७॥ |
| व्यास उवाच<br>ते गत्वाङ्गिरसः पुत्रं प्रोचुः प्राञ्जलयः सुराः।<br>जानीमः शरणं प्राप्तामिन्द्राणीं तव वेश्मनि॥ १८<br>सा देया नहुषायाद्य वासवेऽसौ कृतो यतः।<br>वृणोत्वियं वरारोहा पतित्वे वरवर्णिनी॥ १९ | व्यासजी बोले—तदनन्तर वे देवगण अंगिराके पुत्र बृहस्पतिके पास जाकर हाथ जोड़कर उनसे बोले—हमें ज्ञात हुआ है कि इन्द्राणीको आपके घरमें शरण प्राप्त है, उन्हें आज ही नहुषको देना है; क्योंकि वह इन्द्र बना दिया गया है। यह सुलक्षणा सुन्दरी उन्हें पतिके रूपमें वरण कर ले॥ १८-१९॥ |
| बृहस्पतिः सुरानाह तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः।<br>नाहं त्यक्ष्ये तु पौलोमीं सतीं च शरणागताम्॥ २० | यह दारुण वचन सुनकर बृहस्पतीने देवताओंसे कहा—मैं शरणमें आयी हुई इस पतिव्रता शचीका त्याग नहीं करूँगा॥ २०॥ |
| देवा ऊचुः<br>उपायोऽन्यः प्रकर्तव्यो येन सोऽद्य प्रसीदति।<br>अन्यथा कोपसंयुक्तो दुराराध्यो भविष्यति॥ २१ | देवगण बोले—तब दूसरा कोई उपाय करना चाहिये, जिससे वह आज प्रसन्न हो जाय, अन्यथा क्रुद्ध होनेपर वह दुराराध्य हो जायगा॥ २१॥ |
| गुरुरुवाच<br>तत्र गत्वा शची भूपं प्रलोभ्य वचसा भृशम्।<br>करोतु समयं बाला पतिं ज्ञात्वा मृतं भजे॥ २२<br>इन्द्रे जीवति मे कान्ते कथमम्यं करोम्यहम्।<br>अन्वेषणार्थं गन्तव्यं मया तस्य महात्मनः॥ २३<br>इति सा समयं कृत्वा वञ्चयित्वा च भूपतिम्।<br>भर्तुरानयने यत्नं करोतु मम वाक्यतः॥ २४ | देवगुरु बोले—सुन्दरी शची वहाँ जाकर राजाको अपनी बातसे अत्यन्त मोहित करके यह शपथ ले कि ‘अपने पतिको मृत जाननेके बाद ही मैं आपको अंगीकार करूँगी। अपने पति इन्द्रके जीवित रहते मैं किसी दूसरेको पति कैसे बना लूँ? इसलिये उन महाभागकी खोजके लिये मुझे जाना पड़ेगा।’ इस प्रकार वह मेरे कथनके अनुसार शपथ लेकर और राजाको छलकर अपने पतिको लानेका प्रयत्न करे॥ २२—२४॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मे सर्वे बृहस्पतिपुरोगमाः।<br>नहुषं सहिता जग्मुरिन्द्रपत्न्या दिवौकसः॥ २५ | ऐसा विचार करके सभी देवता बृहस्पतिको आगे करके इन्द्रपत्नी शचीके साथ नहुषके पास गये॥ २५॥ |
| तानागतान्समीक्ष्याह तदा कृत्रिमवासवः।<br>जहर्ष च मुदायुक्तस्तां वीक्ष्य मुदितोऽब्रवीत्॥ २६<br>अद्यास्मि वासवः कान्ते भज मां चारुलोचने।<br>पतित्वे सर्वलोकस्य पूज्योऽहं विहितः सुरैः॥ २७ | उन सभीको आया हुआ देखकर वह कृत्रिम इन्द्र नहुष हर्षित हुआ। उस शचीको देखकर वह आनन्दित हो गया और प्रसन्नतापूर्वक बोला—हे प्रिये! आज मैं इन्द्र हूँ, हे सुन्दर नेत्रोंवाली! मुझे पतिरूपमें अंगीकार करो। मैं देवताओंके द्वारा सम्पूर्ण लोकका पूज्य बना दिया गया हूँ॥ २६-२७॥ |
| इत्युक्ता सा नृपं प्राह वेपमाना त्रपायुता।<br>वरमिच्छाम्यहं राजंस्त्वत्तः प्राप्तं सुरेश्वर॥ २८ | नहुषके ऐसा कहनेपर शचीने लज्जित होकर काँपते हुए कहा—हे राजन्! हे सुरेश्वर! मैं आपसे एक वरप्राप्तिकी इच्छा करती हूँ। आप कुछ समयतक |